शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्रजा से संवाद

संवाद दृश्य-१. (सिर हिलाते और उंगली दिखाते हुये, धमकाने की भाव भंगिमा के साथ भीड़ को संबोधित करते हुये) - 

"...मुझे बताइये, ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए... तो हिसाब चुकता करेगा या नहीं करेगा? तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम हमें मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे..."

कट..कट..कट..

खलनायक को ऐसा ही होना चाहिए, ऐसी ही भाषा, ऐसी ही भाव भंगिमा, इतना ही खल-कपटी और इतना ही मिथ्याभाषी। लोग इसे ८०० साल बाद हुआ विष्णु का अवतार मानते हैं, कोई कोहनूर तो कोई विश्वगुरु। 

अनुरागी कवि के शब्दों में-  "जा को चिमचा जितनो भारी, मनमानी छवि देखय न्यारी।।

कुछ और देखने के लिए चलिए, आगे चलते हैं...

हाथ में धनुष-बाण लिए एआई निर्मित नानबायोलाॅजिकल भगवान का चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। भगवान का स्वांग रचना महानता और ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न करने में सहायक होता है। हर कोई भगवान बन जाने के लिए लालायित रहता है। आप इसे ढिठाई, धृष्टता और निर्लज्जता कह कर दुःखी हो सकते हैं। पर निस्संदेह भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो अवतारी कहलाने और मान लिए जाने के लिए लालायित रहते हैं। पूजन-वंदन भला किसे नहीं सुहाता! 

कुछ लोगों को चित्र अच्छा नहीं लगता, वे इसे भगवान का अपमान मान कर कानाफूसी कर रहे हैं। हाँ! कानाफूसी ही, प्रत्यक्ष होकर कहने का साहस भी तो होना चाहिए!

कुछ लोगों को कृत्रिम बौद्धिकताजनित भगवान का यह चित्र बहुत प्रभावित भी करता है, वे चित्र देखकर धन्य हो रहे हैं। स्वयं भगवान प्रकट हुये हैं "राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा" का प्रचार करने। 

अति उत्साही और अत्यानुरागी भक्त यह भ्रम उत्पन्न करने में लगे हैं कि जैसे उनके नानबायोलाॅजिकल जी महान कलाकार हैं वैसे ही कौशलेश श्रीराम भी थे,...अर्थात् इतने ही सनातन विनाशक, कपटी और मिथ्याभाषी। 

यह हो क्या रहा है देश में! हम पतन की कितनी और खाइयों में... और कब तक कूदते रहेंगे?

भगवान जी ने अपने श्रुमुख से उवाचा -" मैं अतिपिछड़े वर्ग से आता हूँ। मैं दलित वर्ग से आता हूँ। मैं चाय बेचा करता था"।

ब्राह्मणों पर छुआछूत का आरोप लगाने वाले भगवान ने कभी नहीं बताया कि उनके हाथ की बनी चाय पीने वालों में से कितने लोगों ने भगवान जी से उनकी जाति पूछी? कितने लोगों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया? कितने लोगों ने उनकी छुई चाय पीने से मना किया...?

अमर होने के लिए अमरत्व जैसे किसी गुण की क्या आवश्यकता! प्रचार और निर्लज्जता ही पर्याप्त है। वासुदेव और कौशलेश को प्रजा भगवान मान कर पूज सकती है तो मुझे क्यों नहीं! वे भी शासक थे, मैं भी शासक हूँ। मैं किसी से कम हूँ क्या!

चीनी अतिक्रमण

एक दूसरे को आरोपित कर स्वयं को राष्ट्रवादी और भारत प्रेमी बताने वाली सरकार भी झूठ बोलती रही और चीन भारत में आतिक्रमण करता रहा। अरुणांचली नागरिक दुःखी हैं, जितना अतिक्रमण से हैं उससे भी अधिक सरकार के उस झूठ से हैं जो प्रचार करता है कि वहाँ कोई चीनी अतिक्रमण नहीं हुआ है। सेवन सिस्टर्स वाले हमारी तरह मिथ्याभाषी नहीं होते। सीमावर्ती गांवों के लोग चीनी सैनिकों के सामने जाकर उनका विरोध कर रहे हैं, स्त्रियाँ उनके सामने जाकर चीख-चीख कर रो रही हैं कि सैनिक वापस चले जायें, वहाँ के नागरिक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि भारत चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ करे। वे गूगल सेटेलाईट मैप से अतिक्रमित स्थानों के चित्र भेज रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि शेष भारत के लोग, अरूणाचल और भारत सरकार भी गूगल मैप देखे। 

