शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

यह तय हुआ.

ज़ख्म अंधेरों ने दिए थे ख़ूब 
छिप गया था चाँद  
उगते प्रेम का,
हो गया था बादलों की ओट....... 
पर घड़ी भर बाद ही 
वह आ गया हंसता हुआ,
उम्मीदें बच गईं फिर ख़ाक होने से .
क्या ख़ूब है गर्मी तुम्हारे इश्क की 
पिघलते द्वंद्व के हिमनद
बहे हैं इन दिनों .
सैलाब कब ठहरे हुए  
देखे किसी ने आज तक !
आओ कश्ती खोल दें हम प्यार की
गा उठा है गीत कोलंबस कोई
ढूंढ लेंगे रास्ता हम भी नया.
दोस्ती कितनी पुरानी
प्रेम से है 
दर्द की.
रोक कर इनको करें क्या 
चलो ......इनको छोड़ दें रिसता हुआ
बस, प्रेम को सिज़दा करें
सिज़दा करें ...... यह तय हुआ.