शनिवार, 29 जनवरी 2011

....सोचता हूँ



पिछले कई सालों से सो रहा है 
यह ज्वालामुखी, 
.....सोचता हूँ 
कभी पूरी धरती ही थी खुद एक ज्वालामुखी 
पर आज तो शस्य-श्यामला है  
चलो, इस सोये ज्वालामुखी पर बोते हैं 
कुछ बीज ........
उगाते हैं कुछ लताएँ.
कुछ दिनों बाद 
जब अंगड़ाती हुई मुस्कराएंगी लताएँ
और चहकते हुए खिलेंगे फूल 
मैं कहूँगा पूरी दुनिया से 
देखो, ज्वालामुखी की राख भी है 
कितनी उपजाऊ ....
और खामोशी भी खिलखिला सकती है 
.....वक्त आने पर 
बस, ज़रूरत है कि ज़ारी रहें हमारी कोशिशें 
और थामे रहें उम्मीद का दामन    
कोई ज़रूरी नहीं कि होती रहे पुनरावृत्ति 
असफलताओं की 
हम तो 
म्यूटेशन के उस छोटे से प्रतिशत पर भी करते हैं यकीं 
ज़ो हो सकता है ....थोड़ा सा फायदेमंद भी 
और फिर ......
राख को कुछ तो अवसर दें 
अपनी सुगंध फैलाने का .