मैकमोहन रेखा लाँघकर ताक्सिन और उसके आसपास के स्थानों पर चीनी सेना ने अपनी रणनीणिक अधोसंरचनाओं का निर्माण कर लिया है जिसमें टनल और लंबी सड़कें भी सम्मिलित हैं जिससे अब गाँव वाले उन चारागाहों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय आदिवासी अपने स्तर पर मुखर होते रहे जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उन्हें लगने लगा है कि वे अधिक समय तक भारतवासी नहीं रह पायेंगे, अरुणाचल प्रदेश भी तिब्बत की तरह ड्रैगन के मुँह में जाने वाला है। वे चीनी नहीं बनना चाहते, भारतीय ही बने रहना चाहते हैं। अरुणाचली युवक उग्र नहीं होते, प्रकृति से वे सौम्य और शांत होते हैं। पर कब तक?

ढीठ सरकार नहीं सुनती तो अब वे स्वयं निकल रहे हैं...अपना भारत बचाने के लिए। "ताक्सिन चलो, भारत बचाओ अभियान" के स्वर गूँजने लगे हैं। पूरा भारत इस अभियान के समर्थन में है। सेवन सिस्टर्स के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। वहाँ हमारी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरें हैं। 

देश रहे या भाड़ में जाय, सरकार में बैठे अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं का क्या बिगड़ेगा! उन्हें चिंता क्यों होगी, पर हमें तो है।

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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गोमाता

राम भी वह

माधव भी वह

पर 

किंचित भी राम नहीं

किंचित भी माधव नहीं

संघ के चिंतन ने

राम तो छीने ही

छीन लिए माधव भी


गोमाता और धर्म से 

पृथक करता जो

जीवनशैली को

पूछते हैं कौशलेश

पूछते हैं वासुदेव

धर्म से पृथक

अस्तित्व

जीवनशैली का

बताओ तो राम माधव!

ना-ना-ना

बुड़बक न बना पाओगे

उत्तर तो देना ही होगा

किसी न किसी को

आज

प्रत्याशी को

या कल

मतदाता को

सोच लो जी भर

कौन दे उत्तर!

पहचान

 वे मिटा रहे हैं

पहचान के चिन्ह

एक-एक कर, 

नाम

वेश-भूषा

परंपरा

भाषा

संस्कार 

और सभ्यता...

ताकि आसान हो सके

हत्या

एक देश की।

सभ्यतायें

इस तरह भी मार दी जाती हैं

भाषायें 

इस तरह भी मार दी जाती हैं

और जीत लिया जाता है 

एक युद्ध

बिना लड़े कोई युद्ध।


युद्ध लड़ने में

अनिश्चित है हार-जीत

पहचान समाप्त कर देने से 

निश्चित हो जाता है सब कुछ

पहले से ही।


तिब्बत को तो मार रहा है 

चीन

ब्रिटेन को मार रहा है 

इस्लाम

किंतु भारत को मार रहा है

भारत ही

सुना तुमने!

भारत को मार रहा है भारत ही। 


रविवार, 16 अगस्त 2026

गालीयुग मोहन मन भावय

जेन-जी ने अपने प्रथम आंदोलन का प्रारंभ पोर्नगालियों के साथ किया। संघस्वामी मोहन भागवत जेन-जी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वाधिक विचारशील, प्रगतिशील और विचारवान पाया। 
कुछ लोगों को जेन-जी की पोर्नगालियों से आपत्ति हुई। वे उनकी प्रगतिशीलता को समझ नहीं सके। प्रधानमंत्री ने पोर्नगालीबाज नारीशक्तियों को क्षमा कर दिया और उन्हें गले लगाने की इच्छा व्यक्त की।  
किसी ने कहा स्त्री कैसी भी हो, किसी भी स्थिति में स्त्री के चरित्र पर लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए। 
जेन-जी आंदोलन में पोर्नगालीबाज लड़कों से अधिक संख्या लड़कियों की रही। 
जब कोई गाली देता है तो वे गालियाँ ही स्त्रीप्रधान होती हैं, यथा माँ की गाली, बहन की गाली या स्त्री जननांगों के वीभत्स क्रियास्वरूपों की गाली...। गाली कभी पुरुष प्रधान नहीं होती। स्त्री मर्म है, सर्वाधिक चोट मर्मस्थल में ही लगती है। इसीलिए पुरुषवाचक गाली नहीं बनी। जेन जी लड़कियाँ भी स्त्रीसूचक गालियाँ ही देती हैं। गाली स्त्रीवाचक होती है पर यह अपमान की पराकाष्ठा है पुरुष के लिए। इसी अपमान में छिपा है स्त्री का महत्व और उसकी प्रतिष्ठा। अपमान तो वह पीड़ा है जो शब्दशर से बिंधकर उत्पन्न होती है। शर स्त्री को चुभता है, पीड़ा पुरुष को होती है। स्त्री-पुरुष संबंधों के इस अति संवेदनशील पक्ष को भारतीय ही समझ सकते हैं जहाँ पैराडाॅक्स की भरमार है। 
...तो स्त्रीसूचक गालियाँ स्त्री से अधिक पुरुष को घायल करती हैं। गाली देना पाप है परंतु यह पुरुष की अपेक्षा स्त्री महत्व और उसके सम्मान को ही अधिक इंगित करता है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति

