गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

नवबोधवाद का रुदन

            अथ प्रेमचंद अपहरण कथा...

हंस के मंच पर प्रेमचंद जयंती २०२५ समारोह में मृदुला गर्ग और सुधीर चंद्र को सुनने के पश्चात् मन प्रणोदित हुआ जिससे कुछ नवविचार तत्काल प्रभाव से उत्पन्न हुये जिनमें एक है नवबोधवाद और दूसरा है नवभाषावाद। इसमें कुछ और विचार भी जोड़े जा सकते हैं यथा नवप्रतीकवाद, नवहलाहलवाद, नवक्रांतिवाद... आदि।  

पहले सुधीर चंद्र की बात करते हैं जो भारतीयराष्ट्रवाद और हिंदूराष्ट्रवाद से बहुत व्यथित हैं। उन्होंने उद्घाटित किया कि नवराष्ट्रवाद भी हिंदूराष्ट्रवाद से ही प्रभावित है इसलिये वे इसका समर्थन नहीं करते। कदाचित् इसी कारण से वे सुधीर चंद्र होकर भी प्रथमदृष्ट्या मुसलमान जैसा दिखने का प्रयास करते हैं, मैं इसे नवप्रतीकवाद मानता हूँ। नवप्रतीकवाद, अर्थात् प्रतीकों में घालमेल, इसका अर्थ यह हुआ कि अब रासायनिक सूत्रों के प्रतीकों में भी मिलाजुला (मिश्रित, अविशिष्ट, घालमेलयुक्त) परिवर्तन करने का हठ होना चाहिये इसलिये आवर्त सारिणी की भी कोई आवश्यकता नहीं, सभी तत्वों के लिये एक ही नाम, एक ही प्रतीक होना चाहिये जिससे एकरूपता बनी रहे और सभी तत्वों का प्रतिनिधित्व भी सम्भव हो सके। मिथक टूटने चाहिये ...कि आवर्तसारिणी के बिना रसायनशास्त्र को समझा नहीं जा सकता। आवर्तसारिणी मनुवाद जैसा ही हठ है जिसका सर्वनाश होना ही चाहिये।

नवप्रतीकवाद की अवधारणा यह भी संदेश देती है कि राष्ट्रीय ध्वज जो अपने-अपने राष्ट्रों के प्रतीक हैं, उनमें भी घालमेल होने का हठ होना चाहिये। विश्व के सभी राष्ट्रों के ध्वजों को मिलाकर एक मिश्रित ध्वज तैयार होना चाहिये जिससे पृथक-पृथक राष्ट्रों के मिथक तोड़े जा सकें। यह विश्वध्वज ही सभी राष्ट्रों में विश्वबंधुत्व और विश्वराष्ट्रवाद को स्थापित करने वाला होगा। विशिष्ट पहचान, विशिष्ट प्रतीक, विशिष्ट महापुरुष, विशिष्ट भाषा, विशिष्ट संगीत, विशिष्ट भोजन, विशिष्ट वेश-भूषा ...ये सभी तत्व मनुवाद की तरह विशिष्ट राष्ट्रवाद का संदेश देते हैं, साम्यवाद की तरह पूरे विश्व का संदेश नहीं देते, इसलिए अब पूरे विश्व की बात होनी चाहिये। अरब में भी इग्लू का निर्माण होना चाहिये और आर्कटिक एवं कानाक क्षेत्रों में भी अरब की तरह ढीले कुर्ते पहने जाने चाहिये, यही है सच्चा मानववाद एवं समानतावाद। जब तक हमारे आचरण में इस तरह की समानता नहीं आती तब तक प्रेमचंद जयंती मनाने का कोई अर्थ ही नहीं है।

