रविवार, 30 जनवरी 2011

जंगल का फूल


भगवान् ने पूछा -
इस बार क्या बना कर भेजूँ   , होमोसीपियेंस ?
मैने कहा - 
ना बाबा ना ..मैं इतना खतरनाक बन कर 
नहीं जाऊँगा  इस बार .....कुछ और नहीं....बना देते सर !
......तो एवीज ?
 ...नहीं ..वहाँ  भी ताकतवर का खेल चलता है
 तो नान-कॉर्डेटा में कुछ ...? 
............मैं सोचने लगा ......
तो भगवान् बोले -
अच्छा चलो ..इस बार कोई वायरस या बैक्टीरिया ...?
मैं डर गया, ज़ल्दी से कहा- 
नहीं ,  डॉक्टर   पीछे पड़ जायेंगे 
.......तो प्लांट किंगडम में कुछ .....?
मैं खुश हो गया, 
भगवान् मुस्कराए, बोले- 
 चलो, मंत्री जी के बंगले का फूल बना देता हूँ
अच्छी मिट्टी, पर्याप्त खाद-पानी 
सेवा के लिए माली 
सुरक्षा के लिए चौकीदार ...
मैं उदास हो गया 
भगवान् ने पूछा - अब क्या हुआ ?
मैंने कहा -  तब हर कोई मेरी नहीं 
मंत्री जी की तारीफ़ करेगा 
कि इतना सुंदर फूल मंत्री जी के बंगले में ही खिल सकता है 
हर सुविधा का ठेका ज़ो दे रखा है 
..........तो तुम्हीं बताओ न! 
भगवान् जी कुछ खीझ से उठे
मैंने कहा -
मुझे जंगल का फूल बना दो इस बार 
अपनी दम पर जी कर दिखाऊँगा  
तब लोग सिर्फ मेरा ही नाम लेंगे, 
कहेंगे- देखो तो ....
जंगल में बिना पानी ..बिना खाद 
कैसा खिलखिला रहा है ......और सुविधाभोगी 
होमोसीपियेंस को चिढा रहा है  
और सचमुच भगवान् ने 
बस्तर के जंगल में भेज दिया मुझे 
तब से यहीं हूँ 
आइये न कभी मिलने.