शनिवार, 29 अगस्त 2026

सत्ता और संविधान

व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया

व्यापारिक, 

व्यापारी हारा, व्यापारी जीता

व्यापार की मृत्यु हुई।

व्यापारी ने दास बनाया

पूरे देश को

व्यापारी ने सत्ता संभाली 

पूरे देश की

नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।

फिर क्रांति के लिए बजी

रणभेरी

हिंसा हुयी

कुछ मारे गये

कुछ ताक में थे

अवसर की,

नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का

लिख लिया अपना संविधान

करते हुये अनुकरण

विदेशी संविधानों का

जिसमें नहीं होता कुछ भी 

देशी।

सत्ता गई, सत्ता आई 

पर क्रांति नहीं हुई

सत्ता परिवर्तन हुआ। 

गोरों के चाबुक 

ले लिए कालों ने, 

पहले देश परतंत्र था

फिर प्रजा परतंत्र हुई। 

व्यापार आज भी रहता है

सत्ता के केंद्र में।

सारी नीतियाँ

सारे विधान

सारी व्यवस्था

रहती है

व्यापार केंद्रित।

तुमसे छीने गये 

तुम्हारे कुटीर उद्योग

छीना गया व्यापार

और थमा दिये गए

व्यापारिक दक्षता के नाम

बना कर जातियाँ

जो पिछड़ती गईं

खोती गईं अपना अस्तित्व

होते हुये रूपांतरित

वैश्य और शूद्र से

दलित

अतिदलित

और महादलित तक। 

व्यापार 

आज भी है

सत्ता के केंद्र में।

बड़े-बड़े प्रधानमंत्री

होते हैं नतमस्तक 

सम्राट 

रोटे शील्ड और 

व्यापारी

वास्को द गामा और  

शी जिन पिंग के समक्ष।

संविधान 

लिखे जाते हैं

इन्हीं के लिए।

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू

 मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"। 

बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"। 

इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?

माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या  हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं। 

संघ और भाजपा के पास  समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं। 

संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुराकथा भवितव्यता

पुराकथा यह है कि जब-जब धर्म की हानि (धर्म के अनुयायियों की संख्यात्मक और गुणात्मक न्यूनता) होती है तब-तब समाज में क्रूरता, अत्याचार और अपराधों की वृद्धि होती है। छोटे अत्याचारी भी बड़े अत्याचारियों से त्रस्त होने लगते हैं। हर कोई अभिमानी और स्वयं को ईश्वर मानने लगता है, ठीक हिरण्यकश्यप की तरह, नानबायोलाॅजिकल सा। यह वैचारिक और सामाजिक असंतुलन की पराकाष्ठा है जिसका अंत सुनिश्चत है। जगत के संचालन का यही कालक्रम (क्रोनोलाॅजिकल आॅर्डर) है, द सो काल्ड न्यू वर्ल्ड आॅर्डर। भारत सहित विश्व भर में व्याप्त इन सभी व्याधियों की यही प्रोग्नोसिस है।

रावण तो अपने काल का प्रकाण्ड विद्वान था, कई विषयों में पंडित, आविष्कारक और शोधकर्ता भी। किंतु उसके अहंकार ने उसे धर्मच्युत किया और फिर उसका अंत भी किया। रावण, दुर्योधन, ओट्टोमन साम्राज्य के सुल्तान आदि से लेकर ओसामा बिन लादेन तक हर अधर्मी का अंत होता रहा और हर युग का कुशासन अपने उत्तरकालीन सुशासन से स्थानापन्न किया जाता रहा। इस बार भी यही पुरानी कहानी अपनी पुनरावृत्ति के लिए नेपथ्य के गहन अंधकार में तैयार हो रही है। धर्म, जाति, वर्ग,भाषा आदि के आधार पर समाज को बाँटने और सत्ता हथियाने वालों का भी अंत होना ही है। परमशक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्थाई और अंतिम नहीं होता। तुम्हारा संविधान तो कदापि नहीं। 

बड़े गर्व से तुम जो संविधान रचते हो, उसका उल्लंघन भी तुम्हीं करते हो, फिर छल करके उसमें संशोधन भी करते हो। जो सच्चे लोग तुम्हारे रचे संविधान के अनुरूप चलते हैं वे कष्ट भोगते हैं, जो तुम्हारे संविधान की प्रतिपल धज्जियाँ उड़ाते हैं वे ऐश्वर्य भोगते हैं। किंतु प्रकृति रचित अलिखित संविधान में कोई संशोधन नहीं होता, वह निर्दुष्ट है इसलिए अपरिवर्तनीय है। उसे हर किसी को मानना ही होगा। 