नवबुद्धिवाद यह अपेक्षा करता है कि किसी भी गीत में सुर में सुर मिलाना लोकतंत्र को समाप्त करना है, प्रत्युत, सुरों में असुरों का, रागों में कोलाहल का और सत्य में छल का घालमेल करना होगा, यही है नवक्रांतिवाद। नवबोधवाद परिवर्तन की अपेक्षा करता है, दूध तो प्रतिदिन पीते ही हैं बीच-बीच में मदिरा का सेवन भी किया जाना चाहिये अन्यथा दूध अहंकारी हो जायेगा, दूध में घुला कठोर मनुवाद आमाशय की कोमल भित्तियों से चिपक जायेगा और वह लोकतंत्र को समाप्त कर देगा। आज विश्व की आवश्यकता है कि किसी भी तरह लोकतंत्र को जीवित रखना ही है अन्यथा एक दिन जो मुट्ठी भर नवबोधवादी बचे हैं वे भी समाप्त हो जायेंगे। हम विचारक हैं, हम चिंतक हैं, हमारा जीवित रहना, हमारा अस्तित्व में बने रहना आवश्यक है। हमारे समाप्त हो जाने से मनुष्य समाज समाप्त हो जायेगा और विवेकशील प्राणी होने के कारण मनुष्य समाज को बचाये रखना हमारा नैतिक दायित्व है।

मृदुला गर्ग जी को डरे हुये लोगों से भी डरना पड़ रहा है, कुछ-कुछ दासानुदास की तरह । सत्ता में बैठे हुये लोग डरे हुये लोग हैं और इन्हीं डरे हुये लोगों ने मृदुला गर्ग को भयभीत कर रखा है जिससे वे व्यथित हैं और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण हो गया है। वे चुटकुलावाद और विदूषकवाद से भी पीड़ित हैं। उनकी पीड़ायें अनंत हैं किंतु मनुवादियों के अत्याचारों के कारण वे अपनी पीड़ा व्यक्त भी नहीं कर पा रही हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका मृदुला जी फ़िलिस्तीन की पीड़ा के समर्थन में प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं जिससे उनकी व्यथा अंतहीन हो गयी है।

बांग्लादेश की हिंदू महिलाओं के यौनौत्पीड़न और नरसंहार की मिथ्या सूचनाओं के पाखंड से उपजे मनुवादी कोलाहल में फ़िलिस्तीन के हलाहल के लिये कोई चिंतित नहीं है, हिंदी साहित्यकारों का लेखकीय धर्म है कि वे फ़िलिस्तीन और हमास के समर्थन में सामने आयें और केंद्र की सत्ता में बैठे मनुवादियों को धूल चटा दें। 

सुधीर जी और मृदुला जी के लिये हिंदी एक दरिद्र भाषा है इसलिए वे हिंदी उन्मूलन के लिये कटिबद्ध हो आगे बढ़ रहे हैं। ये लोग अपनी अभिव्यक्ति में यथासम्भव अरबी, फ़ारसी और इंग्लिश के शब्द पिरोते रहते हैं जिससे ये नयी पीढ़ी को अपनी व्यावहारिक भाषा से यह संदेश देने में सफल हुये हैं कि उन्हें शुक्रिया, तहज़ीब, बदलाव और ऐसे ही कई शब्दों के लिये हिंदी में कोई शब्द मिला ही नहीं। यह हिंदीभाषा के उन्मूलन का हिंदीभाषियों और हिंदी साहित्यकारों का एक सफल प्रयास है। उर्दू को प्रतिष्ठित करना नवभाषावाद है, हिंदी और संस्कृत तो हिंदुओं और ऋषियों की भाषायें हैं, इनका किसी के जीवन में क्या उपयोग! उर्दू न बोली जाय तो पीड़ा होती है, हिंदी को दीर्घकालीन मूर्छना में धकेलते रहना प्रसन्नता का विषय है।

नवबोधवादी खिचड़ीभाषाप्रेमी हैं, इन्हें खीर से घृणा होती है। यह उचित भी है, असुरत्वप्रेम क्रांतिवाद का जीवनीयतत्व है, बेसुरे गीत में जो आनंद है वह शास्त्रीय संगीत में नहीं मिल सकता। शात्रीय संगीत भी हिंदूराष्ट्रवाद का एक हठ है, वीणा की भी क्या आवश्यकता है? ध्वनि ही तो उत्पन्न करनी है, किन्हीं भी दो पदार्थों को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है, यह वीणा या वंशी का ही हठ क्यों? सुधीर जी इसी परम्परावादी हठ को समाप्त करना चाहते हैं । हठ का अधिकार तो केवल नवबोधवादियों को ही है, क्योंकि वे बहुत बड़े चिंतक, बहुत बड़े विचारक और बहुत बड़े नवबाद के पुरोधा हैं।

