सत्य है सूर्य
सत्य हैं सूर्य के सप्ताश्व,सप्तवल्गा का
नियंत्रक
उभय सबका
एक सारथी,
किंतु सबने चुनी
कोई एक वल्गा
किसी ने भगवा
किसी ने हरा
किसी ने नीला,
तुमने चुन लीं
तीन वल्गायें
देखकर अवसर
कभी भगवा
कभी नीला
तो कभी हरा।
प्रतीक बन गये रंग
सबकी पृथक पहचान के।
तुम चुनने लगे रंग
देखकर चाल
पृथक-पृथक पहचान के
क्योंकि विश्वास नहीं तुम्हें
तुम्हारे "स्व" में
इसलिए
तुम्हारे चित्र हैं वि-चित्र।
हमसे नहीं
तुम स्वयं से करते हो छल
पल-पल
बोलकर
मिथ्या वचन
कि सर्वश्रेष्ठ है तुम्हारा चयन
होकर भी
विकृत-चित्र।
सुनो मायावी!
जल गई होलिका
मारा गया मारीच
मारा गया रावण भी
मारे जायेंगे
एक-एक कर
सारे मायावी
और तुम
नहीं हो अरुण।
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