प्रकृति और समाज का अपना पृथक धर्म होता है, जिसका पालन अनिवार्य है। कालक्रम से इसमें शिथिलता आती है पर वह स्थाई नहीं होती। जो प्रतिलोम हो जाता है उसे अनुलोम होना ही होता है। यह तुम्हारा रचित संविधान नहीं, प्रकृति का निर्दुष्ट और अक्षुण्ण संविधान है जो वैश्विक है, सनातन है, हर किसी के लिए सर्वोपरि है।

जिन्होंने हर तरह के पाप और क्रूरता को ईश्वर का आदेश प्रचारित कर निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता को ही धर्म कहना प्रारंभ कर दिया है, वे सब भी अपने अंत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति भी संतुलन साधने में लगी हुई है। 

...तो क्या अनुकूल काल की प्रतीक्षा करें! नहीं, यह भी नहीं, कर्म करना भी प्राकृतिक धर्म का अपरिहार्य अंग है। हम गहन तिमिर में छटपटा रहे हैं, भोर होने तक प्रतीक्षा करनी होगी। तमस से ज्योति की ओर... ! यजन तो करना ही होगा न!

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

जातीय समीकरण और सत्ता

 -जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद

-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!

-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है। 

-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है। 

-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।

-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।

-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।

-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।

-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा। 

गालीप्रेमी भजनद्वेषी

जेन-जी लड़कियों ने मोदी और उनकी माँ को पोर्नगालियाँ दीं तो सरकार प्रसन्न होकर उनके सामने नतमस्तक हो गई, स्वयं प्रधानमंत्री ने गालीबाजों को गले से लगाने की इच्छा प्रकट की। इसके कुछ ही दिन बाद हनुमान चालीसा का भजन करती युवाओं की भीड़ से रामभक्त होने का पाखंड करने वाली सरकार इतनी कुपित हुई कि गृहमंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को हिंसा के लिए आदेशित कर दिया गया। 

देश ही नहीं विश्व भर में विश्वगुरु के इस संदेश ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। आपातकाल की घोषणा किये बिना दिल्ली में आपातकाल लगा दिया गया। इस अघोषित आपातकाल के लिए भाजपा और मोदी को इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 

जातिगतआरक्षण, अत्याचारमूलक यूजीसी बिल और जातीय उत्पीड़न को समाप्त करने की याचना के साथ पूरे देश से उमड़ी भीड़ स्वतंत्र भारत का सच्चा मुक्तिआंदोलन है जिसके दमन के लिए संघ के वैचारिक आक्रमणों और भाजपा के हिंसक दमन ने देश भर को हतप्रभ कर दिया है। 

जंतर-मंतर पर युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का भजन करती भीड़ पर पुलिस की लाठियों के प्रहार ने घोषित कर दिया है कि राममंदिर और हिंदुत्व की बातें भाजपा और संघ के अलतकिया से अधिक और कुछ नहीं था। 

सत्य और नैसर्गिक न्याय की याचना करते भूलुंठित युवाओं पर मोदी सरकार की पुलिस के क्रूर प्रहारों, प्रदर्शनकारी पंडित पंकज धावरिया को बंदी बनाने के बाद चलती गाड़ी से नीचे फेंककर जातिसूचक गालियाँ देते हुये दिल्ली पुलिस की यातनाओं से भयभीत हो गये भय ने धीरे से फुसफुसाकर बता दिया कि भारत में संघ और भाजपा के फासीवाद की घोषणा हो चुकी है जो मोदी के प्रिय "न्यू वर्ल्ड  आॅर्डर" का एक अंश भर है। 

रविवार, 23 अगस्त 2026

आरक्षण का अधिकार

हर किसी को अपने पतन या उत्थान का अधिकार प्राप्त है । यह अधिकार सदा से आरक्षित रहा है, संविधान निर्माण के पहले से ही। 

आज मेरी बात आपको प्रतिकूल दिशा में जाती सी प्रतीत होगी। मैं सदा आरक्षण के विरोध में लिखता रहा हूँ। आज मैं इसके दूसरे स्वरूप को देख पा रहा हूँ। 

आज, अभी थोड़ी देर पहले तक मैं लिखता रहा कि आरक्षण नैसर्गिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, अन्याय है, अमानवीय है और अप्राकृतिक है। अब मैं समझ पा रहा हूँ कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा, क्योंकि आरक्षण प्रकृति की व्यवस्था है। 

अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तनिक ठहरकर, बहुत अधिक नहीं, मात्र शरीर रचना विज्ञान, परमाणु संरचना, सृष्टि की प्रक्रिया, ब्रह्मांडीय विन्यास और गणित के कुछ व्यावहारिक अनुबंधों पर दृष्टि अवश्य डाल लीजिए। 

