रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मैं घोटालों के लिए टैक्स नहीं दूंगा

आज गीत से पहले कुछ बातें हो जाएँ .....
पहली बात यह कि दैनिक भास्कर के माध्यम से देश के शीर्ष उद्योगपतियों ने जो पहल की है वह स्वागत योग्य है ....इनका कहना है कि वे सरकार को घोटाले करने के लिए नहीं देश के विकास के लिए टैक्स देते हैं ...यदि सरकार टैक्स के पैसों का दुरुपयोग करेगी तो वे टैक्स क्यों दें ?
बिल्कुल ठीक ...हम भी टैक्स नहीं देंगे ........और किसी को भी नहीं देना चाहिए .....भले ही हम साल में करोड़ों का टैक्स नहीं देते ....पर हम जैसे हज़ारों का टैक्स देने वालों की संख्या ही देश में अधिक है .......हम जो सालाना टैक्स देते हैं उसके उपयोग का खुलासा होना चाहिए ........पूरे देश से अपील है मेरी ....इस मुहिम में शामिल होने के लिए. 
 दूसरी बात है  अपने मन्नू भैया का बेचारगी भरा वक्तव्य जिसमें उन्होंने हथियार डालते हुए फरमाया कि "मजबूर हूँ पर उतना गुनाहगार नहीं" ... ...विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री ने बड़ी बेचारगी और बेशर्मी के साथ स्वीकार कर लिया है कि गुनाहगार तो हैं पर उतने नहीं जितना मीडिया ने प्रचारित कर दिया है या जितना लोग समझ रहे हैं ...... मुझे लगता है कि हमारे प्रधान मंत्री का यह एक गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य है. हम नहीं समझते कि उनके सामने कुर्सी से चिपके रहने की कोई मजबूरी है.
तीसरी बात है नक्सलियों के अहिंसक हथियार के बढ़ते प्रयोग के सामने सरकार की लाचारी. सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए किसी शासकीय अधिकारी या कर्मचारी का अपहरण नक्सलियों का कारगर हथियार साबित हो रहा है. यह एक अत्यंत गंभीर विषय है मुट्ठी भर हथियार बंद लोगों के सामने एक लोकतांत्रिक सरकार का गिरवीं हो जाना एक बड़े खतरे का पूर्व संकेत है ...... मजे की बात यह है कि मलकानगिरी के कलेक्टर का सुराग सरकार को नहीं लग पाया अभी तक ...पर मानवाधिकार वालों को पता है कि नक्सलियों ने कहाँ छिपाया है ...लगता है कि नक्सली अपहरण के बाद सीधे स्वामी अग्निवेश को फोन करके सूचित करते हैं कि आ जाओ फलां जगह ...वार्ता कर लेते हैं. अभी कुछ ही दिन पहले स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थता में नक्सलियों ने बस्तर में अगवा किये गए कुछ पुलिस वालों को सरकारी नौकरी छोड़ देने की शर्त पर रिहा किया    है ....और अब अपने कुछ साथियों को जेल से छोड़ देने की शर्त के साथ कलेक्टर का अपहरण .....यह तो कबीला तंत्र हो गया ........हम सरकार से जानना चाहते हैं कि क्या हम कबीला युग में वापस आ गए हैं ? 

मैं आप सभी को आमंत्रित करता हूँ कि कृपया अपनी टिप्पणियों से अपने विचार प्रकट करें ......और देश की समस्याओं के बारे में अपनी जागरूकता और सक्रियता का परिचय दें.

और अब आज का गीत ......जो कि गीत कम ....एक सच्चा दस्तावेज़ अधिक है ...

बीजिंग से 

माओवाद के सुर में जहां रोकर भी है गाना 
पता बारूद की दुर्गन्ध से तुम पूछकर आना .

बिना दीवारों का कोई किला ग़र देखना चाहो 
तो बस्तर के घने जंगल में चुपके से चले आना. 

धुआँ बस्तर में उठता है तो बीजिंग से नज़र आता
हमारे खून से लिखते हैं माओ का वे अफ़साना.

वे लिख दें लाल स्याही से तो ट्रेनें भी नहीं चलतीं 
कटीले तार के भीतर डरा-सहमा पुलिस थाना .

यहाँ इस देश की कोई हुकूमत है नहीं चलती 
कि बंदूकों से उगला हर हुकुम सरकार ने माना .

जो रखवाले थे हम सबके वे अब केवल उन्हीं के हैं
नूरा कुश्तियों में ही ये बंटते अब खजाने हैं .

हमने ज़िंदगी खुद की खरीदी तो बुरा क्या है 
यहाँ सरकार भी उनको नज़र करती है नज़राना .