गुरुवार, 20 जनवरी 2011

कोलांग महोत्सव

छत्तीसगढ़ की जनजातियों में से एक -गोंड जनजाति की सांस्कृतिक समृद्धता नें बार-बार आकर्षित किया है मुझे. उनका सांस्कृतिक विकास प्रकृति के सान्निद्य में हुआ है ....कृत्रिमता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं ......कोई छल नहीं ...कोई आडम्बर नहीं ....और समाज विज्ञान की दृष्टि से पूर्ण वैज्ञानिक.  दुर्भाग्य से ...विकास के नाम पर आई नयी रोशनी नें अपनी काली छाया इस पर भी डालनी शुरू कर दी है.....अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए उत्तर-बस्तर जिले के अंतागढ़ विकास खंड के हिमोड़ा गाँव में अभी  १८ व १९ जनवरी को प्रथम कोलांग महोत्सव संपन्न हुआ. वस्तुतः , कोलांग एक नृत्य विधा है ...एक नृत्य-यात्रा ज़ो मोटियारिनों  और चेलकों के समूह द्वारा एक गाँव से दूसरे गाँव की यात्रा करते हुए संपन्न की जाती है. यह एक संस्कार यात्रा भी है जिसमें नवयुवक-नवयुवतियाँ जीवन के विविध संस्कार सीखते हैं. इस परम्परा का प्रारम्भ इनके गुरू ''लिंगोपेन  देव'' द्वारा किया गया था. लिंगोपेन  इनके गायन व नृत्य गुरु के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरु अर्थात "पाटागुरु" एवं "डाकागुरु" माने जाते हैं. रंग-बिरंगे परिधानों में सजे चेलक एवं मोटियारिनें  कोलापारा कोलांग गीत गाते हुए सारी-सारी रात समूह नृत्य करते हैं. पहले यह नृत्य यात्रा लगभग एक माह की हुआ करती थी..अब तो इसके अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है .....इस नृत्य यात्रा के अनंतर ही गोंड जनजाति के प्रमुख अनुष्ठान संपन्न होते हैं ..इसलिए इस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की आवश्यकता का अनुभव करते हुए एक महोत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लेकर इसका प्रथम आयोजन हिमोड़ा ग्राम में संपन्न हुआ. निश्चित ही यह एक शुभ संकेत है एक संस्कृति को बचाने का ....    मेरी कोटि-कोटि शुभकामनायें .