इन सभी में एक सैद्धांतिक समानता है, अ-समानता और विरुद्धता की समानता। दाहिने और बायें अंगों की संरचनाओं एवं कार्यों में अ-समानता, परमाणु की संरचना में परस्पर विरोधी गुणों की अनिवार्यता, सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अ-समान गुण-कर्मों की अनिवार्यता, ब्रह्मांड की अवस्थिति में तो अ-समानता और विरुद्धता की भरमार है, और गणित में मूल संख्याओं का योग भी अ-समान ही होता है।  

अ-समानता प्राकृतिक है, समानता का हठ अप्राकृतिक है। परिवार और समाज में अ-समानता देखी जाती है, उसका होना अपरिहार्य है। उसकी संरचना और अवस्थिति का आधार भी अ-समान है, और यही अ-समानता का गुण प्रकृति का आरक्षण है। इस आरक्षण को समाप्त कौन कर सकता है! इसीलिए फ़िजिक्स के विद्वान ने दहाड़ते हुए कहा- "किसी माई के लाल ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया जो इस आरक्षण को समाप्त कर दे"। (वैसे जिस भी बच्चे की माँ जन्म देते ही मर नहीं गयी, उसने अपने बच्चों को दूध तो पिलाया ही है। बहुत कम दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं जो माँ के दूध से वंचित रहते हैं)

...तो सिद्ध हुआ कि अ-समानता प्रकृति का अपरिहार्य गुण-कर्म है, और इस संदर्भ में प्रकृति ने अपनी व्यवस्था में शतप्रतिशत आरक्षण बना कर रखा है। 

...तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामाजिक समानता की कल्पना और उसकी माँग एक अव्यावहारिक हठ है। प्रकृति की व्यवस्था में अ-समानता का आरक्षण है, समानता का नहीं।

वैक्सीन, वायरस और व्यापार

आग पर रोटी पकती है तो क्या सूरज पर पका लें! माइक्रोब्स रोग उत्पन्न करते हैं और इम्युनिटी भी, तो क्या उनका स्वागत करें और उन्हें अपने शरीर में निर्बाध प्रवेश करने दें? 

माइक्रोब्स और शरीर के बीच में आती है हाइजीन की अवधारणा और म्यूटेशन एवं वैरिएन्ट्स के रहस्य। 

मैं अपने छात्र जीवन से ही वैक्सीनेशन के विरोध में खड़ा होता रहा, लोग उपहास करते रहे, शिक्षक भी और सहपाठी भी, पर मैं खड़ा रहा। और अब जबकि anti HIV वैक्सीन की चर्चा हो रही है तो एंटी कोरोना वैक्सीन का भूत भी एक बार पुनः झाँकने लगा है। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए जाॅर्ज सोरोस से लेकर मोदी तक पुष्पमाला लेकर खड़े हैं। उद्योगपति हर्षित हैं... बकरे स्वयं आगे आ रहे हैं कटने के लिए। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए और क्या चाहिए!

हम कुछ नहीं कहेंगे, जनसंख्या भी तो कम होनी चाहिए न! प्रकृति संतुलन करती है, यहाँ अतिज्ञानी लोग प्रकृति का अधिकार स्वयं ले चुके हैं। एपस्टीन एक बार पुनः चर्चा में है, ...कि कोविड पूर्वनियोजित था, WHO की भूमिका भी पूर्वनियोजित थी। सबका साथ था...स्वास्थ्य के विरुद्ध विष बाँट कर अपने विकास का। लाॅकडाउन हुआ, थाली बजी, वैक्सीन लगा, ...और अब हो रहा है हृदयाघात, आकालमृत्यु। योजना सफल हो रही है। जनसंख्या कम हो रही है, उद्योग विस्तारित हो रहे हैं। कल क्या होने वाला है? ....छोड़िये, बाद में सोचेंगे, अभी तो अपनी बच्चियों को एंटीकैंसर वैक्सीन (Anti HIV) लगवाना है... ताकि इस बार उनकी देह में कैंसर की फसल अच्छी हो।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

बीजिंग से अहमदाबाद

मुँह खुला ही रहता है 

चिर बुभुक्षित

ड्रैगन का

निगलने को कुछ भी

किसी भी दिशा में

मिल जाए जो भी

जहाँ भी।

चौकन्ने

मंथर गति से चलते

ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से

बचेगा नहीं

असावधान रहेगा जो भी

और 

नहीं होगी दूरदृष्टि

जिसमें भी।


तुम तो गाते रहे 

हिंदी-चीनी भाई-भाई

और उधर बासठ हो गया।

तुमने कहा कुछ नहीं हुआ

डोकलाम में 

और उधर बनती रहीं 

सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,

बनते रहे दो सैन्यमार्ग 

अरुणाचल में

साठ किलोमीटर भीतर तक।

तुम झूठ बोलते रहे  

पल-पल

आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।

कौन हो तुम?