 अतिविद्वान ने कहा

मत करो राजनीति की बातें

वातावरण दूषित होता है

मछलियों की बातें करो

तुम मछुआरे हो,

घंटियों की बातें करो

तुम पुजारी हो,

दूध की बातें करो

तुम ग्वाले हो।

कैसे करूँ

इन सबकी बातें

समझ नहीं पाता मैं।

मछलियों के बीज डाले ही नहीं गये

गाँव के सरकारी पोखर में

जो पहले से थीं भी

उन्हें खा गये

मंत्री जी।

पीतल की घंटियाँ

चुरा ली हैं

मंदिर के

सरकारी सेवकों ने

दूध नकली बनता है

नेता जी की फैक्ट्री में

कोई कोना नहीं

जो मुक्त हो

सरकारी हस्तक्षेप से।

सरकार माने राजनीति

राजनीति माने नेता जी की भैंस

भैंस नेता जी की ही है

क्योंकि लाठी उनकी ही है।

भैंस लेने के लिए रुपयों की नहीं

लाठी की आवश्यकता है

वह लोकोक्ति तो सुनी है न!

"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

तो इस तरह सब कुछ

नेताओं का ही है

सरकार भी

राजनीति भी

देश भी

देश की सारी संपत्ति भी

और तुम कहते हो

अछूत है राजनीति

और राजनीति जो छू रही है सबको

उसका क्या!

केवल छू ही नहीं रही,

पकड़ कर मरोड़ दे रही है

कपड़े सा निचोड़ दे रही है

और तुम कहते हो

दूर रहो राजनीति से!

राजनीति को ही

दूर क्यों नहीं रखते

हम से

हमारे जीवन से

हमारे धर्म से

हमारे सुख-चैन से!

राजनीति

हर लेती है सब कुछ

हर किसी का

और हम

जाने दें उसे यूँ ही

बिना किये दंडित

बिना किये प्रक्षालित!

नहीं

हम निस्पृह नहीं रह सकते

तुम्हारी तरह अवसरवादी नहीं हो सकते।    

रविवार, 9 अगस्त 2026

धुंधज्ञान

          मठाधीश बनते ही काले अंग्रेज सर्वज्ञानी हो गये हैं । ज्ञान-विज्ञान-धर्म-अध्यात्म-नीति-विधान-न्याय-राजनीति-कला-पुरातत्व-इतिहास... सभी विषयों का एकछत्र मठाधीश हर काला अंग्रेज है । कोई भी विषय ऐसा नहीं जिसमें ये स्वयं को निष्णात न मानते हों । इनका ज्ञान अद्भुत है, धुंध से परिपूर्ण, स्पष्ट कुछ भी नहीं, आभासी भी नहीं, अदृश्य भी नहीं ।

काले अंग्रेजों का हठ है कि ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलाने के लिये धूम्रकेतु को सूर्य और सूर्य को धूम्रकेतु का पद एवं दायित्व दिया जाना आवश्यक है । सूर्य! अब तुम्हें अपने दायित्व धूम्रकेतुओं को सौंप देने चाहिये । ताम्रपत्रों पर लिख दिया गया है – “धूम्रकेतु को उसके नाम से पुकारा जाना अपराध माना जायेगा, उन्हें कूड़ा-कचरा, सड़ा हुआ, दुर्गंधित, और निरीह जैसे अर्थों को ज्ञापित करने वाले संबोधनों से ही संबोधित किया सकेगा । यही न्याय है । 

