बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

कुछ कतरनें ....

यात्रा 

जब हम ट्रेन में होते हैं 
तो पूरी तरह फुर्सत में होते हैं 
जब हम फुर्सत में होते हैं 
तब बहुत अच्छे समीक्षक और विश्लेषक होते हैं 
जब हम समीक्षा करते हैं 
तब इमानदारी का बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं 
क्योंकि वह केवल 
प्रदर्शन की चीज होती है.
ख़त्म होते ही यात्रा 
हम पुनः अपनी दुनिया में लौट आते हैं, 
दुनिया में लौटते ही 
पुनः व्यस्त हो जाते हैं
व्यस्त  होते ही 
पूरी तरह बेइमान हो जाते हैं .
अब पता चला ......
कि समाप्त होते ही यात्रा 
वापस क्यों ले ली जाती है टिकट.
काश !
हमारे घरों और दफ्तरों में भी होते ट्रेन के डिब्बे 
ताकि बिता पाते हम 
पूरी ज़िंदगी 
एक इमानदार यात्रा करते हुए.

बगावत 

हम 
उनके आने का लंबा इंतज़ार करते हैं
आते  ही 
फूल माला पहनाते हैं 
उनकी लफ्फाजी पर 
तालियाँ बजाते हैं 
क्योंकि हमारे बीच का एक आदमी 
अचानक ऐश्वर्यवान हो जाता है 
आम से ख़ास हो जाता है 
हमें परी कथा के जादू सा 
सम्मोहित करता है यह खेल.
फिर एक दिन 
अचानक पता चलता है .....
कि  वह भी एक घोटालेवाज़ है 
हवा में सुगबुगाहट होती है ......
कि वह भी एक दगावाज़ है 
पिछले उन सभी लोगों की तरह 
जिनका इंतज़ार करते रहते थे हम .....
जिनको फूल मालाएं पहनाते रहते थे हम  .....
सिलसिला बदस्तूर जारी है 
क्योंकि हम पर सम्मोहन हावी है 
और हम परम्परावादी हैं .
घोटाले भी 
यूँ ही होते रहेंगे 
क्योंकि उन्हें इसका हक 
हम आगे भी देते रहेंगे ......
और यूँ भी 
हम कौन मिस्री हैं 
ज़ो तीस सालों में ही 
बगावत पर उतर आयेंगे ?

 ऊंह .......छोडो भी 

हमने तो संसद को
पान की दूकान पर चलते देखा है 
जहाँ किसी भी
राष्ट्रीय महत्व के विषय पर
अच्छी  बहस होती है, 
वह भी .....
बिना किसी जूतम पैगार के 
बिना एक भी माइक और फर्नीचर को तोड़े 
बिना किसी का मुंह नोचे.
फ़र्क ...सिर्फ़ इतना है 
कि  यहाँ पहले से कोई एजेंडा नहीं होता 
और देश का एक भी पैसा खर्च नहीं होता.
चर्चा के विषय कुछ भी हो सकते हैं, यथा .....
कोई ऐसा विषय .......
जिसकी तारीफ़ में 
कसीदे पढ़ते हों सब 
मगर रोमांस के लिए चल देते हों 
उसके विरोधी के साथ 
.....जैसे कि 'इमान' .

या कोई ऐसा विषय ........
जो समाज को 
नए सिरे से परिभाषित कर रहा हो
मूल पर ब्याज की तरह लुभा रहा हो 
.............जैसे कि 'भ्रष्टाचार' .

या फिर ऐसा विषय ......
जो व्यवस्था का नहीं 
बल्कि अव्यवस्था का संरक्षक हो 
शोर इतना हो 
कि रफ़्तार का पता ही न चलता हो 
और सब कुछ बना रहे 
वहीं का वहीं 
.............जैसे कि 'प्रशासन' .

या फिर कोई सदाबहार विषय ........
जो बिना नीति के चलता हो 
अयोग्यता ही जिसकी योग्यता हो  
घृणास्पद   किन्तु स्तुत्य हो
..............जैसे कि 'राजनीति' .

या  कोई सर्वप्रिय विषय .......
जिसका उद्देश्य हो बाँधना 
समाज  और मनुष्य को 
किन्तु व्यवहृत होता हो 
इन्हें तोड़ने और बिखेरने में 
...........जैसे कि 'धर्म'.

ऊंह  .......छोडो भी 
संसद कहीं भी लगे 
उसका महत्व ही क्या है 
किसी आम आदमी के लिए ? 
.....जैसे कि 'मैं' .