वह खड़ा था
अकड़ता हुआ
अड़ा था
हर किसी की राह में
फिर एक दिन पसर गया
भरभराकर ढह गया
तुमने कहा
भूस्खलन हुआ
हमने कहा
अहंकार का अंत हुआ
सुना तुमने!
वर्जित है
अति
सर्वत्र ।
वह खड़ा था
अकड़ता हुआ
अड़ा था
हर किसी की राह में
फिर एक दिन पसर गया
भरभराकर ढह गया
तुमने कहा
भूस्खलन हुआ
हमने कहा
अहंकार का अंत हुआ
सुना तुमने!
वर्जित है
अति
सर्वत्र ।
समाज ने समाज का शोषण किया इसलिए समाज में असमानता है, -यह तुमने कहा, कहते ही रहे, जिससे कुछ पीढ़ियों के बाद समाज में तुम्हारा कथन ही स्थापित हो गया।
यह पूरी तरह सच नहीं था, समाज का एक वर्ग अपराधबोध से भर गया, दूसरा वर्ग प्रतिशोध के लिए उग्र हो उठा। तुम यही चाहते थे -समाज में ध्रुवीकरण, जिसे तुमने उत्पन्न किया, प्रोत्साहित किया और संरक्षित भी किया।
सामाजिक सत्य यह है कि सत्ता के तत्व अव्यवस्था की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते हैं, यही स्वाभाविक है । जब अव्यवस्था होती है तभी लोग किसी सुशासन की अपेक्षा करते हैं। महान सम्राट लोक की इसी अपेक्षा को पूरा करने के प्रयास करते रहे हैं। किंतु यह सत्ता और शासनतंत्र की आदिम स्थिति है। बाद में तो राजपुरुषों और समर्थों द्वारा भय और कुव्यवस्था को ही सत्ता का आधार बनाया जाने लगा। हाँ! सच यही है कि शोषण और अत्याचार का भय दिखाकर सत्ता प्राप्त किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सत्ता प्राप्त होते ही सत्ताधीश जो पहला काम करते हैं वह होता है शोषण और अत्याचार के नये-नये प्रतिमान स्थापित करना। सुशासन का स्वप्न देखने वाली भीड़ को मिलता है कुशासन।
अपने पूर्ववर्तियों की तरह तुमने भी कभी पूरा न किये जाने वाला समानता का आश्वासन दिया और भीड़ को लूटने में तल्लीन हो गये। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में शासन का यही पक्ष अब स्थापित हो चला है जिसका विराट और सर्वाधिक क्रूर स्वरूप है "नयी विश्वव्यवस्था"।
तुम जिस समानता की बात करते हो वह शुद्ध छलावा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगले लाखों वर्षों में भी तुम्हारी परिभाषाजन्य "समानता" फलीभूत होने वाली नहीं। दुर्भाग्य से भीड़ को स्वप्न में डूबना अच्छा लगता है, उसकी यही दुर्बलता तुम्हारा पथ सरल करती है।
तुम प्रतिवाद करोगे कि क्यों नहीं हो सकती समानता! तुम मुझे अराजकतत्व और उपद्रवी कहकर दण्डित करने के सारे उपाय करोगे। तुम ऐसा कर सकते हो, फिर भी सामाजिक समानता नहीं ला सकते, कम से कम वैज्ञानिक तो यही कहते हैं।
हाँ! तुम वैज्ञानिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद की बात करते हो न! किंतु सच यह है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद भी समानता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि स्वयं प्रकृति ही इसे स्वीकार नहीं करती। तुमने भीड़ से भौतिकी का यह सच सदैव ऱछिपाया कि ब्रह्मांड में बाहर से जो समरूपता दिखायी देती है वह वस्तुतः आभासी है, उसके भीतर प्रतिकूलताजन्य अ-समरूपता ही होती है। सृष्टि के सारे विधान और सूत्र प्रतिकूलताजन्य उस अ-समरूपता के ही परिणाम होते हैं। अधिक दूर मत जाइये, अपने भौतिक शरीर की रचना और क्रियात्मकता को ही लीजिए, क्या वहाँ समरूपता (Symmetry) है! क्या एक ही माता-पिता के सभी बच्चों के व्यवहार और क्षमताओं में समरूपता होती है!
