गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

यौनशिक्षा

 यौनशिक्षा में क्या?


यौनविज्ञान की शिक्षा या यौनसंबंधों की शिक्षा!

यौनविज्ञान चिकित्सा का विषय है, जबकि यौनसंबंधों की शिक्षा कामशास्त्र और यौनव्यापार से संबंधित विषय है। 

प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल मुक्त यौनसंबंधों के पक्ष में पहले भी वक्तव्य देती रही हैं, इस बार केवल इस अनुबंध के साथ कि मुक्तयौनसंबंधों के परिणामस्वरूप यदि कभी गर्भधारण हो जाए तो लड़की को छोड़ न दिया जाए।

भारतीय समाज जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि से यह विषय विचारणीय है। लड़की को न त्यागने का अनुबंध स्वागतेय है, किंतु हमारे सामाजिक मूल्य यह मानते रहे हैं कि ऐसा तो केवल विशेष स्थितियों में ही होना चाहिए। मुक्यतयौनसंबंध नित्य जीवन का अभ्यास नहीं होना चाहिए अन्यथा भ्रष्टाचार की तरह यह भी एक नया आदर्श बन जाएगा। प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल ने यह नहीं बताया कि इस अनुबंध का विस्तार विवाह तक होना चाहिए या केवल बच्चे के पालन-पोषण के दायित्व तक ही! जैसा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में होता है। 

गर्भधारणोपरांत लड़की का त्याग न करना एक सामाजिक दायित्व एवं सामाजिक चिकित्सा है, ... मुक्त यौनसंबंधजनित उस अवांछित मनोदैहिक स्थिति की चिकित्सा... जिसके मूलकारण को हमारे ऋषि-मुनि चारित्रिक विचलन बताकर निंदनीय कहते रहे हैं। इस Social treatment से पहले क्या हमें इस स्थिति के preventive measures पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए!

भारतीय ही नहीं, अन्य भी सुसंस्कृत समाजों में मुक्तयौन संबंधों को हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है, आज भी देखा जाता है। मुक्यतयौनसंबंधों वाले समाज कितने विकसित और सुसंस्कृत हो सके हैं, यह देखा जा सकता है। बात फिर पलट कर सामाजिक ताना-बाना, उसका शिल्प और उच्च जीवन मूल्यों पर आकर ठहर जाती है। योग दर्शन और अध्यात्मिक मूल्यों का ध्वज लेकर चलने वाले देश का आदर्श पश्चिमी समाज का भौतिक विचलन होना चाहिए या भारतीय सांस्कृतिक मूल्य! अच्छा हो यदि प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल इस विषय पर और प्रकाश डाल सकें। 

यौनशिक्षा की बात करते समय हमें शिक्षा प्रक्रिया और उसके परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। 

सीखने की आदर्श प्रक्रिया में मान्य स्रोतों से गृहण की हुयी सूचना और उसके व्यावहारिक सदुपयोग का सुयोग होता है, जो गुरुकुल प्रणाली में ही संभव है। बिना सदुपयोग के हम सीखते कुछ नहीं, केवल सूचनाओं का निष्क्रिय संग्रहण भर करते हैं, जिसका सदुपयोग न्यूनतम किंतु दुरुपयोग ही अधिक देखा जाता रहा है। यही कारण है कि सचिव जैसे उच्चपद पर पहुँचे बहुत कम लोग ही भ्रष्टाचार से स्वयं को अछूता रख पाते हैं।

मुक्तयौन संबंध होंगे, तो गर्भनिरोधकों का भी प्रयोग होगा, कदाचित् असफल होने पर गर्भधारण होगा... और इस विवश एवं अवांछनीय स्थिति में लड़की को बेचारी न बनाया जाए, पुरुष उस पर अपने संरक्षण की कृपा बनाये रखे। क्या इससे स्त्री स्वाभिमानी हो पायेगी? 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