 

मृदुला गर्ग और सुधीर चंद्र की मनोदशाओं पर मोतीहारी वाले मिसिर जी की दूरभाष पर प्राप्त प्रतिक्रिया – “कुछ विद्रोहियों ने बाबा साहब भीमराव की तरह प्रेमचंद का भी अपहरण कर लिया है और अब वे प्रेमचंद जयंती के नाम पर नवबोधवाद का रुदनकरके आत्ममुग्धता के भँवर में स्वयं के चिंतक होने के भ्रम का पोषण कर रहे हैं । कम से कम स्त्रीशोषण और साम्प्रदायिक नरसंहार जैसे विषयों पर हिंदी पाठकों के समक्ष तस्लीमा नसरीन भी हैं और मृदुला गर्ग भी, आप किसी एक ध्रुव के साथ ही खड़े हो सकते हैं

 

कामरेड

सत्ता और समाज के रहस्यों को समझने के लिए जिज्ञासु व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार तो कम्युनिस्ट होना ही चाहिए” – मोतीहारी वाले मिसिर जी।

आप राष्ट्रभक्त हो सकते हैं पर एक निष्ठावान राष्ट्रभक्त होने के लिए आपको किसी कामरेड की गली से भी होकर जाना ही चाहिए। उस गली में न्याय और अधिकार के जिज्ञासुओं को प्रभावित करने के लिए रामोजी फ़िल्म सिटी की तरह वे सारे उपकरण और परिदृश्य होते हैं जिन्हें छायांकन के पश्चात कोई पूछता भी नहीं।

सच्चे कामरेड्स का संसार अलीजॉन की दुकान पर बिकने वाली चीन की लाल किताबसे प्रारम्भ होकर विश्वविद्यालयों की बौद्धिक चर्चाओं, साहित्यिक नुक्कड़ों और रंगमंच से होते हुये बस्तर के जंगलों तक विस्तृत होता है। विश्वविद्यालय का कामरेड अंग्रेजी बोलता है, छात्रनेता कामरेड छात्रों की सभाओं में उर्दू बोलता है और बंदूक वाला कामरेड बस्तर के जंगलों में गोंडी बोलता है। इन सभी बोलियों में आग एक उभय तत्व है। बंदूक से निकलने वाली आज़ादी ने न जाने कितने लोगों को आज़ाद किया है ...उनकी आत्मा को ...उनके शरीर से। कुछ चिंतक-विश्लेषक मानते हैं कि कॉमरेड वाली आज़ादी की परिभाषायें कुछ सीमाओं से घिरकर सदा बंदी बनी रहती हैं ।

पेरियार वाली आज़ादी, स्टालिन वाली आज़ादी, हम छीन के लेंगे आज़ादीऔर भारत तेरे टुकड़े होंगेकी धमकियों के बीच से निकलकर कुछ लोग बिखर से गये हैं, कुछ आगे, कुछ पीछे और कुछ साथ-साथ चलने लगे हैं। मदिरा सेवन न करने वाले की अपेक्षा मद्यत्यागी कहीं अधिक मदिराविरोधी होता है।

इतना सब जान लेने के पश्चात् किसी मोड़ का आना स्वाभाविक है। यह मोड़ दायें-बायें हो सकता है ...या फिर पीछे भी। यह क्रांति से अधिक संक्रांति है।    

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

भाषा प्रहार

कुछ रीड करें कुछ लर्न करें

डॉगी से शेकहैंड करें

ब्रेकफ़ास्ट लें लंच करें

ड्रिंक करें और डिनर करें

गुड-मॉर्निंग हाय-हलो भी करें

हिंदी के पर नोच-नोच कर

हिंग्लिश के पैबंद लगायें

कोई तो विद्वान बता दे

कैसे हिंदी दिवस मनायें ।

 

