दूर से लगा
मानव हैं,
पास जाकर देखा
तो सब भेड़िये निकले।
बिल्लियों ने भी
सीख लिया है
भौंकना
क्योंकि कुत्ते
मिमियाने लगे हैं।
सौंपी थी पतवार
बड़े भरोसे से जिन्हें
डुबो दी नाव उन्होंने ही
पहुँचते ही बीच धार ।
सीता
कहाँ-कहाँ
और किस-किस से बचेगी
तब एक रावण था
आज साधु के वेश में
न जाने कितने रावण निकले ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.