मंगलवार, 18 जनवरी 2011

इबादत से भी ....

कैसे कहूं, 
कि अपनी ही चौखट से टकराया है हर दफे 
सर मेरा.
डाक्टरों को क्या पता .....
उन्होंने तो कह दिया कि बढ़ गया है ब्लड-प्रेशर,
दिल को काबू में रखो मियाँ .
उन्हें भी कैसे कहूं 
कि बगावत तो अपने ही खूं नें की है 
और चोटें ........पत्थरों से ज्य़ादा फूलों नें दी हैं
ज़ो  इतनी पडी हैं बेशुमार 
कि दिल के भीतर तक हो गए हैं  कंट्यूज़न
मगर ये दिल भी कोई कम है क्या ......
कमबख्त तो इतना कि अपने खून के अलावा 
गैरों का लेने को तैयार ही नहीं होता.
इसे दर्द की परवाह कहाँ  ?
और मैं बेचैन हूँ ...... 
दर्द की भारी ये गठरी अब कहाँ खोलूँ 
हर गली में शातिर बैठे हैं ज़नाब !
चल पड़ेंगे फिर किसी बाज़ार में 
बेचकर ये दर्द मेरे 
भर लेंगे खुशियों से ये दामन अपने
हद है सौदागरी की भी ...... 
यकीनन  .....धोखे इतने खाए हैं मैंने
कि यकीं भी बेचारा चल बसा
अब  तो डर लगता है इबादत से भी 
क्या जानें खुदा क्या सोचे ?