बदला

 राजा ने कहा 

अपनी प्रजा से - 

तुम अत्याचार करते रहे  

लाखों वर्षों तक

हमारे भाइयों पर 

तुम उन्हें जीने नहीं देते थे 

उत्पीड़ित करते थे 

अपमानित करते थे 

लाखों वर्षों तक ।  

अब बदला लेंगे हमारे भाई 

हमारी प्रजा से 

जो आकर बस गई थी 

हमारे देश में 

लाखों साल पहले । 

राजा ने विधान बनाया

 राजा के भाइयों ने संकेत समझा 

और फिर प्रारम्भ हुआ 

ऐसा उत्पीड़न 

जिसकी योजना बना ली गयी 

इस सभ्य युग में 

और प्रजा 

प्रतीक्षा कर रही है 

कहाँ छिपे मोरे श्याम ! 

आवो 

अब और सहा नहिं जाय । 

राजा अट्टहास कर रहा है 

सुनकर अपनी प्रजा का 

आर्तनाद । 


रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सत्तापरिवर्तन की आग ही आग

क्या हम सचमुच सभ्य हैं?

इटली जल रहा है, फ़्रांस जल रहा है, और अब अन्य भी कई देशों को जलाने की धमकियाँ दी जा रही हैं । कौन हैं ये लोग? क्यों जला देना देना चाहते हैं सब कुछ?

यह वामपंथ और इस्लाम की युति है जो पूरे विश्व में इस्लाम का शासन चाहती है। वामपंथ और इस्लाम में धार्मिक तत्वों को लेकर कहीं कोई समानता नहीं फिर भी वे एक साथ हैं, क्योंकि दोनों के पथ अराजकता से होकर आगे बढ़ते हैं।

संपत्ति को आग लगाकर, दुकानों में तोड़फोड़ कर, सामान को लूटकर ये लोग हर्ष से कितने उन्मादित हो रहे हैं। इस समय इटली और फ़ांस में यही हो रहा है। क्या ये सभ्य लोग हैं? इन दोनों ही देशों के साथ भारत के सम्बंधों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है पर यह प्रतिशोध का समय नहीं है, हमें सच को सच और झूठ को झूठ कहना होगा। हमें इटली और फ़्रांस के मूल नागरिकों के साथ खड़े होना होगा। यह मानवता की रक्षा का विषय है, और सबसे ज्वलंत विषय भी।

फ़्रांस और इटली के शासकीय भवनों, प्राचीन स्थापत्य कलाओं, दुकानों और पार्क में खड़ी कारों को तोड़कर और उनमें आग लगाकर नष्ट किया जा रहा है, भीड़ में उन्माद है क्योंकि वे निर्भीक हैं। वे निर्भीक हैं क्योंकि शासन तंत्र निर्बल है और उसमें किसी अच्छे संकल्प का अभाव है। यद्यपि जॉर्जिया मेलोनी पहले से ही जॉर्ज सोरोस की रक्तरंजित चालों का अनुमान लगाती रही हैं, फिर भी वे कुछ नहीं कर पा रही हैं। इधर भारत में मोदी भी कुछ नहीं कर पा रहे है।  

यह भीड़ धरती की सबसे क्रूर विचारधारा वाले असभ्य लोगों की भीड़ है। पहले ये आपस में झगड़ा करते हैं, फिर दयनीय बनकर दूसरे देशों में शरण माँगते हैं, फिर उसी देश, वहाँ के समाज, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति पर आक्रमण करते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि देश के सत्ताधीश अच्छाई और बुराई, शत्रु और मित्र, न्याय और अन्याय में भेद नहीं कर पाते, उनमें दूरदर्शिता का अभाव होता है और वे अपने पूर्वजों के पापों का फल भोगने के ईश्वरी विधान से बँधे हुये होते हैं।

पश्चिमी सेक्युलरिज्म का यह सबसे काला पक्ष है। यद्यपि सनातन दर्शन में सहिष्णुता, समावेशिता और समानता के बीज हैं पर भारतीय उपमहाद्वीप के बाद अब भारत में भी इसी मानसिकता के साथ उपद्रव प्रारम्भ होने लगे हैं। 

 

अभी मैं यू-ट्यूब पर एक वीडियो देख चुकने के बाद लोगों की टिप्प्णियाँ देख रहा हूँ –