चौकीदार तो नहीं हो सकते

नायक भी नहीं हो सकते

बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं

ओह ! अब समझा 

तुम जो हो

वह बताएगा कौन!

सुनने के बाद

अपना सही परिचय 

मृत्युदंड निश्चित है

इसलिए सत्यवादी मौन है

गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही 

अट्टहास दिग्दिगंत में

पर अब और नहीं

तैयार हो गये हैं कुछ लोग

करने अनावृत सारे रहस्य

भले ही मिले

क्यों न मृत्युदंड

और तुम!

तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल

तुम्हें क्या पड़ता है 

कोई अंतर 

किसी के मरने से!

बेताल बेसुर

गाते रहे वर्षों से 

मन की बात

केवल अपनी

बिना सुने 

किसी और के मन की 

बेताल जो ठहरे!

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्रजा से संवाद

संवाद दृश्य-१. (सिर हिलाते और उंगली दिखाते हुये, धमकाने की भाव भंगिमा के साथ भीड़ को संबोधित करते हुये) - 

"...मुझे बताइये, ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए... तो हिसाब चुकता करेगा या नहीं करेगा? तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम हमें मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे..."

कट..कट..कट..

खलनायक को ऐसा ही होना चाहिए, ऐसी ही भाषा, ऐसी ही भाव भंगिमा, इतना ही खल-कपटी और इतना ही मिथ्याभाषी। लोग इसे ८०० साल बाद हुआ विष्णु का अवतार मानते हैं, कोई कोहनूर तो कोई विश्वगुरु। 

अनुरागी कवि के शब्दों में-  "जा को चिमचा जितनो भारी, मनमानी छवि देखय न्यारी।।

कुछ और देखने के लिए चलिए, आगे चलते हैं...

हाथ में धनुष-बाण लिए एआई निर्मित नानबायोलाॅजिकल भगवान का चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। भगवान का स्वांग रचना महानता और ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न करने में सहायक होता है। हर कोई भगवान बन जाने के लिए लालायित रहता है। आप इसे ढिठाई, धृष्टता और निर्लज्जता कह कर दुःखी हो सकते हैं। पर निस्संदेह भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो अवतारी कहलाने और मान लिए जाने के लिए लालायित रहते हैं। पूजन-वंदन भला किसे नहीं सुहाता! 

कुछ लोगों को चित्र अच्छा नहीं लगता, वे इसे भगवान का अपमान मान कर कानाफूसी कर रहे हैं। हाँ! कानाफूसी ही, प्रत्यक्ष होकर कहने का साहस भी तो होना चाहिए!

कुछ लोगों को कृत्रिम बौद्धिकताजनित भगवान का यह चित्र बहुत प्रभावित भी करता है, वे चित्र देखकर धन्य हो रहे हैं। स्वयं भगवान प्रकट हुये हैं "राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा" का प्रचार करने। 

अति उत्साही और अत्यानुरागी भक्त यह भ्रम उत्पन्न करने में लगे हैं कि जैसे उनके नानबायोलाॅजिकल जी महान कलाकार हैं वैसे ही कौशलेश श्रीराम भी थे,...अर्थात् इतने ही सनातन विनाशक, कपटी और मिथ्याभाषी। 

यह हो क्या रहा है देश में! हम पतन की कितनी और खाइयों में... और कब तक कूदते रहेंगे?

भगवान जी ने अपने श्रुमुख से उवाचा -" मैं अतिपिछड़े वर्ग से आता हूँ। मैं दलित वर्ग से आता हूँ। मैं चाय बेचा करता था"।

ब्राह्मणों पर छुआछूत का आरोप लगाने वाले भगवान ने कभी नहीं बताया कि उनके हाथ की बनी चाय पीने वालों में से कितने लोगों ने भगवान जी से उनकी जाति पूछी? कितने लोगों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया? कितने लोगों ने उनकी छुई चाय पीने से मना किया...?

अमर होने के लिए अमरत्व जैसे किसी गुण की क्या आवश्यकता! प्रचार और निर्लज्जता ही पर्याप्त है। वासुदेव और कौशलेश को प्रजा भगवान मान कर पूज सकती है तो मुझे क्यों नहीं! वे भी शासक थे, मैं भी शासक हूँ। मैं किसी से कम हूँ क्या!