गर्व नहीं होता है तो क्यों

उड़ती-उड़ती बात चलायें  

झूठ-मूठ की धुँधली रेखा

पीटें और पाखण्ड मनायें   

अंग्रेजी में लिखें बधाई

अरबी-पर्सी-तुर्की गायें

फिर भी हिंदी दिवस मनायें ॥

 

पीछे छूट गयी हिंदी क्यों

लोकबोलियाँ बिखर रहीं क्यों

हिंदी से नित बढ़ती दूरी

गर्व नहीं होता है तो क्यों

कहने को हिंदी दिवस मनायें ॥

 

न्यायालय में चलें खोजने

समाचार भी उलटें-पलटें

अभिलेखों में संवादों में

नेताओं के भाषण में

कविता और कहानी में

कहीं दिखायी पड़ें तो रुककर

हिंदी के शब्द उठा लेना

तुम हिंदी दिवस मना लेना ।

न्याय

 

सर्वशक्तिमान को

क्यों होनी चाहिये कोई आवश्यकता

स्वयं के देखभाल की !

सर्वशक्तिमान है

तो क्या करने आया था पाषाणमूर्ति में

बना रहता सर्वशक्तिमान अनंत में !

इतना अशक्त कैसे हो गया कि अपनी ही

खंडितमूर्ति को भी नहीं कर सका

पुनः अखंड !  

....विचार किया बुद्ध के अनुगामी ने

....मंथन किया बाबा साहेब के अनुचर ने

....निर्णय किया संविधान के पुजारी ने

फिर भगा दिया

न्यायमंदिर में आये

विष्णुमंदिर के पुजारी को  

देकर खण्डितन्याय

कि जाकर कहो विष्णु से

वही करेंगे समाधान ।

महान हो गये न्यायमूर्ति

महान हो गये संविधान के पुजारी

स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा

उनका नाम

घर-घर में लगेंगे उनके चित्र

चौराहों पर लगेंगी उनकी पाषाणमूर्तियाँ

जैसी लगी हैं

बाबा साहेब की

भगवान बुद्ध की ।

किंतु समझ नहीं सका

एक वृद्ध अधिवक्ता

जिसने उछाल दी एक पादुका

न्यायमूर्ति की ओर

खंडितन्याय के विरोध में ।

दंड मिला अधिवक्ता को भी

छीनकर उसके

व्यावसायिक अधिकार

न्याय हो गया धन्य ।

सबने देखा, सुना, संदेश पाया

कि गुरु है पाषाण

अपेक्षाकृत स्थायी भी

कि लघु है पत्र

अपेक्षाकृत अस्थायी भी । 

पाषाण में विष्णु है

पत्र में संविधान है ।

क्षरित हो सकता है पाषाण

जीर्ण-शीर्ण हो सकता है पत्र

जिसमें लिखा है संविधान ।

अब नहीं करेगा कोई संरक्षित

किसी भौतिक मूर्ति को

और

संविधान की भौतिक प्रतियों को ।

अब नहीं रहेगी आवश्यकता

पुरातात्विक महत्व की भी

...संदेश जो मिल गया है

न्यायमूर्ति जी का ।

और तुम

न्यायमूर्ति जी को मत दिखाना

लोकमत का यह पत्रकाव्य  

नहीं तो मुझे भी मिल जायेगा

कोई खंडितन्याय

जीवन भर का कारावास

या मृत्युदंड ।  

रविवार, 10 अगस्त 2025

युद्ध, इतिहास पुनर्लेखन और विपक्षी धर्म

     टैरिफ़-युद्ध

क्या सचमुच भारत सरकार अत्याचारी ट्रम्प के आगे घुटने टेकने के लिये तैयार हो रही है ? संचार माध्यमों पर कुछ इसी तरह की चर्चायें होने लगी हैं । यदि ऐसा होता है तो यह स्वीकार्य नहीं है । हम भारत को अमेरिकी अन्याय के सामने झुकते हुये देखने के लिये तैयार नहीं हैं ।

