शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

कब निकलेंगे हम आत्म मुग्धता के गह्वर से..?


२६ जनवरी ,२०११ .....विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का गणतंत्र दिवस. रायपुर से जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक कस्बा है   ..फरसगांव....जहाँ देखने को मिला लापरवाही ...प्रशासनिक अक्षमता ....और विचार शून्य नागरिकों की हिंसा का एक और शर्मनाक नज़ारा. 
सुबह-सुबह गणतंत्र दिवस मनाने निकले छात्रों की एक टोली .....
जगदलपुर से रायपुर की ओर जा रही एक ट्रक से कुचल कर अकाल काल-कलवित हुए एक छात्र के शोक में उफनी क्रोध की एक लहर नें पुलिस थाने को जला दिया.....एस.डी.एम. कार्यालय को क्षति पहुंचाई......राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट किया, दो पुलिस वालों को बुरी तरह पीटा ...और ५-६ घंटे तक राजमार्ग पर आवागमन रोक दिया. वहां से लगभग १०० किलो.मी. दूर पर ही माननीय मुख्यमंत्री जी जगदलपुर में गणतंत्र दिवस मना रहे थे ......फरसगांव में "गण" असंयमित और हिंसक हो उठा था ...."तंत्र" को पैरालिसिस हो गया था इसलिए    पराजित हो कुछ समय के लिए कस्बे से नदारद  हो गया. अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी. मार्ग में जगह-जगह रुकी बसों में परेशान यात्री.....बेबस हो 'गण" के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहे थे.
यह तो एक दुर्घटना थी. पर इसी बस्तर में कई जगह १५ अगस्त और २६ जनवरी को तिरंगे के स्थान पर काला ध्वज फहराया जाता है...हर साल नक्सली विरोध दिवस मनाते हैं ....उधर कश्मीर में भी तिरंगा फहराने के लिए कुछ लोग बेताब हैं .....उन्हें वहां पहुँचने ही नहीं दिया गया .....गणतंत्र दिवस के कुछ ही दिन पहले महाराष्ट्र में एक एडीशनल कलेक्टर को माफिया गिरोह नें ज़िंदा जला दिया .......क्योंकि उस अधिकारी नें अपने कर्त्तव्य को ईमानदारी से निभाने का प्रयास किया था .....गण और तंत्र दोनों को पक्षाघात हो गया है .............और पूरा देश आत्म मुग्धता के गह्वर में डूबा हुआ है.......हम ऐसी विषम स्थितियों में राष्ट्रीय पर्व को उत्साहपूर्वक मना पाये हैं या केवल औपचारिकता भर निभा कर रह गए हैं ?.....यह एक व्यग्र करने वाला सच्चा प्रश्न है .....एक सच्चे  ज़वाब की तलाश में.             

2 टिप्‍पणियां:

  1. "सत्य कटु होता है", आम कहावत है...हमारे पूर्वज इस संसार को ही 'मिथ्या जगत' कह गए, एक बाज़ार जहाँ केवल झूठ ही बिकता है,,,
    हम बच्चे थे जब देश स्वतंत्र हुआ, उस समय जोश था, तिरंगे के प्रति एक आदर भाव था, एक हमारे हिन्दुस्तानी होने पर गर्व, और कई गीत झंडे पर सुनने क मिले, जैसे "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा" आदि आदि...
    इसे काल का प्रभाव ही कहेंगे कि जैसे जैसे पञ्च-वर्षीय योजनाओं के अंतर्गत भौतिक विकास होता गया , वैसे वैसे मानव मूल्यों में कमी होने लगी,,, और क्या यह संयोग-मात्र है कि हमारे ज्ञानी पूर्वज भी कह गए थे कि काल सतयुग में १००% मानवीय कार्य क्षमता से घट ०% हो जाता है कलियुग के अंत तक (जब सागर-मंथन के आरंभ में विष व्याप्त ही गया था?,,, जैसा हमारी वायु, जल, खाद्य पदार्थ आदि आज समय के साथ साथ और अधिक दूषित होते जा रहे हैं)?,,,और उसके पश्चात या तो सतयुग फिर से आता है और यह १००% से ०% गिरावट का चक्र चलता ही रहता है,,, जब तक ब्रह्मा की रात न आजाये, जब सब आत्माएं जम जाती हैं और ब्रह्मा का एक नया दिन आरंभ होने पर फिर उसी स्तर से अनंत काल चक्र में शामिल हो जाती हैं !

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  2. गणतंत्र दिवस मनाने निकले छात्रों की एक टोली .....
    जगदलपुर से रायपुर की ओर जा रही एक ट्रक से कुचल कर अकाल काल-कलवित हुए एक छात्र के शोक में उफनी क्रोध की एक लहर नें पुलिस थाने को जला दिया.....एस.डी.एम. कार्यालय को क्षति पहुंचाई......राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट किया, दो पुलिस वालों को बुरी तरह पीटा ...और ५-६ घंटे तक राजमार्ग पर आवागमन रोक दिया. ...

    मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो जाता है ऐसी घटनाओं पर ...
    ये तो बर्बरता है ....
    किसी की सजा किसी निर्दोष को देना उसके प्रति न्याय तो नहीं .....

    @ .हम ऐसी विषम स्थितियों में राष्ट्रीय पर्व को उत्साहपूर्वक मना पाये हैं या केवल औपचारिकता भर निभा कर रह गए हैं ....
    जैसा कि J C जी ने कहा - ''हम बच्चे थे जब देश स्वतंत्र हुआ, उस समय जोश था, तिरंगे के प्रति एक आदर भाव था, एक हमारे हिन्दुस्तानी होने पर गर्व, और कई गीत झंडे पर सुनने क मिले, जैसे "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा" आदि आदि...'' तो दिल में राष्ट्र प्रेम हिलोरे मारने लगता था ....मुझे याद है बचपन में हम हर वर्ष गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर पापा के साथ मिल कर तिरंगा जरुर फहराते थे ...पर समय के साथ सब खत्म हो गया ....
    अब केवल औपचारिकता भर है ....

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.