चीनी अतिक्रमण

एक दूसरे को आरोपित कर स्वयं को राष्ट्रवादी और भारत प्रेमी बताने वाली सरकार भी झूठ बोलती रही और चीन भारत में आतिक्रमण करता रहा। अरुणांचली नागरिक दुःखी हैं, जितना अतिक्रमण से हैं उससे भी अधिक सरकार के उस झूठ से हैं जो प्रचार करता है कि वहाँ कोई चीनी अतिक्रमण नहीं हुआ है। सेवन सिस्टर्स वाले हमारी तरह मिथ्याभाषी नहीं होते। सीमावर्ती गांवों के लोग चीनी सैनिकों के सामने जाकर उनका विरोध कर रहे हैं, स्त्रियाँ उनके सामने जाकर चीख-चीख कर रो रही हैं कि सैनिक वापस चले जायें, वहाँ के नागरिक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि भारत चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ करे। वे गूगल सेटेलाईट मैप से अतिक्रमित स्थानों के चित्र भेज रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि शेष भारत के लोग, अरूणाचल और भारत सरकार भी गूगल मैप देखे। 

मैकमोहन रेखा लाँघकर ताक्सिन और उसके आसपास के स्थानों पर चीनी सेना ने अपनी रणनीणिक अधोसंरचनाओं का निर्माण कर लिया है जिसमें टनल और लंबी सड़कें भी सम्मिलित हैं जिससे अब गाँव वाले उन चारागाहों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय आदिवासी अपने स्तर पर मुखर होते रहे जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उन्हें लगने लगा है कि वे अधिक समय तक भारतवासी नहीं रह पायेंगे, अरुणाचल प्रदेश भी तिब्बत की तरह ड्रैगन के मुँह में जाने वाला है। वे चीनी नहीं बनना चाहते, भारतीय ही बने रहना चाहते हैं। अरुणाचली युवक उग्र नहीं होते, प्रकृति से वे सौम्य और शांत होते हैं। पर कब तक?

ढीठ सरकार नहीं सुनती तो अब वे स्वयं निकल रहे हैं...अपना भारत बचाने के लिए। "ताक्सिन चलो, भारत बचाओ अभियान" के स्वर गूँजने लगे हैं। पूरा भारत इस अभियान के समर्थन में है। सेवन सिस्टर्स के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। वहाँ हमारी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरें हैं। 

देश रहे या भाड़ में जाय, सरकार में बैठे अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं का क्या बिगड़ेगा! उन्हें चिंता क्यों होगी, पर हमें तो है।

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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गोमाता

राम भी वह

माधव भी वह

पर 

किंचित भी राम नहीं

किंचित भी माधव नहीं

संघ के चिंतन ने

राम तो छीने ही

छीन लिए माधव भी


गोमाता और धर्म से 

पृथक करता जो

जीवनशैली को

पूछते हैं कौशलेश

पूछते हैं वासुदेव

धर्म से पृथक

अस्तित्व

जीवनशैली का

बताओ तो राम माधव!

ना-ना-ना

बुड़बक न बना पाओगे

उत्तर तो देना ही होगा

किसी न किसी को

आज

प्रत्याशी को

या कल

मतदाता को

सोच लो जी भर

कौन दे उत्तर!

पहचान

 वे मिटा रहे हैं

पहचान के चिन्ह

एक-एक कर, 

नाम

वेश-भूषा

परंपरा

भाषा

संस्कार 

और सभ्यता...

ताकि आसान हो सके

हत्या

एक देश की।

सभ्यतायें

इस तरह भी मार दी जाती हैं

भाषायें 

इस तरह भी मार दी जाती हैं

और जीत लिया जाता है 

एक युद्ध

बिना लड़े कोई युद्ध।


युद्ध लड़ने में

अनिश्चित है हार-जीत

पहचान समाप्त कर देने से 

निश्चित हो जाता है सब कुछ

पहले से ही।


तिब्बत को तो मार रहा है 

चीन

ब्रिटेन को मार रहा है 

इस्लाम

किंतु भारत को मार रहा है

भारत ही

सुना तुमने!

