शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

लाला जगदलपुरी को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए सरकार से निवेदन


सुपात्र को सम्मान दिए जाने का उत्तरदायित्व किसका है ? यह एक सहज प्रश्न आज फिर उभर कर सामने आया है. विगत वर्षों के अनुभवों से हमने सीखा कि सम्मान पाने वालों की पंक्ति में कुपात्र आगे रहते हैं और सुपात्र सबसे पीछे. शासन की ओर से दिए जाने वाले सम्मानों को पाने की प्रक्रिया किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को पीछे हटने के लिए बाध्य करती है. सम्मान, सुपात्र को आमंत्रित कर दिया जाना चाहिए जबकि हमें इसके लिए सरकार से निवेदन करना पड़ता है जोकि अपने आप में एक असम्मानजनक प्रक्रिया है. सम्मान पाने वालों का दुर्भाग्य है यह. लाला जगदलपुरी को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने के लिए अंचल के साहित्यकारों में एक लम्बे समय से बेचैनी देखी जा रही थी और जब प्रतीक्षा अनंत होने लगी तो अंततः अंचल के लोगों को सरकार से निवेदन करने के लिए आगे आना ही पड़ा. लाला जी के पक्ष में अंचल के सभी साहित्यकार सामने आ गए हैं. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है उत्तरबस्तर साहित्य परिषद् की ओर से रोशन वर्मा का हमारी चेतना झकझोरता हुआ यह आलेख- कौशलेन्द्र 

    यह सर्व विदित है कि दंडकारण्य ( बस्तर ) के अंक में विस्तृत सुरम्य वन-पर्वतीय प्रदेश के पाटों, घाटों , नदियों और कंदराओं को बूझ पाना उसी तरह दुष्कर है जिस तरह सर्वथा अभावों में पुष्पित पल्लवित उसकी अजस्र संस्कृति को बूझ पाना. तथापि, कुछ मेधावी अध्येताओं, मनीषियों और जिज्ञासुओं ने यहाँ की जनजातीय परम्पराओं, संस्कृतियों और समस्याओं की तह तक जाने का सच्चे मन से प्रयास किया है.  
   बस्तर के इन्हीं सच्चे सपूतों में से एक लाला जगदलपुरी जी भी हैं, जिन्होंने अपनी हर सांस में बस्तरिया के लिए एक आस संजोई है ....और यह सब उनके कालजयी साहित्यिक कृतित्व से स्वयं प्रमाणित भी है. यहाँ की संस्कृति के लिए समर्पित उनकी तेजस्विता का सूर्यप्रताप आज भी न केवल देदीप्यमान है अपितु वयस के तीव्र ढलान पर और भी तेजोमय है. हम यह भी जानते हैं कि जीवन के लिए प्रकृति की अपनी एक मर्यादा भी है. 
  सन २००८ में, छत्तीसगढ़ शासन के, पं० सुन्दरलाल शर्मा सम्मान से सम्मानित साहित्यिक व सांस्कृतिक मेधा के धनी लाला जी को राष्ट्रीय स्तर पर अब तक पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित न किया जाना निश्चय ही घोर आश्चर्य, क्षोभ व परितापजनक है. 
   यदि हम उनकी वृद्धावस्था, उनके स्वाभिमान और साहित्यिक-सांस्कृतिक अवसान की प्रतीक्षा में हैं तो यह उनकी आजीवन तपस्या के प्रति हमारा असम्मान, अकृतज्ञता, असंवेदनशीलता और अमानुषिकता का प्रदर्शन ही होगा. ऐसी विचारणा के पश्चात कि समय रहते ही हम उनकी आजीवन तपश्चर्या को नमन करें और उनकी सहज ख्याति व कर्मठता के अनुरूप राष्ट्रीय "पद्मश्री" पुरस्कार के लिए सरकार से आग्रह कर उनकी साधना को सम्मान दें.        -रोशन वर्मा