राजनीति बहुत टेढ़ी-मेढ़ी और ऊँची-नीची पगडंडी है। राजनीतिक निर्णयों के बारे में हमारी धारणाओं और विचारों में भिन्नता हो सकती है। राजनीतिक गलियारों में छद्माचारियों के कूट-प्रमाणों और चिल्ल-पों (जिसे वे तर्क कहते हैं उसे यही संज्ञा दी जा सकती है) से जनता के सामने बड़ी भ्रम की स्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। उनके निर्णयों और जनता की समझ में तालमेल का हो पाना एक दुर्लभ स्थिति है। तो समझ का यह संकट जनता के सामने भी है जिसके लिए सरकारें और विपक्षी दल दोनों ही कहीं अधिक उत्तरदायी हैं।
व्यक्ति
और समाज की समस्याएँ अब धार्मिक ध्रुवीकरण और उसके सहारे सत्ता की छीना-झपटी के
चारो ओर बड़ी तीव्रता से घूमने लगी हैं। समाज के आधुनिकीकरण, विकास
और आर्थिक सम्पन्नता के साथ यह छीना-झपटी और बढ़ेगी। जनता को बहुत समझदारी और धैर्य
के साथ स्वयं और समाज को बचाने के लिए आगे बढ़ना होगा, सरकारों
से अधिक यह दायित्व हम सबका है।
तर्क
दिया जाता है कि मोदी और योगी की स्थिति “आगे नाथ न पीछे पगहा” वाली है, वे
भ्रष्टाचार या छल किसके लिए करेंगे! उनका सदाचार हो या भ्रष्टाचार, निष्ठा हो या छल... जो भी है वह सब समाज और देश के लिए ही तो है।
यह एक
वजनदार तर्क है, फिर भी कुछ प्रश्न उठते हैं। दुनिया के किसी देश की आपत्ति पर हम अपने
आंतरिक मामलों के निर्णयों को पलट देने के लिए क्यों तैयार हो जाते हैं? हम आस्ट्रेलिया और फ़्रांस की तरह दृढ़तापूर्वक सामना क्यों नहीं कर पाते?
हम उनके सामने क्यों झुक जाते हैं जिन्हें यदि चावल न दें तो
त्राहि-त्राहि मच जाए? मुस्लिम देश के राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु
पर भारत का राष्ट्रध्वज झुका दिया जाता है, प्रधानमंत्री की
आँखों से अश्रुप्रवाह होने के समाचार आने लगते हैं किंतु नूपुर शर्मा के मामले में
सारे मुस्लिम देश भारत के विरुद्ध एकजुट होकर मुआफ़ी माँगने के लिए अड़ जाते हैं। क्या
राष्ट्रध्वज झुकाकर हमने उनके प्रति अपनी चाटुकारिता प्रदर्शित की थी? यदि नहीं तो हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का इन राष्ट्रों का
इतना दुस्साहस कैसे हुआ? हम तथ्यों को पूरी दुनिया के सामने स्पष्टता
और दृढ़ता के साथ क्यों नहीं रख पाते? हम यह क्यों नहीं बता
पाते कि हिन्दुओं को काट डालने और भारत को इस्लामिक देश बनाने जैसी धमकियों का
हमारे देश में एक लम्बा सिलसिला है जिसके परिप्रेक्ष्य में इस बेबात की बात को
देखा जाना चाहिए! क्या हमारी विदेशनीति इतनी शिथिल है? नूपुर
शर्मा और नवीन पर तो निष्कासन की कार्यवाही हो जाती है पर नूपुर का बलात्कार करने
और हत्या करने पर एक करोड़ के इनाम की घोषणा करने वाले वकील पर कोई कार्यवाही क्यों
नहीं होती? सनातनी देवी-देवताओं पर राणा अयूब और सवा नकवी
जैसे सैकड़ों लोगों की अपमानजनक टिप्पणियों को ईशनिंदा क्यों नहीं माना जाता?
मौलाना महमूद
मदनी जैसे तमाम मौलानाओं की धमकी पर कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता? पञ्जाब
में खालिस्तान की आज़ादी का संघर्ष अब खुलकर सड़कों पर आ गया है, आम जनता को लगता है कि इस दुस्साहस का कारण वह प्रोत्साहन है जो लाल किले
पर खालिस्तानी झण्डा लहराने की घटना को गम्भीरता से न लेने के कारण उत्पन्न हुआ
है। आम जनता को लगता है कि किसान आंदोलन में टिकैत की निरंकुश भूमिका पर कोई
कानूनी कार्यवाही न करने और किसानबिल वापस लेने से अराजकतत्व प्रोत्साहित हुये
हैं। वे कौन सी विवशताएँ हैं जिन्हें हम समझ नहीं पा रहे हैं और विश्व के इतने बड़े
लोकतांत्रिक देश को एक कदम बढ़ने पर दस कदम पीछे पलटने के लिए विवश होना पड़ता है?
ईशनिंदा
(जो कि नूपुर शर्मा के ऊपर मिथ्या आरोप है) के विषय पर पूरी दुनिया के मुस्लिम
राष्ट्र एक हो कर अपनी मनमानी शर्तें भारत के ऊपर थोप देते हैं, बिना
इस बात का परीक्षण किए कि आरोप में कितनी सत्यता है। हम गलत नहीं हैं फिर भी हम इन
राष्ट्रों के आगे, …इन ओवेसियों और मौलवियों के आगे क्यों
झुकते हैं? मोहन भागवत के सामने ऐसी कौन सी विवशता है जो
उन्हें मुसलमानों को अपना भाई मानने किंतु अपने उन्हीं भाइयों द्वारा किए जाने वाले
अत्याचारों पर मौन रहने के लिए प्रेरित करती है? “बच्चा-बच्चा
राम है गली-गली में सीता है” गाने वाले को नूपुर शर्मा के साथ यौनदुष्कर्म करने की
धमकी पर दुःख क्यों नहीं होता, उनका मुँह बंद क्यों हो जाता
है? और सबसे बड़ी बात यह कि सदा गहरी नींद में सोई रहने वाली
जनता आखिर इस बार अपनी असुरक्षा और आसन्न संहार को लेकर इतनी उद्वेलित क्यों है?