ग्वालियर में हेड पोस्ट आॅफिस की सीढ़ियों के पास लोगों को आते-जाते थोड़ी सी आशा, बहुत सी निराशा और विवशता के विशाल पर्वत पर थक कर बैठे हुये एक मैले-कुचैले वयोवृद्ध "लिखवाल" को प्रायः देखा करता था। मैं सोचता, नगरों में भी कुछ लोग हैं जो चिठ्ठी नहीं लिख सकते, न पढ़ सकते हैं, उनके लिए यह काम करने वाले उपलब्ध लोग विकास को हर पल थप्पड़ मारते से नहीं लगते क्या!
ग्वालियर वाले लिखवाल केवल चिठ्ठी ही नहीं लिखा करते, आवेदन पत्र भी लिख दिया करते थे, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में।
बी.एससी. में प्रवेश लेने से पहले तक अपने पड़ोसी के लिए यही काम मैं भी किया करता था, कहीं से आई चिठ्ठी पढ़ कर सुनाना, फिर उसका उत्तर लिखना। दाई कहतीं-" जो शुरू में लिखा जाता है वह सब लिख दो"। ...यानी ...को आशीर्वाद, ...को चरण छू कर पायलागन, ....को बहुत-बहुत प्यार, ...। मैं लिखता, "सबको यथायोग्य", फिर लिखता "अत्र कुशलं तत्रास्तु"।
कभी-कभी किसी चिठ्ठी के अंत में दाई यह भी लिखवातीं -"थोड़ा लिखा बहुत समझना"। किसी को बुलाना होता तो वे लिखवाया करतीं -"खाना वहाँ खाना तो पानी यहाँ आकर पीना"।
यह सत्तर का दशक था। एक दिन देखा, सीढ़ियाँ थीं पर वे वयोवृद्ध नहीं थे। उस दिन एक उदासी मेरे पास आकर जो बैठी ...तो रात में सोने के बाद ही उठकर जा सकी।
यह सन् १९४७ के बाद का भारत था। आज सोचता हूँ, हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का कितना सम्मान होता है!