व्यक्तिगतरूप से मैंने अमेरिका को कभी भारत का हितैषी नहीं माना, उसकी नीतियाँ स्वार्थों और विश्वासघातों से भरी हुयी रही हैं । डोनाल्ड ट्रम्प का टैरिफ़-युद्ध उसके महाबली होने की घोषणा करता है । वह एक ओर तो बलपूर्वक विश्व भर का नियंत्रक बनना चाहता है तो दूसरी ओर विश्वशांति का पुरस्कार भी झपटना चाहता है ।

टैरिफ़-युद्ध में उसने भारत से आने वाली औषधियों जैसे अपने हितों के लिये अतिमहत्वपूर्ण चीजों को टैरिफ़ से मुक्त रखा है जबकि टैरिफ़ केवल उन्हीं चीजों पर लगाया है जो अमेरिका के लिये अतिमहत्वपूर्ण नहीं हैं । ट्रम्प ने भारत की अर्थव्यवस्था को नष्ट कर देने की घोषणा कर दी है । यह सम्भव नहीं है, भारत को कुछ क्षति होगी पर ट्रम्प ईश्वर नहीं है ...और न भारत का भाग्यविधाता ।

भारत की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न होगी या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि भारत के उद्योगपति और व्यापारी किस पथ पर जाना चाहेंगे ! दो ही पथ हैं या तो ट्रम्प के आगे नतमस्तक होकर भारत से निर्यात होने वाली सामग्रियों पर अमेरिका में लगने वाले टैक्स की भरपायी भारतीय व्यापारी मूल्य में कटौती करके करें या फिर विश्व के अन्य देशों में निर्यात की सम्भावनाओं पर शोध करें ।

विदित हुआ है कि अमेरिकी व्यापारियों ने टैरिफ़ की तुल्य राशि की कटौती वस्तु के मूल्य में से करने की माँग कर दी है । इसका अर्थ यह हुआ कि टैरिफ़ का जो भुगतान अमेरिकी उपभोक्ताओं को करना चाहिये वह भारतीय व्यापारियों के सिर पर डाले जाने की तैयारी हो रही है । ऐसी स्थिति में टैरिफ़ का भार भारत पर पड़ेगा । हम सरकार के साथ हैं पर अमेरिकी व्यापारियों की इस बरजोरी के आगे झुकने के लिये कदापि तैयार नहीं हैं । हमारे पास विकल्प हैं, हमें आगे बढ़ना ही होगा ।

 

*कौन है सच्चे इतिहास से उद्विग्न*

वे सभी अतिविद्वान उद्विग्न हैं जो भारत के छिपे हुये शत्रु और विदेशियों के चाटुकार हैं ! जिनका वर्चस्व रहा है अभी तक ...और जो भारत से भारतीयता और भारतीय संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेकने के लिये अहर्निश कटिबद्ध रहते हैं ।

इतिहासकी व्याख्या करते हुये इग्नू के पूर्व कुलपति रवींद्र कहते हैं - इतिहास तथ्यनहीं होता है, वह एक घटनाहै जिसकी व्याख्या अपने-अपने तरीके से की जा सकती है। अर्थात् भारत में आने वाले विदेशियों ने जो कुछ किया वे सब घटनायेंथीं जिनकी लोगों ने अपने-अपने तरीके, अपनी-अपनी समझ और अपने-अपने उद्देश्यों से व्याख्यायें कीं जिससे इतिहासबना । अरब, मुगल, पर्शियन, तुर्क आदि के द्वारा की गयीं घटनाओं की व्याख्याओं को स्वीकार करना या न करना पाठक की इच्छा पर निर्भर है पर पाठ्यक्रम से इन्हें हटा देना या इन्हें आक्रांता और लुटेरा बताना न्यायसंगत नहीं है ।

आप कहते हैं कि उन्होंने लूटपाट की, यौनदुष्कर्म किये, नरसंहार किये, यह आपकी व्याख्या है, मेरी नहीं । मैं कहता हूँ उन्होंने कुछ नहीं किया, उन्होंने भारत को समृद्ध करने में अपना योगदान किया । मैं पूछता हूँ क्या भारत के देशी राजाओं-महाराजाओं ने युद्ध में नरसंहार नहीं किये, लूट-पाट नहीं की, यौनदुष्कर्म नहीं किये ?