भारत को मार रहा है भारत ही। 


रविवार, 16 अगस्त 2026

गालीयुग मोहन मन भावय

जेन-जी ने अपने प्रथम आंदोलन का प्रारंभ पोर्नगालियों के साथ किया। संघस्वामी मोहन भागवत जेन-जी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वाधिक विचारशील, प्रगतिशील और विचारवान पाया। 
कुछ लोगों को जेन-जी की पोर्नगालियों से आपत्ति हुई। वे उनकी प्रगतिशीलता को समझ नहीं सके। प्रधानमंत्री ने पोर्नगालीबाज नारीशक्तियों को क्षमा कर दिया और उन्हें गले लगाने की इच्छा व्यक्त की।  
किसी ने कहा स्त्री कैसी भी हो, किसी भी स्थिति में स्त्री के चरित्र पर लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए। 
जेन-जी आंदोलन में पोर्नगालीबाज लड़कों से अधिक संख्या लड़कियों की रही। 
जब कोई गाली देता है तो वे गालियाँ ही स्त्रीप्रधान होती हैं, यथा माँ की गाली, बहन की गाली या स्त्री जननांगों के वीभत्स क्रियास्वरूपों की गाली...। गाली कभी पुरुष प्रधान नहीं होती। स्त्री मर्म है, सर्वाधिक चोट मर्मस्थल में ही लगती है। इसीलिए पुरुषवाचक गाली नहीं बनी। जेन जी लड़कियाँ भी स्त्रीसूचक गालियाँ ही देती हैं। गाली स्त्रीवाचक होती है पर यह अपमान की पराकाष्ठा है पुरुष के लिए। इसी अपमान में छिपा है स्त्री का महत्व और उसकी प्रतिष्ठा। अपमान तो वह पीड़ा है जो शब्दशर से बिंधकर उत्पन्न होती है। शर स्त्री को चुभता है, पीड़ा पुरुष को होती है। स्त्री-पुरुष संबंधों के इस अति संवेदनशील पक्ष को भारतीय ही समझ सकते हैं जहाँ पैराडाॅक्स की भरमार है। 
...तो स्त्रीसूचक गालियाँ स्त्री से अधिक पुरुष को घायल करती हैं। गाली देना पाप है परंतु यह पुरुष की अपेक्षा स्त्री महत्व और उसके सम्मान को ही अधिक इंगित करता है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति

 अतिविद्वान ने कहा

मत करो राजनीति की बातें

वातावरण दूषित होता है

मछलियों की बातें करो

तुम मछुआरे हो,

घंटियों की बातें करो

तुम पुजारी हो,

दूध की बातें करो

तुम ग्वाले हो।

कैसे करूँ

इन सबकी बातें

समझ नहीं पाता मैं।

मछलियों के बीज डाले ही नहीं गये

गाँव के सरकारी पोखर में

जो पहले से थीं भी

उन्हें खा गये

मंत्री जी।

पीतल की घंटियाँ

चुरा ली हैं

मंदिर के

सरकारी सेवकों ने

दूध नकली बनता है

नेता जी की फैक्ट्री में

कोई कोना नहीं

जो मुक्त हो

सरकारी हस्तक्षेप से।

सरकार माने राजनीति

राजनीति माने नेता जी की भैंस

भैंस नेता जी की ही है

क्योंकि लाठी उनकी ही है।

भैंस लेने के लिए रुपयों की नहीं

लाठी की आवश्यकता है

वह लोकोक्ति तो सुनी है न!

"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

तो इस तरह सब कुछ

नेताओं का ही है

सरकार भी

राजनीति भी

देश भी

देश की सारी संपत्ति भी

और तुम कहते हो

अछूत है राजनीति

और राजनीति जो छू रही है सबको

उसका क्या!

केवल छू ही नहीं रही,

पकड़ कर मरोड़ दे रही है

कपड़े सा निचोड़ दे रही है

और तुम कहते हो

दूर रहो राजनीति से!

राजनीति को ही

दूर क्यों नहीं रखते

हम से

हमारे जीवन से

हमारे धर्म से

हमारे सुख-चैन से!

राजनीति

हर लेती है सब कुछ

हर किसी का

और हम

जाने दें उसे यूँ ही

बिना किये दंडित

बिना किये प्रक्षालित!

नहीं

हम निस्पृह नहीं रह सकते

तुम्हारी तरह अवसरवादी नहीं हो सकते।    

रविवार, 9 अगस्त 2026

धुंधज्ञान

          मठाधीश बनते ही काले अंग्रेज सर्वज्ञानी हो गये हैं । ज्ञान-विज्ञान-धर्म-अध्यात्म-नीति-विधान-न्याय-राजनीति-कला-पुरातत्व-इतिहास... सभी विषयों का एकछत्र मठाधीश हर काला अंग्रेज है । कोई भी विषय ऐसा नहीं जिसमें ये स्वयं को निष्णात न मानते हों । इनका ज्ञान अद्भुत है, धुंध से परिपूर्ण, स्पष्ट कुछ भी नहीं, आभासी भी नहीं, अदृश्य भी नहीं ।

