सोमवार, 31 जनवरी 2011

क्या इन्हें नाम दें ...

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जा रहे थे यूँ ही 
कुछ न तय था कहीं .
फिर मिली एक डगर 
पर न मंजिल कहीं . 

रात में रौशनी यूँ 
अचानक हुई .
कोई रिश्ता नया
एक उगता दिखा .

मीठे-मीठे उठे 
आज फिर दर्द हैं .
कोई बताये हमें 
क्या इन्हें नाम दें .

ख़ुश्बुएँ कैद हैं 
काँटों के साए में .
कैसे हम उनको ये 
उनका इनाम दें .