शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

आरक्षण

मालिक अमित शाह ने बोला...

नानबायोलाॅजिकल मोदी ने बोला... 

भगवान मोहन भागवत ने बोला...

भाजपा के सवर्णों ने बोला...

आरक्षण समाप्त नहीं होगा

...भले ही देश समाप्त हो जाए।

आठवले भी चढ़ गया

चने के झाड़ पर 

चढ़-बढ़ कर गुर्राया

जो आरक्षण का विरोध करे

उसे देश से भगाओ। 

तब पता चला

देश को मिल गया है

एक नया मालिक।

ए हो मर्दे

काहें के गुर्रा रहल बाड़ऽ

सबको पता है मालिक जी   

आरक्षण अटल है

आरक्षण ही तो 

चुनाव जीतने की संजीवनी है

लोकतंत्र का मंत्र है

प्रतिभापलायन का विधान है

लूटमार का रहस्य है

आरक्षण धर्म है

आरक्षण मर्म है

आरक्षण से ही 

दुष्ट नेताओं की विजय है

जे जे जे जे जेएएएएएए आरक्षण।

रविवार, 26 जुलाई 2026

त्यागपत्र

 उसने त्यागपत्र दिया 

सत्य के लिए नहीं, असत्य के लिए

न्याय के लिए नहीं, अन्याय के लिए

और स्थापित कर दिया

कि "जयते सर्वदा असत्यमेव"

उसने बनाये 

अकीर्ति के नये सोपान

प्रोत्साहित करने 

असभ्यता और पतन को 

अश्लील गालियों और अराजकता को 

अन्याय और अत्याचार को

ताकि हो सके 

एक और विभाजन

धरती का

समाज का। 

विजयोन्माद में 

अश्लीलता नाच रही है

एल.जी.बी.टी. नाच रहे हैं

ढपली बजने लगी है

नारे गीत बन गये है

भारत तेरे टुकड़े होंगे...

फलाने को मुक्त करो...

ढिमाके को सम्मानित करो...

इसे पद्मश्री दो

उससे छीन लो।

हिंदू भगाओ देश बचाओ...

राजा हर्षित है

प्रजा मूर्छित है 

भारत 

हर दिन नया विश्वगुरु बनता है

चलो 

हम कहीं और चलें

गुरु तो हर कोई है

हम अच्छे छात्र ही बन जायें। 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

क्योंकि

 दूर से लगा

मानव हैं,

पास जाकर देखा

तो सब भेड़िये निकले।

बिल्लियों ने भी

सीख लिया है

भौंकना

क्योंकि कुत्ते

मिमियाने लगे हैं।

सौंपी थी पतवार

बड़े भरोसे से जिन्हें

डुबो दी नाव उन्होंने ही 

पहुँचते ही बीच धार ।

सीता

कहाँ-कहाँ

और किस-किस से बचेगी

तब एक रावण था

आज साधु के वेश में 

न जाने कितने रावण निकले ।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

ब्राह्मण की हत्या

जनता की माँग पर

माँ की आह पर... 

खेला जाने लगा है

एक और नाटक...

नहीं, 

नाटकों की शृंखला।

लिखी जा चुकी है पटकथा 

अन्यायपूर्ण न्याय की  

मिटाये जा रहे हैं

हत्या के साक्ष्य। 

राजा ने 

लोकतंत्र को 

आज फिर लटका दिया है

फाँसी पर 

आओ, हम सब उत्सव मनायें

अपने स्वाभिमान 

और अधिकारों की अर्थी सजायें

क्योंकि

मीलाॅर्ड ने झिड़क दिया 

डाँट कर चुप कर दिया  

साक्ष्य देती 

भोजपुर की स्त्रियों को  

...इस आश्वासन के साथ

कि बिना सुने साक्ष्य

वे कर देंगे ऐसा न्याय

जो नहीं होगा न्याय।

जानकर भी

देखकर भी

हम नहीं मानना चाहते 

कि हत्यायें 

हमारी नियति हो गई हैं 

न्यायालय के बाहर 

शरीर की 

और न्यायालय के भीतर 

सत्य की। 

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

लिखवाल

 ग्वालियर में हेड पोस्ट आॅफिस की सीढ़ियों के पास लोगों को आते-जाते थोड़ी सी आशा, बहुत सी निराशा और विवशता के विशाल पर्वत पर थक कर बैठे हुये एक मैले-कुचैले वयोवृद्ध "लिखवाल" को प्रायः देखा करता था। मैं सोचता, नगरों में भी कुछ लोग हैं जो चिठ्ठी नहीं लिख सकते, न पढ़ सकते हैं, उनके लिए यह काम करने वाले उपलब्ध लोग विकास को हर पल थप्पड़ मारते से नहीं लगते क्या! 

ग्वालियर वाले लिखवाल केवल चिठ्ठी ही नहीं लिखा करते, आवेदन पत्र भी लिख दिया करते थे, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में। 

बी.एससी. में प्रवेश लेने से पहले तक अपने पड़ोसी के लिए यही काम मैं भी किया करता था, कहीं से आई चिठ्ठी पढ़ कर सुनाना, फिर उसका उत्तर लिखना। दाई कहतीं-" जो शुरू में लिखा जाता है वह सब लिख दो"। ...यानी ...को आशीर्वाद, ...को चरण छू कर पायलागन, ....को बहुत-बहुत प्यार, ...। मैं लिखता, "सबको यथायोग्य", फिर लिखता "अत्र कुशलं तत्रास्तु"। 

कभी-कभी किसी चिठ्ठी के अंत में दाई यह भी लिखवातीं -"थोड़ा लिखा बहुत समझना"। किसी को बुलाना होता तो वे लिखवाया करतीं -"खाना वहाँ खाना तो पानी यहाँ आकर पीना"। 

यह सत्तर का दशक था। एक दिन देखा, सीढ़ियाँ थीं पर वे वयोवृद्ध नहीं थे। उस दिन एक उदासी मेरे पास आकर जो बैठी ...तो रात में सोने के बाद ही उठकर जा सकी।

यह सन् १९४७ के बाद का भारत था। आज सोचता हूँ, हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का कितना सम्मान होता है!