“इंशा-अल्लाह, शीघ्र ही हम ब्रूसेल्स में भी आ रहे हैं।“

“हम स्पेन में आ रहे हैं, यूके और नीदरलैंड में भी।“

“इंशा अल्लाह एक दिन यह धरती हमारी होगी।“

“जिस दिन हरी रोशनी हमारे पास होगी, तुम सब समाप्त हो जाओगे।“

“इस समस्या का समाधान फ़्रांस के विभाजन के बाद ही होगा, हमें फ़्रांस में हमारे लिए एक नया देश चाहिये”।

“क्या फ़्रांस में सरकार और सेना नहीं है?”

“”इन पर गोली क्यों क्यों नहीं चलाई जाती?”

2.

भारत में सत्तापरिवर्तन

सत्तापरिवर्तन एक गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है किंतु तुम तो सत्ता परिवर्तन चाहते ही नहीं, सत्ता को अनैतिक और अराजक तरीकों से छीनना चाहते हो, उपद्रव करके सत्ता लूटना चाहते हो। सत्ता परिवर्तन और सत्ता लूटने में नैतिकता और उद्देश्यों का अंतर है।  

दुर्बल सत्ताओं को रण छोड़ना पड़ता है, जैसा कि श्रीलंका, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश में हुआ । नेपाल में जो हुआ वह जन क्रांति थी, सत्ता की लूट नहीं। अफ़गानिस्तान में रणनीतिक तरीके से आक्रमण करके तालिबानियों ने अपना शासन स्थापित किया। यह कुछ सौ साल पुरानी परम्परा की पुनरावृत्ति थी।  

बांग्लादेश में विदेशी शक्तियों द्वारा सत्ता को छीना गया और वहाँ एक कठपुतली सरकार स्थापित की गयी । नेहा बोरा ने स्पष्ट  कर दिया है कि वह नेपाल से नहीं, बांग्लादेश से प्रभावित है। वह सत्तापरिवर्तन नहीं चाहती, ज़ॉर्ज़ सोरोस और अन्य विदेशी आसुरी शक्तियों से प्रभावित होकर सत्ता छीनना चाहती है जो भारत में अलोकप्रिय शासक के रहते हुये भी सम्भव नहीं है।

भारत की स्थिति इन सबसे बहुत भिन्न और विचित्र है वर्तमान सरकार ने अपने शत्रुओं और विरोधियों को उत्पन्न करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। विपक्ष देश की जनता को कभी प्रभावित नहीं कर सका। भारत की जनता को प्रभावित करने या आकर्षित करने में तिलचट्टों सहित अन्य विपक्षी दल अभी तक असफल ही रहे हैं। आगे भी वे कुछ अच्छा कर सकेंगे, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि विकल्प के रूप में एक क्षीण सी प्रकाश की रेखा निकलती प्रतीत हो रही है तथापि साधु वेश में रावणों की भारत में कभी कमी नहीं रही।  

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

सवर्ण-अवर्ण

जब आप "सवर्ण" कहते हैं तो एक और विभाजनकारी समूह का अप्रत्यक्ष संकेत देते हैं। अर्थात कुछ सवर्ण हैं तो कुछ अवर्ण भी होंगे ही। यह ध्वनित है, जिसे धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र कहा जाना उचित होगा।

सवर्ण शब्द दिया ही क्यों, यह कहाँ से आया? चलिए, इस शब्द की बायोप्सी करते हैं। सवर्ण का अर्थ निकलता है वर्ण सहित। वर्ण चार हैं, अर्थात सवर्ण में चारो वर्ण हैं, तीन नहीं, जैसा कि  प्रचारित किया जा रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादि चतुर्वर्ण के बाद सनातन परंपरा/human physiology /व्यावहारिक दृष्टि से पाँचवा कोई वर्ण नहीं होता, हो ही नहीं सकता जैसा कि भारतीय समाज के विभाजन (सामान्य या सवर्ण अर्थात ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्य), पिछडा़, एससी, एसटी, दलित, अतिदलित, महादलित) के उद्देश्य से अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक और कुत्सित  प्रयास किया गया है। किसने किया यह विभाजनकारी नया वर्गीकरण?