काले अंग्रेजों का हठ है कि ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलाने के लिये धूम्रकेतु को सूर्य और सूर्य को धूम्रकेतु का पद एवं दायित्व दिया जाना आवश्यक है । सूर्य! अब तुम्हें अपने दायित्व धूम्रकेतुओं को सौंप देने चाहिये । ताम्रपत्रों पर लिख दिया गया है – “धूम्रकेतु को उसके नाम से पुकारा जाना अपराध माना जायेगा, उन्हें कूड़ा-कचरा, सड़ा हुआ, दुर्गंधित, और निरीह जैसे अर्थों को ज्ञापित करने वाले संबोधनों से ही संबोधित किया सकेगा । यही न्याय है । 

ब्रह्माण्ड के सम्राट रहे धूम्रकेतु अनायास ही तीन या पाँच हजार वर्ष पूर्व शोषित, वंचित और पीड़ित हो गये, उनकी प्रजा में जो सूर्य थे उन्होंने अपने सम्राटों पर अमानवीय और अब्रह्माण्डीय अत्याचार किये इसलिये अब सभी धूम्रकेतुओं को सूर्य बना देना होगा, धरती पर हमारा अवतार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है । दबंग सूर्यों के लिये इस विधान का पालन करना ही प्रायश्चित है और यही दण्ड भी ...दोनों एक साथ ।

काले अंग्रेजों ने शब्दों के नये अर्थ गढ़े, नयी परिभाषायें लिखीं, नये विधान रचे ...और सिद्ध कर दिया कि वे सर्वशक्तिमान हैं, वे ही परमपिता परमेश्वर और इस ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं । काले अंग्रेजों का दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर एक काल्पनिक शब्द है जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता, जिसका अस्तित्व होता है वह वे स्वयं हैं इसलिये उनका बनाया विधान ही सनातन सत्य है । उन्होंने नई-नई जातियाँ बनाकर जातियाँ समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि जातियाँ सदा के लिये बनी रहें । उन्होंने खर-पतवार के बीज बो कर खर-पतवार समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि खर-पतवार सदा अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होते रहें । उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि सूर्य तो इस ब्रह्माण्ड के पिंड हैं ही नहीं, ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर धरती पर टपक पड़े इसीलिये इनका बहिष्कार करना फिर धीरे-धीरे इन सबका समूल उच्छेद कर देना ही एकमात्र उपाय है ।

उद्घोषणा की जा चुकी है, संकल्प लिया जा चुका है ...कि अब काले अंग्रेज रुकेंगे नहीं, धूम्रकेतुओं को सूर्य के दायित्व सौंपने के लिये ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर टपके सूर्यों का उन्मूलन हो जाने तक उनके विविध अभियान चलते ही रहेंगे ।

अत्याचारी सूर्यो! तुम वापस जाओ, जहाँ से आकर टपके थे वहीं ...अखिल ब्रह्माण्ड की सीमाओं से बाहर । यदि तुम ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं गये तो हमारे धूम्रकेतु और ब्रह्माण्ड के मूलपिण्ड एक साथ मिलकर तुम्हारी बेटियों को खींचते हुये ले जायेंगे... कहीं भी, अपने घर... या झाड़ियों में... या किसी खण्डहर में... फिर उनके साथ दुष्कर्म करेंगे और फिर उनकी हत्या कर देंगे । जो धूम्रकेतु किसी सूर्य की ओर उँगली से संकेत कर देगा उसे लाखों चंद्रमा उपहार स्वरूप दिये जायेंगे, वहीं सूर्य की आँखें फोड़ दी जायेंगी, हाथ-पाँव काट दिये जायेंगे और जीवन भर यूँ ही मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा ।

 

          ...और काले अंग्रेजों को यह भी दृढ़ विश्वास है कि धरती पर छायी धुंध पूरे ब्रह्माण्ड की धुंध है, सूर्य इस धुंध से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा । सूर्य का अंत निश्चित है । अब ब्रह्माण्ड में केवल धूम्रकेतुओं का ही साम्राज्य होगा।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

अलोकतंत्र की ओर बढ़ता भारत

जब जनता से लेकर  प्रधानमंत्री तक स्वार्थ में डूबे हुए हों, व्यक्तिगत और लोकजीवन से नैतिकता का तीव्रता से क्षरण हो जिसे रोकने के किसी भी स्तर पर कोई प्रयास ही न किए जाते हों और सत्ताधीशों में सत्ता पर अपनी स्थाई पकड़ बनाने के लिए समाज को विघटित किये जाने की उद्दाम इच्छा हो तब निश्चित ही लोकतंत्र के भीड़तंत्र में रूपांतरित होने की आशंकायें बलवती होती हैं। हम लोकतंत्र के स्वप्न के साथ छद्म लोकतंत्र को तांडव करते हुए देख रहे हैं।

