सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

उनके पास पता है उसका.

ठण्ड बढ़ती जा रही है 
मौसम सर्द से सर्द होता जा रहा है 
जमता जा रहा है सब कुछ 
रक्त भी .....और विचार भी.
लोग बर्फ हो गए हैं 
खामोश तो वे पहले से थे ही. 
मुझे गर्मी की तलाश थी.............. 
कहाँ मिलेगी ? 
इस बंद कमरे में ? 
उफ़ ! यहाँ कहाँ ?
तो चलो बाहर चलते हैं 
घने कुहरे में कहीं खोजते हैं  ..
पेड़ों से पूछते हैं ...
गेहूं की बालियों से पूछते हैं .......
दूब की पत्तियों से पूछते हैं ............
मैं निकलने ही वाला था 
कि तुम मिल गयीं 
गहरी नीली चादर ओढ़े 
सर से पावों तक ढकीं ...मुदीं ....
मैंने तुमसे गर्मी का पता पूछा 
तुम चुप थीं 
मैंने तुम्हें हिलाया 
तुम चुप थीं 
मैंने तुम्हारी चादर को छुआ 
वह सर्द थी ....
बेजान सी ...मुझे डर लगा
तुम कौन हो ? मैंने पूछा ...
एक सर्द आवाज़ आयी -
"उदासी"
मैंने कहा - झूठ 
वह तो तुम्हारी चादर का नाम है 
उसके भीतर कौन है यह बताओ 
तुमने कहा - "दर्द"
मैंने कहा - अच्छा है ...चलो अब 
मेरे साथ चलो 
दोनों मिल के गर्मी को तलाशेंगे
वह यहीं कहीं होगी 
मिलेगी ज़रूर
तुम चलो तो सही ....
आगे किरण बेदी से पूछ लेंगे
उनके पास पता है उसका.