यह जो तुम अपने चारो ओर विविधता देखते हो, क्या समानता होने पर वह संभव है! क्या आरोह-अवरोह के बिना किसी संगीत की कल्पना की जा सकती है!
मुझे समानताविरोधी समझने की भूल मत कर बैठना। यह तो प्रकृति है जिसके तंत्र में कहीं भी समानता नहीं है। प्रकृति समानता नहीं, संतुलन की अपेक्षा करती है। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही संतुलन पर अवलंबित है, समानता पर नहीं।
संतुलन एक गतिशील व्यवस्था है, जो तुम करना ही नहीं चाहते। तुम तो भीड़ को सपनों में खो जाना सिखाते हो, ताकि उसके श्रम पर डाका डालते रहने में तुम्हें सुविधा हो। तुम्हारे विकास के सारे प्रादर्श छोटी रेखा को बढ़ाने में नहीं, प्रत्युत बड़ी रेखा को क्षतिग्रस्त कर छोटी करने के विनाशकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। तुम दोनों रेखाओं के विनाश के कुचक्र कर रहे हो, छोटी को कुंठित कर, और बड़ी को लुंठित कर। यह उन शक्तियों के दुरूपयोग का बलात्कार है जो भीड़ ने तुम्हें प्रदान की हैं। सावधान! प्रकृति का धर्म है संतुलन, जो हो कर रहेगा, तुम्हारे अवसान के साथ।
वे बनाते हैं
जातियाँ
कोई ऊँची, कोई नीची
कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची
फिर करते हैं प्रोत्साहित
कि बहे
सुगंधित समीर
"नीची" से "ऊँची"
और "ऊँची" से "नीची"
जातियों के बीच
करते हुये नृत्य
जैसे बलिया की
लहरिया वाली नचनिया
या बनारस की
बलखाती बाई जी ।
यह एक
बहुत राजप्रिय खेल है
जिसमें हैं
बादशाह, बेगम, गुलाम
और एक भीड़
संख्याओं की
एक से दस तक
पर आवश्यक नहीं
कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह,
या बेगम ही
यह तो हो सकता है
कोई गुलाम भी
या हुकुम की दुग्गी भी।
हम सब हैं
उपकरण
उनके हर खेला के
हम सब हैं
पक्षविहीन
पंछी बस नाम के।
इस बार तुरुप का पत्ता
डाल कर उबाल दिया गया है
चाय की गंदी गंजी में
और फिर
हर पत्ता भी तो नहीं होता
चाय का पत्ता
फिर भी
पी तो रहे ही हैं
हम भी, तुम भी
और सरकार के सचिव भी ।
एक खेला और भी है
वे खोदते हैं
खाइयाँ
गहरी, बहुत गहरी
कुछ इस तरह
कि बन जाते हैं पर्वत
ठीक खाई के पार्श्व मेंं
इतने ऊँचे
कि हो जाते हैं वे
दुर्गम
और अलंघ्य
कोई नहीं जा सकता
इधर से उधर
और उधर से इधर,
फिर प्रारंभ होती हैं
योजनाएँ
स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ
जिससे कि सुगम हो आवागमन
इधर से उधर
और उधर से इधर
किये बिना समतल
खाइयाँ और पर्वत
वे इसे ही कहते हैं
समानता, सामंजस्य,
लोकहितकारी योजना,
विकास...
और भी बहुत कुछ।
और हाँ!
भोजन में तेल कुछ कम कर देना
जिससे बचा सको
कुछ तेल
जलाने एक दिया
मेरे जन्मदिन पर।
अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है।
वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है।
कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी।
श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा?
अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।
प्रतिकूल स्थितियों में कालनेमि छिप जाते हैं, मरते नहीं। यही प्रवृत्ति माइक्रोब्स की भी होती है। हम सदा माइक्रोब्स से घिरे रहते हैं। इनकी सही पहचान या इन्हें पहचानने की भूल ही हमारा भविष्य तय करती है।
भाजपा अपने जन्म से ही श्रापित है, जब सत्ता के लिए जनसंघ को नेपथ्य में धकेलकर कांग्रेसीकरण के सिद्धांत के साथ कुछ चालाक लोगों ने हिंदुओं पर मोहिनी डालने की कमान सँभाली थी। हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर भाजपा ने हिंदुओं के साथ विश्वासघात का नया कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता पाई है। देश के बुद्धिजीवी भी भाजपा के भँवरजाल में फँसते गये और अपने सर्वनाश को आमंत्रित करते रहे। पर अब भलीभाँति घायल होने के बाद हिंदुओं का नीरक्षीर विवेक जाग्रत हो गया है और भाजपा एवं कांग्रेस मुक्त भारत का रुझान स्पष्ट होने लगा है।
स्मरण कीजिए, आपातकाल के बाद चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जो भी खड़ा हुआ वही जीत गया। तब सुपात्र और कुपात्र का भेद समाप्त हो गया था। माना कि वह विरोध और घृणा के चरम का परिणाम था पर उसका परिणाम भी ठीक अगले चुनाव में दिखाई पड़ गया। इंदिरा ने वापस सत्ता सँभाली। अब वैसा ही इतिहास किंचित और परिशोधन के साथ दोहराए जाने के लिए तैयार है। न कांग्रेस, न भाजपा, इस बार नया प्रयोग भारतीय मतदाता की परिपक्वता का परिचय देने की दिशा में प्रवृत्त हो चुका है जो नया विकल्प बनेगा।
जय हिंदूराष्ट्र !
ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का विवाह दलितों से करने की बाध्यता का विधान।
एक समय ऐसा भी था जब गेहूँ पर किसानों को लेवी देनी होती थी। लेवी यानी गेहूँ की कुल उपज का एक निश्चित भाग सरकार को सरकारी मूल्य पर बेचने की बाध्यता। बाजार मूल्य उससे कुछ अधिक होता था। अब ब्राह्मणों की बेटियों पर वैवाहिक लेवी की माँग उठ रही है। ब्राह्मण की बेटी न हुई, गेहूँ की उपज हो गई।
जो ब्राह्मण इस माँग से व्यथित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं उन्हें सोशल मीडिया पर गोलीबारी दी जा रही हैं और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमनियाँ भी दी जा रही हैं। यह कश्मीरी पंडितों वाला प्रारूप है।
लोग मानते हैं कि देश में बढ़ते हर पाप के लिए वर्तमान सत्ता नहीं, बल्कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विघ्नसंतोषी लोग नहीं चाहते कि मोदी को विष्णु के अवतार के रूप में भगवान मानकर सुस्थापित किया जाए।
ब्राह्मणों और दलितों के बीच वैवाहिक संबंधों के विषय में मैं प्रायः वैज्ञानिक तथ्यों के साथ लिखता रहा हूँ। विचारणीय है कि अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह के लिए सरकारें क्यों प्रयासरत हैं? जबकि धर्मांतरण और जातीय व्यवस्था के पीछे सरकारों की ही चालें रहती हैं। कुछ-कुछ समयान्तराल पर नये वर्ग और नयी जातियों का सृजन करने वाली सरकारें सारा दोष ब्राह्मणों पर थोपकर जाति उन्मूलन का सपना दिखाने में भी सबसे आगे रहती हैं? यह शुद्ध डायलिमा है, यानी लोकतांत्रिक व्यभिचार।
