बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

आँगन की किलकारी

पता नहीं कब 
आँगन की किलकारी 
देखते-देखते बन गयी एक परी 
सपनों के पंख लगाकर 
उड़ने को तैयार
एक ऐसे अनजाने देश में 
जहाँ एक अपरिचित 
लालायित है अपनी सम्पूर्ण कोमल भावनाओं के साथ
उन्मुक्त हृदय से 
स्वागत को तैयार.
ठीक है .......
विदा कर दूँगा मैं 
अपने अंतस के अंश को 
भर लूंगा कंठ में सारे आँसू
सौंप दूँगा अपना गहना 
जिसे इतने वर्षों तक गढ़ा है मैंने ...किन्तु 
ज़ो मेरा नहीं है.
जाओ बेटी !
तुम्हारे स्वागत को आतुर है कोई 
जाकर बिखेर देना अपनी सारी ख़ुश्बू
और जीत लेना सबको
अपने संस्कार के गहनों से.
मेरी आँखों से झरते आशीर्वाद का प्रवाह 
साथ-साथ जाएगा तुम्हारे
और ........
ठहर जाएगा देहरी के बाहर  
तुम्हारे बाग़ के माली की तरह.