सनातन परंपरा में तो चारों वर्ण समाहित हैं इसलिये जब हम सवर्ण कहते हैं तो उसमें चारो वर्ण हैं। वास्तव में सवर्ण शब्द ही अवैज्ञानिक और विभाजनकारी है, अर्थात ये लोग सवर्ण के बाद अवर्ण का संकेत दे रहे हैं जिसमें शूद्रों का समावेश किया गया है, वह भी कई और विभाजनों के साथ। यह सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर कुछ लोगों का आसुरी आक्रमण है।

आश्चर्यजनक रूप से संत समाज भी इस विषय पर मौन है। क्या यह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के साथ आसुरी बलात्कार नहीं!

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

केवल तभी

 कभी-कभी 

प्रकाश से अधिक

मुखर हो जाता है

अंधकार

किंतु केवल तभी

जब उसके पीछे हो

प्रकाश का 

प्रबल संबल

किंतु

अंधकार 

यह मानता ही कब है!


गजवा-ए-जहान

 स्पेन से आॅस्ट्रेलिया तक 

हर कहीं पहुँच चुके हैं

मोहम्मद-बिन-कासिम

फ्रांसीसी!

फ्रांस छोडो़,

ब्रिटिश! 

ब्रिटेन छोडो़!

अमेरिकन!

अमेरिका छोडो़!

स्पेनिश!

स्पेन छोडो़!

सारी धरती 

हमारी है

यही कहा है हमसे

हमारे अल्लाह ने

और आप कह रहे हैं कि 

उन्हें कुछ नहीं मिलेगा

जो करते जा रहे हैं 

गजवा-ए-हिंद

चरणबद्ध

दहाड़ते हुए।

कुछ भी तो नहीं है छिपा 

जो हो अदृष्टव्य

किसी की भी दृष्टि से!

विनाशाय च साधूनाम्

पर्वत से नीचे है 
पाँव पसारती 
अराजकता
यत्र-तत्र ही नहीं
सर्वत्र
पक्ष से विपक्ष तक
दास (ब्यूरोक्रेट्स) से आंदोलनकारी तक
और प्रजा 
भयाक्रांत है 
देख और भोग कर राजदण्ड
राजप्रासाद से गूँजती प्रतिध्वनि-
"परित्राणाय दुष्कृताम" 
"विनाशाय च साधूनाम्"
हो रहा तुमुल
राजा 
बजा रहा है तबला
और कबीलों के लोग
ध्वजा को शिखंडी बना 
कर रहे हैं
नित नव आक्रमण। 
निष्क्रिय सा प्रतीत होता राजा 
 निष्क्रिय नहीं 
बहुत व्यस्त है
असुरों के स्वागत में। 
हर कबीले का एक ही लक्ष्य है
"राजसिंहासन"
कैसे भी
छल-युद्ध करके
या विश्वासघात करके।
तिलचट्टे
सचमुच तिलचट्टे हैं
सर्वभक्षी
तीव्रगमन
छिपने में दक्ष
और 
प्रतिकूल स्थिति में भी 
अद्भुत जिजीविषा,
तुम खोजते रहो
न्यायालय में न्याय
जो वहाँ 
कभी नहीं मिलता,
तिलचट्टे कहाँ नहीं हैं!

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

तमस से आगे...

भारत और विश्व 

जैसे-जैसे विराट कृष्ण विवर में निस्तेज होते सौर्यमण्डल और धूमकेतु समाते जा रहे हैं वैसे-वैसे उसकी शक्ति प्रचण्ड होती जा रही है। यह वह सत्य है जिसे जान लेने के बाद ऋषियों ने तमस से बाहर निकलकर ज्योति की ओर गमन करने का सुझाव दिया था। इसमें दो क्रियायें हैं – एक तो है तमस को छोड़कर तमस से बाहर निकलना और दूसरी है प्रकाश की ओर गमन करना। अर्थात् हमें तमस को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर, सही दिशा में गमन करना होगा। 