पहली बात तो यह कि जातियाँ किसी ने नहीं बनाईं, न पंडितों ने, जैसा कि मोहन भागवत ने दुष्प्रचार किया है, और न ईश्वर ने, जैसी कि लोगों में धारणा है। जातियाँ राजा तय करते रहे हैं, और वे लोग भी जिन्हें व्यावसायिक वर्चस्व की इच्छा रही है, यथा केरल के कन्नाड़ी निर्माता, जिन्होंने व्यावसायिक वर्चस्व के लिए गोपनीयता बनाये रखी। व्यवसाय हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। और जीवनशैली कुछ अन्य घटकों के साथ मिलकर जेनेटिक परिवर्तन के कारण बन जाते हैं, यही कारण है कि सवर्णेतर समुदाय की कई जातियों में हीमोग्लोबिनोपैथी विकसित हुई जो अचिकित्स्य है। वंश परंपरा से चलने वाली इन व्याधियों की विश्व में कहीं कोई सफल चिकित्सा नहीं है। सरकारों से प्रभावित मेडिकल साइंस ने इसका दीर्घकालीन उपाय बताया है "अंतर्जातीय विवाह", जो मेरी समझ में आज तक नहीं आया। यह वैसा ही जैसे किसी की दारू छुड़वाने के लिए ख़ुद भी उसके साथ बैठकर दारु पीने लगना। सवर्ण द्वेषी और सनातन (हिंदू) विरोधी सरकारें चाहती हैं कि सवर्ण भी इस व्याधि से पीड़ित हों जिससे कुछ नहीं तो समाज में व्याधिक समानता ही लाई जा सके। यानी, मूर्ख को विद्वान नहीं बना सकते तो विद्वान की भ्रूणहत्या तो कर ही सकते हैं जिससे सामाजिक श्रेष्ठता की सारी प्रायिकतायें और संभावनाएँ समाप्त की जा सकें।
अब जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से भारत और शेष विश्व में हीमोग्लोबिनोपैथी से प्रभावित होने वाली जातियों के बारे में पूछ सकते हैं।
सारांश यह कि समाज में हर तरह की विषमताओं के लिए विभिन्न घटक उत्तरदायी होते हैं जिसमें परिस्थितिजन्य समझौते और जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सत्य है जिसे झुठलाने का कोई दुष्ट प्रयोजन ही हो सकता है।
कुछ आरक्षित लोगों ने तो माँग कर दी है कि उन्हें ब्राह्मणों की बेटियों से विवाह में आरक्षण दिया जाय। यानी आरक्षित विधानसभा/लोकसभा सीट की तरह ब्राह्मणों को अपनी बेटी आरक्षित कोटे से ब्याहने की बाध्यता। यह भी एक तरह का जजिया कर है। "मोदी द ग्रेट विष्णु अवतारम्" उनकी यह माँग पूरी कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करके एक और महानता के आत्मबोध में डुबकियाँ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वे तो चाहते हैं कि भारत से सवर्णों का उन्मूलन होना ही चाहिए।
कृत्रिम बौद्धिकता कितनी बौद्धिक?
एलन मस्क और सैम आल्टमैन ही नहीं, एआई शोधकर्ता जैकब काॅक्सन और एआई चीफ़ डारियो अमोदेई भी एआई की उल्लेखनीय सफलता के बढ़ते परिणामों के प्रति सशंकित हैं। अब यह शिक्षित युवकों के स्वावलम्बन को छीनने तक ही सीमित नहीं है, अपितु उससे कहीं बहुत आगे बढ़कर मानव सभ्यता के एक बार फिर प्रलयलीन हो जाने की आशंकाओं में परिवर्तित होता जा रहा है।
हाँ! यह हो सकता है, जब महापंडित रावण अविवेकी हो सकता है तो एआई क्यों नहीं! एआई पर काम करते समय वैज्ञानिकों ने बौद्धिकता और विवेकशीलता में तालमेल का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में कृत्रिम बौद्धिकता के आगे विवेकशीलता को कोई भाव ही नहीं दिया गया। अब यही चूक, या कहिये मदांधता भारी पड़ रही है।
अब स्थिति यह है कि हम बड़ी द्रुति गति से मानव सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समाप्त करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।
जातीय संघर्ष की भेंट चढ़ता भारत!
