नृवंशों के पलायन और ईरानियन नियोलिथिक फार्मर, मिडिल एशियाई स्टेपी और जाग्रोस आदि कई प्रकार के जेनोम की बहुलता की कहानी में एक जिज्ञासा उभरती है, जब सभी मनुष्य किसी एक ही आदिम स्त्री-पुरुष की संतान हैं तो भौगोलिक आधार पर उनके जेनोम्स में इतनी बहुलतायें क्यों और कैसे उत्पन्न हुई होंगी, और क्या बहुलता की यह शृंखला आज भी बढ़ती ही जा रही है!
यह एक रोचक जिज्ञासा है। यह सत्य है कि देश-काल-वातावरण के अनुसार लोगों को अपनी जीवनशैली में यथोचित परिवर्तन करने होते हैं जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है। यह एक तरह का सूक्ष्म और अपेक्षाकृत स्थायी अनुकूलन है जो अंततः किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की शारीरिक-मानसिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। नृवंशों के पलायन और बसावट की यह एक अंतहीन स्थिति है जो सदा से होती आई है, सदा होती रहेगी।हम सभी के पूर्वज घुमंतू से कबीलों, फिर गांवों, पुरों और नगरों से होते हुये राज्यों और देशों में बसते रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे भारत के कुछ वनवासी क्षेत्रों में झूमकृषि परंपरा वाली सभ्यता।
जीवनशैली में दीर्घकालीन परिवर्तन अंततः शरीर और जेनोम्स की संरचना में एनाटाॅमिकल परिवर्तन करते हैं जो उनकी फिजियोलाॅजिकल स्थिति को भी किंचित परिवर्तित करते ही हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सिकलिंग के प्रभावितों में मलेरिया की प्रतिरोधी क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। सिकलिंग के रोगियों को मलेरिया नहीं होता। उनमें पाई जाने वाली हीमोग्लोबिनोपैथी का अस्तित्व ही मलेरियारोधी होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है।
अब हम ब्राह्मणों के विदेशी होने की सत्यता पर विचार करेंगे। जेनेटिक विश्लेषण बताते हैं कि वास्तव में हर देश का हर नागरिक विदेशी नृवंशों का मिश्रण होता है। जंबूद्वीप निवासी ब्राह्मणों में भी मिश्रित जेनोम्स पाये जाते हैं। एक समय जंबूद्वीपीय सभ्यता अपने किंचित स्थानीय अनुकूलनों के साथ एशिया के एक विस्तृत भूभाग पर कुछ साम्यताओं के साथ प्रचलित हुआ करती थी, जिसमें यव (जौं) एवं तंडुल प्रधान कृषि का बड़ा योगदान था। लैंडलाॅक क्षेत्र के निवासियों के विपरीत समुद्रतटीय क्षेत्रों के निवासियों की जीवन शैली में जलीय जीवजंतुओं और वानस्पतिक उपलब्धताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसी तरह की अन्य भिन्नताओं ने भी कई प्रकार के जेनोम्स को जन्म देकर कई नृवंशों को जन्म दिया। तो हम ब्राह्मणों के जेनोम्स का विकास जाग्रोस पर्वत (वर्तमान ईरान) से लेकर सिंधुघाटी तक के क्षेत्र एवं बहुत थोड़ी मात्रा में वर्तमान एशिया और वर्तमान यूरोप के एशियाई सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के मिश्रण से माना जाता है। जेनोम्स में परिवर्तन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।
एक समय तो भारत का सीमा विस्तार तिब्बत से लेकर पश्चिम में बैक्ट्रिया और जाग्रोस तक था ही। क्या तब के अफ़ग़ानिस्तान और जाग्रोस के आसपास बसे लोग भारतीय नहीं थे! क्या आज के पाकिस्तानियों को भारतीय नृवंशों का वंशज नहीं माना जायेगा!
जाग्रोस पर्वत शृंखला से निकलने वाली कारुन, करखेह और देज नदियों के उपजाऊ क्षेत्रों में बसे "जाग्रोस जेनोम युक्त" लोगों का सिंधु नदी घाटी के लोगों से मेल-मिलाप स्वाभाविक है, इसे तत्कालीन परिस्थितियों की दृष्टि से देखिये, कौन विदेशी है!
मैं हिंदी पट्टी की जनजातीय सहित सभी समुदायों और अफ्रीकी जनजातीय लोगों की जीवनशैली, परंपराओं, गीतशैली, और उच्चारण में अद्भुत समानता से सदा अचंभित होता रहा हूँ। हमारे उच्चारण और जीवनशैली में अफ्रीका हमारे बहुत समीप है जबकि यूरोप से हमारा कुछ भी साम्य नहीं मिलता।
मनुस्मृति की सुनी सुनाई एक-दो बातों को लेकर मनुस्मृति के प्रति घृणा और तिरस्कार की तरह ही जेनेटिक्स जैसे क्लिष्ट विषय का मात्र एक वाक्य पढ़कर और शेष संदर्भ को छिपाकर कोई नया सत्य नहीं गढ़ा जा सकता।
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