इग्नू के पूर्व कुलपति को पाकर इग्नू धन्य हो गया, भारत धन्य हो गया, …भारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास धन्य हो गया । ऐसे अतिविद्वानों का समाज या किसी शिक्षा केंद्र में क्या स्थान होना चाहिये, यह सुनिश्चित करने का काम तो सरकारों का है पर वे करेंगी नहीं अतः अब भारत की जनता को सुनिश्चित करना चाहिये ।

सत्य हिंदीके अतिविद्वान आशुतोष ने इतिहास परिमार्जन पर आदेश दिया है कि इतिहास में संतुलन बनाइये, ऐसा नहीं लगना चाहिये कि विदेशी शासकों को आक्रामक और शोषक प्रमाणित कर दिया जाय और भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को कोई क्षति हो या भारत में धार्मिक विद्वेष उत्पन्न हो, यह उचित नहीं होगा। अर्थात् यदि विदेशी मुस्लिम शासकों की बुराइयाँ लिखना चाहते हैं तो हिंदू राजाओं की भी बुराइयाँ लिखिये । यदि हिंदू राजाओं की अच्छाइयाँ लिखना चाहते हैं तो विदेशी मुस्लिम शासकों की भी अच्छाइयाँ लिखिये ताकि इयिहास में एक संतुलन बना रहे । अर्थात् इतिहास सत्य न हो कर संतुलन का उपकरण हो गया, संतुलन बनाइये, कुछ काट-छाँट करिये, कुछ जोड़िये ...। यही सत्य है, यही विद्वता है, यही इतिहास है ।

*विपक्ष का धर्म और दायित्व*

विपक्ष का धर्म राष्ट्रहित में सत्ता के साथ खड़े होना नहीं अपितु हर अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति में सत्ता को उखाड़ फेकना और स्वयं को सत्ता में युगों-युगों के लिये स्थापित करना है ।

विपक्ष का दायित्व सत्ता के कार्यों की समालोचना नहीं अपितु कटु-आलोचना है इसलिये विपक्ष का तो काम ही है प्रश्न पूछना । प्रश्न तो उठेंगे, और सत्ता को उनके उत्तर भी देने ही होंगे । सत्ता भाग नहीं सकती ।

विपक्ष द्वारा सत्ता से पूछे जाने वाले प्रश्न राष्ट्रहित में होते हैं या मतदाताओं को भ्रमित कर सत्ता छीनने के लिये ! प्रश्नों का उद्देश्य क्या हो ? सत्ता छीनना या राष्ट्रहित में सत्ता को सहयोग करना ।

सहयोग करके तो वे कभी सत्ता के पास नहीं आ सकेंगे (स्वस्थ राजनीति की आदर्श स्थापना भले ही हो जाय) इसलिये सत्ता को उख़ाड़ फेकने के लिये उनकी सार्री उठापटक हुआ करती है । अमर्यादित शब्द, असभ्य आचरण और चीखना-चिल्लाना यही सब देखती है नयी पीढ़ी और इसे ही राजनीति समझने लगी है । लालूपुत्र हों, सोनियापुत्र हों या उद्धवपुत्र ...यह पीढ़ी यही सब देख-सुनकर बड़ी हुयी है और अब उसी का पालन कर रही है ।

इस विषाक्त वातावरण में विपक्ष के कुछ सुलझे हुये सदस्यों ने सैन्यकार्यवाही सिंदूर के पक्ष में विभिन्न देशों में जाकर भारत का जो पक्ष रखा वह एक शीतल बयार की अनुभूति देने वाला है और एक आशा जगाने वाला भी ...कि अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है ।