जातीय गालियाँ, घृणा और असहिष्णुता की पराकाष्ठा की भारत में बाढ़ आई हुई है। यही सब देखने के लिए उड़न खटोले पर आरुढ़ हवा में तैरता "मोगैम्बो ख़ुश ही नहीं, बहुत ख़ुश" हो रहा है।
नैतिकता और नैष्ठिकता के पराभव का लक्ष्य ही आसुरी स्वप्न है, और इसके लिए आवश्यक है अराजकता को हर तरह से प्रश्रय देना। वही हो रहा है। दूर-दूर तक कहीं कोई विश्वामित्र और संदीपन दिखाई नहीं देता, कोई राम और कृष्ण भी नहीं दिखाई देते, राक्षसी शक्तियाँ प्रचंड होती जा रही हैं, और मीलाॅर्ड मौन के दीर्घकालीन हाइबरनेशन में चले गये हैं। अब जो करना है वह गिलहरियों को ही करना होगा।
न मित्र, न शत्रु केवल अवसर की ताक।
कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं, हर कोई हर किसी का मित्र है, हर कोई हर किसी का शत्रु है। महत्वपूर्ण है अवसर और उसके नेपथ्य में पल रही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा। यही धरातलीय सत्य है।
अमेरिका ही नहीं, कोई भी देश, न किसी का मित्र है, न शत्रु। हर कोई अपने वर्चस्व के लिए अवसर की ताक में घात लगाये बैठा है। हर कोई ओट्टोमन साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य की तरह वैश्विक साम्राज्य बनाना चाहता है।
अरब चाहता है कि हूतियों पर अंकुश लगाने में अमेरिका सहयोग करे पर ट्रंप ऐसा नहीं चाहता। अमेरिका और इज्रेल के सपने बहुत बड़े हैं। इस्लाम विभिन्न देशों में घुस कर फैला हुआ अपने आप में एक "साम्राज्य" है। घात-प्रतिघात चल रहे हैं। कोई अस्तित्व छीन रहा है, कोई अस्तित्व बचा रहा है।
इस सबमें भारत कहाँ है???
भारत और भारत की सरकार जातीय और धार्मिक स्वयंभू ठेकेदारों के हाथों में खेल कर ही आत्ममुग्ध है। हम तो ठहरे व्यापारी, विश्वगुरु बनने के सपने बेचते रहे,
...जबकि सचमुच ऐसा कोई सपना कभी था ही नहीं।
अँगुली उठा सकते हैं
एक मीलाॅर्ड
दूसरे मीलाॅर्ड पर
पर इस अधिकार पर
नहीं है कोई अधिकार
जनता का ।
कटुतम आलोचना कर सकते हैं
एक माननीय
दूसरे माननीय की
पर इस अधिकार पर भी
नहीं है कोई अधिकार
जनता का ।
पोर्न गालियों की बौछार से
कर सकता है सराबोर
एक स्वेच्छाचारी
दूसरे स्वेच्छाचारी को
और इस अधिकार पर भी
नहीं है कोई आधिकार
जनता का
क्योंकि जनता सब जानती है
और जो सब जानता है
वह बना रहता है
आँख की किरकिरी
हर किसी की
लोकतंत्र का यही धरातलीय सत्य
अपराध होता है
जब-जब
बनता है सम्राट
कोई नितांत बायोलाॅजिकल
अचानक नानबायोलाॅजिकल।
अधिकार
नहीं होते समान
होते हैं
तेरे-मेरे
अलग-अलग
बस, लंबी होनी चाहिए
लाठी।
निर्धन सदा सामाजिक दुर्बल
ऐश्वर्यशाली सदा सबल
सबल में प्रभुता
निर्बल में दीनता
यही है
लोकव्यवहार का कठोर धरातल
जो किसी आदर्श से
नहीं होता भयभीत
दिखाता है ठेंगा
हर युग के सुदामा को।
तुम
होकर भी सबल
करते रहे ईर्ष्या
और खोदते रहे खाइयाँ
अपने और सुदामा के बीच।
सुदामा बचता रहा
दूर भागता रहा
तुम्हारे अत्याचारों से
तुम्हारी परछाई से
तुमसे
तुमने इसे छुआछूत कहा
जातीय घृणा कहा
और फिर मढ़ दिया
एक और आरोप।
क्या सचमुच जातीय आरोप
या तुम्हारे अत्याचारों से बचने का
एकमात्र
विवश उपाय भर !