दुर्भाग्य से पूरा विश्व ही तमस को पहचान ही नहीं पा रहा है, तो उसे छोड़ने की प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हो सकेगी! जेलेंस्की को विश्वास है कि वह रूस को झुका देगा, एलन मस्क को विश्वास है कि वह भारत के उद्योग को अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा, जॉर्ज सोरोस को विश्वास है कि वह विश्व भर की राजनीति को अपने धन-बल से नचा सकता है, रोटेशील्ड को विश्वास है कि वही हर देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, डोनाल्ड ट्रम्प को विश्वास है कि वह जिसे चाहे उसे मूर्ख बनाकर उस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है, इज़्रेल को विश्वास है कि वह इस्लामिक आतंक को समाप्त कर देगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश को विश्वास है कि वे भारत को इस्लामिक देश बना लेंगे, मोदी को विश्वास है कि भारत पर एकछ्त्र राज्य करने के लिये भारतीय समाज के टुकड़-टुकड़े कर देना ही एकमात्र प्रशस्त मार्ग है, भारतीय जनता को विश्वास है कि कोई आएगा जो धरती को स्वर्ग बना देगा स्वयं उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, तथाकथित दलितों को विश्वास है कि बिना तप किए ही सिद्धियाँ छीन लेना उनका अधिकार है, भारतीय विपक्ष को विश्वास है कि वे हिंसा और उपद्रव से भारत में सत्ता-परिवर्तन कर देंगे, … लोग अपने-अपने स्थापित विश्वास से चिपके हुये हैं। इसी स्थापित विश्वास को छोड़कर बाहर निकलने की आवश्यकता है। क्या ऐसा हो सकेगा? हाँ! हो सकेगा पर पूरी तरह नहीं, आंशिकरूप में होगा। यह भी एक ब्रह्माण्डीय सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। असंतुलित हो गये सत्य और असत्य में, तमस और प्रकाश में, ज्ञान और अज्ञान में… आनुपातिक परिवर्तन भर होता है अन्यथा ऋणात्मक और धनात्मक आवेश तो सदा ही रहते हैं। हर युग में असुरों के विरुद्ध सुरों को ही युद्ध करना पड़ता है। 

आज की स्थिति में सुरों का लगभग अभाव सा है और असुर उन विषाणुओं की तरह शक्तिशाली हो चुके हैं जो किसी जीवित कोशिका में प्रविष्ट हो चुके होते हैं, उनके आकार को छोटा मान लेना बहुत बड़ी रणनीतिक भूल है। नेपाल को छोड़ दिया जाय तो ठीक यही स्थिति हम श्रीलंका और बांग्लादेश में देख चुके हैं। नेपाल में जो हुआ उसके परिणाम शल्यचिकित्सा के परिणाम की तरह दिखायी देने लगे हैं। भारत की जनता को तय करना है कि हम नेपाल बनने जा रहे हैं या बांग्लादेश?           

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

प्रतिशोध का प्रतिनिधित्व

नेपथ्य से...

उन्होंने झूठ गढ़े, झूठी कहानियाँ लिखीं, हमें अपना शत्रु प्रचारित किया और अब झूठी शत्रुता का प्रतिशोध लेने के लिए चारो ओर से आक्रमण प्रारंभ कर दिए हैं। यह संग्राम अब उनके वर्चस्व से बहुत आगे बढ़कर हमारे अस्तित्व की रक्षा पर आकर टिक गया है।      

दृश्य एक-

नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच- 

"अच्छाआआआऽ तुम हमें कुएँ से पानी नहीं भरने देते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारी माँ-बहनों के साथ अत्याचार करते थे! बताओ, आज अगर उन्हें मौका मिल जाए तो कोई बदला लेगा कि नहीं! बताओ, लेगा कि नहीं लेगा!"          

दृश्य दो-                                      

नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच-   

"अगर वार करना है तो मुझ पर वार करो, मेरे दलित भाइयों पर मत करो...!"