ब्रह्माण्ड के सम्राट रहे धूम्रकेतु अनायास ही तीन या पाँच हजार वर्ष पूर्व शोषित, वंचित और पीड़ित हो गये, उनकी प्रजा में जो सूर्य थे उन्होंने अपने सम्राटों पर अमानवीय और अब्रह्माण्डीय अत्याचार किये इसलिये अब सभी धूम्रकेतुओं को सूर्य बना देना होगा, धरती पर हमारा अवतार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है । दबंग सूर्यों के लिये इस विधान का पालन करना ही प्रायश्चित है और यही दण्ड भी ...दोनों एक साथ ।

काले अंग्रेजों ने शब्दों के नये अर्थ गढ़े, नयी परिभाषायें लिखीं, नये विधान रचे ...और सिद्ध कर दिया कि वे सर्वशक्तिमान हैं, वे ही परमपिता परमेश्वर और इस ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं । काले अंग्रेजों का दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर एक काल्पनिक शब्द है जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता, जिसका अस्तित्व होता है वह वे स्वयं हैं इसलिये उनका बनाया विधान ही सनातन सत्य है । उन्होंने नई-नई जातियाँ बनाकर जातियाँ समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि जातियाँ सदा के लिये बनी रहें । उन्होंने खर-पतवार के बीज बो कर खर-पतवार समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि खर-पतवार सदा अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होते रहें । उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि सूर्य तो इस ब्रह्माण्ड के पिंड हैं ही नहीं, ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर धरती पर टपक पड़े इसीलिये इनका बहिष्कार करना फिर धीरे-धीरे इन सबका समूल उच्छेद कर देना ही एकमात्र उपाय है ।

उद्घोषणा की जा चुकी है, संकल्प लिया जा चुका है ...कि अब काले अंग्रेज रुकेंगे नहीं, धूम्रकेतुओं को सूर्य के दायित्व सौंपने के लिये ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर टपके सूर्यों का उन्मूलन हो जाने तक उनके विविध अभियान चलते ही रहेंगे ।

अत्याचारी सूर्यो! तुम वापस जाओ, जहाँ से आकर टपके थे वहीं ...अखिल ब्रह्माण्ड की सीमाओं से बाहर । यदि तुम ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं गये तो हमारे धूम्रकेतु और ब्रह्माण्ड के मूलपिण्ड एक साथ मिलकर तुम्हारी बेटियों को खींचते हुये ले जायेंगे... कहीं भी, अपने घर... या झाड़ियों में... या किसी खण्डहर में... फिर उनके साथ दुष्कर्म करेंगे और फिर उनकी हत्या कर देंगे । जो धूम्रकेतु किसी सूर्य की ओर उँगली से संकेत कर देगा उसे लाखों चंद्रमा उपहार स्वरूप दिये जायेंगे, वहीं सूर्य की आँखें फोड़ दी जायेंगी, हाथ-पाँव काट दिये जायेंगे और जीवन भर यूँ ही मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा ।

 

          ...और काले अंग्रेजों को यह भी दृढ़ विश्वास है कि धरती पर छायी धुंध पूरे ब्रह्माण्ड की धुंध है, सूर्य इस धुंध से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा । सूर्य का अंत निश्चित है । अब ब्रह्माण्ड में केवल धूम्रकेतुओं का ही साम्राज्य होगा।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

अलोकतंत्र की ओर बढ़ता भारत

जब जनता से लेकर  प्रधानमंत्री तक स्वार्थ में डूबे हुए हों, व्यक्तिगत और लोकजीवन से नैतिकता का तीव्रता से क्षरण हो जिसे रोकने के किसी भी स्तर पर कोई प्रयास ही न किए जाते हों और सत्ताधीशों में सत्ता पर अपनी स्थाई पकड़ बनाने के लिए समाज को विघटित किये जाने की उद्दाम इच्छा हो तब निश्चित ही लोकतंत्र के भीड़तंत्र में रूपांतरित होने की आशंकायें बलवती होती हैं। हम लोकतंत्र के स्वप्न के साथ छद्म लोकतंत्र को तांडव करते हुए देख रहे हैं।

हम चीन की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें पर उसके सामने झुकने के लिए विवश होते रहे हैं, यही सच है। भाजपा ने लोकतंत्र को लोहे के संदूक में बंद कर दिया है, शासक वर्ग में निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता तो जनता में अराजकता और असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है। 

