शनिवार, 10 दिसंबर 2011

"नयी रोशनी" सूरज के इतने ख़िलाफ़ क्यों है ......?




मनोज भैया !...सलिल भैया !
एगो सच्चा खीसा सुनावतानी ....
.......................
वर्षों बाद 
बड़ी हुलस के साथ 
मैं गाँव गया था,  
सोचा था ....
नीम को निहारूंगा 
डालकर उसके नीचे खटिया. 
बैठूंगा थोड़ी देर  
बूढ़े बरगद के नीचे, 
करूंगा बातें 
उसकी लाल-लाल कोंपलों से. 
पूछूंगा हाल 
उसकी लटकती जड़ों से.
खेत में जा सहलाऊंगा 
मूंगफली की पत्तियाँ 
कुरेद कर देखूंगा उसके सुतरे -
मूंगफली कितनी बड़ी है अभी 
फिर दबा दूंगा माटी में बड़े प्यार से.
पूछूँगा गन्ने से 
अब मैं बड़ा हो गया हूँ 
उंगली तो नहीं चीर दोगे मेरी ?
वह हँस कर झूम उठेगा ..
कहेगा -
मेरी पत्तियों को छेड़ोगे 
तो सजा आज भी मिलेगी.
मैं कहूंगा -
रे घमंडी ! 
आज तक नहीं बदला तू
वह भरे गले से कहेगा ,
आँखों में भरकर आंसू - 
तू भी कहाँ बदला रे !
तभी आवाज़ देगी मुझे 
खेत में झूमती हरी-हरी मटर
मैं कहूंगा -
फलियाँ आज भी कितनी नवेली सी हैं ...
वह लजा कर कहेगी-
अब वह बात कहाँ ! 
खाद ने चूस लिया सारा रस 
अब तो बस ....
......................
कल्पना के पंख 
टूट गए एक ही झटके में. 
मैं गाँव में ही 
गाँव को खोजता रहा 
बूढा बरगद 
कहीं खोजने से भी नहीं मिला.
गन्ने का स्थान मिर्च ने ले लिया था.
मटर के खेत की जगह 
कोल्ड स्टोरेज खड़ा था
और......
नीम का पेड़ 
अब मात्र हमारी कल्पना में रह गया था .....
छुटकू ने कटवा दिया है उसे......
रोज-रोज पत्तियाँ गिराता नीम 
उसकी नयी नवेली बहू को 
बिलकुल भी पसंद नहीं है. 
"नयी रोशनी" 
सूरज के इतने ख़िलाफ़ क्यों है ......?
अँधेरे का रहस्य गहराता जा रहा है 
वैज्ञानिक कहते हैं .....
कि कृष्ण विवर में बहुत शक्ति होती है .....
प्रकाश को भी निगल लेती है.....
सचमुच मुझे डर लगने लगा है....   
मैं वापस आ गया हूँ 
अब कभी गाँव नहीं जाऊंगा. 
वहाँ 
एक विकलांग शहर उग रहा है.