हम चीन की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें पर उसके सामने झुकने के लिए विवश होते रहे हैं, यही सच है। भाजपा ने लोकतंत्र को लोहे के संदूक में बंद कर दिया है, शासक वर्ग में निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता तो जनता में अराजकता और असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है। 

यदि भारत में जातिवाद का अंत हो सके, आरक्षण समाप्त हो सके, प्रतिभा को अवसर मिलना सुनिश्चित हो सके, वैज्ञानिक सुरक्षित और निर्भय हो सकें, निर्बल का शोषण थम सके और हम चीन से होड़ करने की स्थिति में आ  सकें.... तो हमें कम्युनिस्ट शासन भी स्वीकार है। 

लोकतंत्र आपने आप में एक छल है। सच तो यह है कि शासित और शासक एक सामाजिक बाध्यता है। हर व्यक्ति आत्मनियंत्रण और नैतिक नहीं हो सकता इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है जो लोकतंत्र से कभी संभव नहीं। हमें एक सभ्य कुलीन तंत्र की आवश्यकता है, ....या फिर चीन की तरह अलोकतंत्र ...जो नियंत्रण भी करता है, वैज्ञानिक उन्नति भी करता है, व्यापार भी करता है, और आवश्यक होने पर सबको आँख भी दिखाता है। 

रविवार, 2 अगस्त 2026

झमाझम वर्षा

अब की वारिश

झमाझम बरसीं

पोर्नगालियाँ

नरों के मुख से

उससे भी अधिक 

नारियों के मुख से

महामानव धन्य हुये

देश धन्य हुआ

सभ्यता धन्य हुयी

संस्कृति धन्य हुयी

भीगकर

गालियों की बरसात में। 

अन्याय भी धन्य हुआ

जानकर

कि क्षमा कर दिया है 

नानबायोलाॅजिकल भगवान ने 

सभी गालीबाजों को

और लग जाना चाहते हैं उन सबके गले

हँसते हुये

किंतु...

छोड़ देना चाहते हैं 

गोलियाँ खाने के लिए 

राष्ट्रप्रेम के सच्चे दीवानों को 

स्वतंत्र कर देना चाहते हैं

असुरों को 

मारने के लिए पत्थर

हर उस व्यक्ति को

जो करेगा देश की 

सच्ची सेवा 

और न्याय की माँग।

अब की वारिश

उमस 

ताप देने लगी है 

ज्वालामुखी के 

बहते लावे की तरह।




शनिवार, 1 अगस्त 2026

मोरक्को की स्पेन में बलात् घुसपैठ

यह स्पष्टरूप से एक अयुद्धक अतिक्रमण है जो मोरक्को द्वारा स्पेन में किया गया है । लगभग साठ हजार युवकों को मोरक्को की सीमा से स्पेन के सेउटा में बलात् प्रवेश के लिये भेजा गया । इनमें से अधिकांश अपराधी हैं जिन्हें मोरक्को सरकार ने स्पेन में घुसने के लिये जेल से मुक्त कर दिया । स्पेन इस षड्यंत्र का पता लगाने में असफल रहा, उसकी पुलिस और सेना भी कुछ विशेष नहीं कर सकी । लगभग छिहत्तर उपद्रवी मारे गये, कुछ घुसपैठियों को मोरक्को वापस जाने के लिए विवश कर दिया गया फिर भी कुछ तो स्पेन में छिपने में सफल हो ही जायेंगे । यही मोरक्को की रणनीति है । 

मोरक्को से स्पैन की दूरी 1335 किमी है । दोनों देशों की सीमाओं के बीच सनुद्र में मात्र तेरह किलोमीटर की दूरी है । मोरक्को के पिनडेक से स्पेन के सेउटा पहुँचने के लिए मात्र पाँच किलोमीटर तैरना पड़ता है । यही कारण है कि पंद्रहवी शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस और मोरक्को के बीच युद्ध होते रहे हैं । मोरक्को के लोग आज भी स्पेन को यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में मानते हैं । कभी ईसाई बहुल रहा स्पेन मुस्लिम बहुल होता जा रहा है। कई कारणों से मोरक्को के मुस्लिम स्पेन में बसना चाहते हैं । यह इस्लामिक विस्तार की भी एक रणनीति है कि अपने नागरिकों के सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दो कि वे पलायन करके ईसाई, यहूदी, पारसी और हिन्न्दू देशों में घुसपैठ के लिये बाध्य हो जायँ । इंग्लैंड, फ़्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों  ने जिन मुसलमानों को शरण दी आज वे उनके ही अस्तित्व के लिये संकट बन चुके हैं । यह शक्ति, षड्यंत्र और सत्ता का खेल है जिसमें क्रूरता सर्वोपरि है । भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ।  

मोरक्को-स्पेन क्षीण सीमा रेखा