गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

शाश्वत कवितायें


बहुत पहले लिखी गयी थीं 
कुछ शाश्वत कवितायें 
......................
उनमें से एक कविता थी ......
सृष्टि की,
एक विलय की,
एक प्रेम की,
और एक विरह की.
...................
फिर एक दिन लिखी शैतान ने
एक कविता शोषण की......
और खुश होता रहा 
गा-गा कर  अपनी कविता  
तब 
साधु को भी लिखनी पड़ी 
एक कविता 
त्याग की 
और बस ....
..............
इसके बाद नहीं लिखी गयी 
कोई कविता. 
हम तो छूने का प्रयास भर करते हैं 
इन्हीं कविताओं को 
अपनी क्षमता भर 
फिर कर देते हैं रूपांतरण
या भाषांतरण
.....और जोड़ते हैं 
साहित्य में 
सिर्फ एक छोटी सी कड़ी 
बड़े गर्व के साथ .
पर शायद ....वह शक्ति नहीं रही अब 
शब्दों में 
कि कविता कर सके 
कोई क्रान्ति.
हे दयानिधे ! वह शक्ति दो हमें 
कि भर सकें 
शब्दों में कुछ आग  
और रची जाएँ कुछ  
जलती हुई कवितायें.