आदेश है
कि लोग सोचें
केवल तुम्हारी तरह
रहें
केवल तुम्हारी तरह
जियें भी
तो केवल तुम्हारी तरह
क्योंकि तुम बनाना चाहते हो
विश्वगुरु
पता नहीं
स्वयं को
या पूरे देश को!
किंतु मैं
नहीं बनना चाहता विश्वगुरु
बनकर
तुम्हारा वैचारिक दास।
संभव ही नहीं है
सच हो पाना
तुम्हारा हठ।
तुम इसे ही कहते हो
लोकतंत्र
मैं इसे ही कहता हूँ
आॅब्सेसिव कंपल्सिव बिहैवियर
जिसके लिए जाना होगा तुम्हें
किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास
हाँ!
तुम रुग्ण हो
जान चुका है पूरा देश।
यदा यदा हि धर्यस्य ग्लानिर्भवति भारत!
पढ़ा था
गुना नहीं
रोटी जली क्यों...
घोड़ा अड़ा क्यों...
सुनी थी कहावतें
कभी गुनी नहीं
इसीलिए कभी सीखा नहीं
कि जो बात-बात पर अड़ता है
वह कभी चलता नहीं
इसलिए फेरना आवश्यक है
रोटी, घोड़ा
और राजा भी।
हवायें ऐसी बहीं
कि बोझ बढ़ता गया
सूचनाओं का
मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर
इतना... कि
वह नहीं रख सका संबंध
विवेक और हृदय से...
मन तो पहले ही उड़ा ले गई थीं
उष्ण
पछुआ हवायें।
तिवारी परिवार जी उठा है फिर
मरा नहीं कोई
नीलमणि तिवारी का बेटा
चाय बेचने लगा है
और बेटी
पकौड़े तलने लगी है
गर्व है योजनाकारों को
कि देश की प्रति व्यक्ति आय
बढ़ने लगी है।
अपराधी से सारथी बने लोग
देश के स्वामी बन गये हैं
और उनके नौनिहाल
पढ़ने लगे हैं
सात समंदर पार
गोरों के देश में,
लौट कर आएँगे जब
शिक्षा मंत्री बनेंगे भारत के
और कहेंगे
बाबा साहब के दिए अधिकार से
पढ़ सका बाहर जाकर
वरना तुमने तो पीने नहीं दिया पानी
पाँच हजार साल से।
बधाई हो!
नीलमणि तिवारी को भी
मिल गई है नौकरी
दानापुर के सुलभ शौचालय में
सुदामा!
और कितनी प्रगति चाहिए तुम्हें!
जो आया है सो जाएगा
तुम्हें भी जाना है
पर नहीं सोचा था
इस तरह जाना चाहते हो तुम
अपनी दुर्गति के साथ
गालियों, तिरस्कार और अपमान के साथ।
तुम नहीं झुके
जहाँ झुकना था
तुम झुकते रहे
जहाँ कभी नहीं झुकना था।
तुमने
सम्मान किया पोर्नगालियों का
तिरस्कार किया सम्मान का
भंजन किया भरोसे का
इसलिए
हमारे लिए तो
हर पल मरते रहे हो तुम।
थाली के बैंगन से
तुम लुढ़कते रहे
इधर से उधर और उधर से इधर।
निष्प्रभावी रहे
हमारे अनुनय, विनय,
अनुरोध और प्रशंसा...
तुम
स्वेच्छा से पिछड़ते गये
बड़े गर्व से गिरते गये
सामान्य से अतिदलित तक,
और घिरते गये
अपने ही शब्दों से
अपनी ही परिभाषाओं से।
ओढ़ते रहे खोखली रजाइयाँ
होते रहे आत्ममुग्ध
अपनी ही बनी उपाधियों से।
जन्मना हो तुम भी
हमारी तरह
अजन्मा
कैसे हो गये?
जाओ
हम विदा देते हैं तुम्हें
अब मत आना कभी
लौटकर
इस धरती पर।