यदि भारत में जातिवाद का अंत हो सके, आरक्षण समाप्त हो सके, प्रतिभा को अवसर मिलना सुनिश्चित हो सके, वैज्ञानिक सुरक्षित और निर्भय हो सकें, निर्बल का शोषण थम सके और हम चीन से होड़ करने की स्थिति में आ  सकें.... तो हमें कम्युनिस्ट शासन भी स्वीकार है। 

लोकतंत्र आपने आप में एक छल है। सच तो यह है कि शासित और शासक एक सामाजिक बाध्यता है। हर व्यक्ति आत्मनियंत्रण और नैतिक नहीं हो सकता इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है जो लोकतंत्र से कभी संभव नहीं। हमें एक सभ्य कुलीन तंत्र की आवश्यकता है, ....या फिर चीन की तरह अलोकतंत्र ...जो नियंत्रण भी करता है, वैज्ञानिक उन्नति भी करता है, व्यापार भी करता है, और आवश्यक होने पर सबको आँख भी दिखाता है। 

रविवार, 2 अगस्त 2026

झमाझम वर्षा

अब की वारिश

झमाझम बरसीं

पोर्नगालियाँ

नरों के मुख से

उससे भी अधिक 

नारियों के मुख से

महामानव धन्य हुये

देश धन्य हुआ

सभ्यता धन्य हुयी

संस्कृति धन्य हुयी

भीगकर

गालियों की बरसात में। 

अन्याय भी धन्य हुआ

जानकर

कि क्षमा कर दिया है 

नानबायोलाॅजिकल भगवान ने 

सभी गालीबाजों को

और लग जाना चाहते हैं उन सबके गले

हँसते हुये

किंतु...

छोड़ देना चाहते हैं 

गोलियाँ खाने के लिए 

राष्ट्रप्रेम के सच्चे दीवानों को 

स्वतंत्र कर देना चाहते हैं

असुरों को 

मारने के लिए पत्थर

हर उस व्यक्ति को

जो करेगा देश की 

सच्ची सेवा 

और न्याय की माँग।

अब की वारिश

उमस 

ताप देने लगी है 

ज्वालामुखी के 

बहते लावे की तरह।




शनिवार, 1 अगस्त 2026

मोरक्को की स्पेन में बलात् घुसपैठ

यह स्पष्टरूप से एक अयुद्धक अतिक्रमण है जो मोरक्को द्वारा स्पेन में किया गया है । लगभग साठ हजार युवकों को मोरक्को की सीमा से स्पेन के सेउटा में बलात् प्रवेश के लिये भेजा गया । इनमें से अधिकांश अपराधी हैं जिन्हें मोरक्को सरकार ने स्पेन में घुसने के लिये जेल से मुक्त कर दिया । स्पेन इस षड्यंत्र का पता लगाने में असफल रहा, उसकी पुलिस और सेना भी कुछ विशेष नहीं कर सकी । लगभग छिहत्तर उपद्रवी मारे गये, कुछ घुसपैठियों को मोरक्को वापस जाने के लिए विवश कर दिया गया फिर भी कुछ तो स्पेन में छिपने में सफल हो ही जायेंगे । यही मोरक्को की रणनीति है । 

मोरक्को से स्पैन की दूरी 1335 किमी है । दोनों देशों की सीमाओं के बीच सनुद्र में मात्र तेरह किलोमीटर की दूरी है । मोरक्को के पिनडेक से स्पेन के सेउटा पहुँचने के लिए मात्र पाँच किलोमीटर तैरना पड़ता है । यही कारण है कि पंद्रहवी शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस और मोरक्को के बीच युद्ध होते रहे हैं । मोरक्को के लोग आज भी स्पेन को यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में मानते हैं । कभी ईसाई बहुल रहा स्पेन मुस्लिम बहुल होता जा रहा है। कई कारणों से मोरक्को के मुस्लिम स्पेन में बसना चाहते हैं । यह इस्लामिक विस्तार की भी एक रणनीति है कि अपने नागरिकों के सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दो कि वे पलायन करके ईसाई, यहूदी, पारसी और हिन्न्दू देशों में घुसपैठ के लिये बाध्य हो जायँ । इंग्लैंड, फ़्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों  ने जिन मुसलमानों को शरण दी आज वे उनके ही अस्तित्व के लिये संकट बन चुके हैं । यह शक्ति, षड्यंत्र और सत्ता का खेल है जिसमें क्रूरता सर्वोपरि है । भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ।  

मोरक्को-स्पेन क्षीण सीमा रेखा