नेपथ्य से आती एक ध्वनि -

दोनों दृश्य देश की उन स्थितियों को हाईलाइट करते हैं जो विशुद्ध काल्पनिक और तथ्यविहीन हैं।  

दृश्य तीन- 

जेन-जी की अनियंत्रित और निरंकुश भीड़। पोर्नगालियों के नारे और गीत। अमर्यादित वेश-भूषा में लड़की बने हुये लड़के.. कामुकनृत्य करते हुए। विश्वगुरु बने भारत में परिवर्तन की चाहत लिए आंदोलनकर्ताओं के मुँह से झरती हुयी गालियाँ और केवल गालियाँ।       

दृश्य चार-      

दृश्य तीन पर धार्मिक ठेकेदार की प्रतिक्रिया - "पिछली तीन पीढ़ियों में आज की जेन-जी पीढ़ी सबसे बुद्धिमान पीढ़ी है। उनके प्रश्नों के उत्तर देने होंगे।"      

नेपथ्य से उभरती एक ध्वनि - "गाली का उत्तर गाली में दे दें क्या? पर वह तो हमारा संस्कार नहीं है! आप दे सकते हैं, दे दीजिए।"       

दृश्य तीन पर पंतप्रधान की प्रतिक्रिया - 

"ये सब हमारे भटके हुए बच्चे हैं, मैंने उन्हें माफ़ कर दिया है। मैं इन पोर्नगालीबाज लड़कियों को अपने गले से लगाना चाहता हूँ।"      

नेपथ्य से आती एक ध्वनि - 

"जिन्हें लगाना चाहते थे गले, वे पड़ गये तुम्हारे गले। अब निपटो इनसे।"    

नेपथ्य से आती एक और ध्वनि- 

"तीन पीढ़ियों में सबसे बुद्धिमान पीढ़ी देश चलाने के लिए सत्ता परिवर्तन चाहती है, उनका स्वागत क्यों नहीं करते आप?"

नेपथ्य से आती एक और तुमुल ध्वनि -

जेजेजेजे जेऽऽऽऽऽऽ भीम!

अल्लाह-हू-अकबर...

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

भारत की भ्रूणहत्या

            भारत में रहकर भारत के विरुद्ध कुवैचारिक आंदोलन करना बहुत सरल हो जाता है यदि सत्ता भी भारत के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की इच्छा से कूट क्रियाओं और षड्यंत्रों में लिप्त हो। मैं बात कर रहा हूँ स्वातंत्र्योत्तर भारत के अभारतीयकरण की, जिसमें पराधीनता युग की परम्पराओं, स्मृतियों, कुविचारों और दुष्प्रचारों को सुस्थापित किये जाने के सफल प्रयास किये जाते रहे।

जवाहरलाल ने प्रसादयुग की परिष्कृत हिंदी के स्थान पर फ़ारसी और अरबी मिश्रित हिंदी बोली को प्राथमिकता क्यों दी, यह विचारणीय विषय होना चाहिए। उन्होंने इस्लामिक पराधीनता वाले भारत की राजशाही बोली, जो कि तुर्क, फ़ारसी और मुगल शासकों द्वारा विकसित की गयी बोली “उर्दू” थी, को भारत पर थोपने के लिये जनता को प्रोत्साहित किया, जबकि अभिजात्य लोगों के बीच उन्हें अंग्रेजी बोलना पसंद था। समृद्ध द्रविड़ भाषाओं के कारण यह काम दक्षिण भारत में सम्भव नहीं था इसलिये उत्तर भारत पर ही उर्दू थोपी जाती रही। जवाहरलाल का वश होता तो तो वे हिंदी को देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि में लिखने की भी अनुशंसा करते। स्वतंत्र भारत पर स्वतंत्र भारत के शासक के द्वारा यह प्रथम आक्रमण था जो भाषाहत्या के रूप में था। बाद में हिंदी और द्रविड़ भाषायी विवाद को लेकर भी हिंसा होने लगी और दर्पण की तरह भारत एक स्थान पर चटक गया।

साधारण जनमानस में स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारत के भारतीयकरण की अपेक्षा की गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ। पराधीनता की पीड़ादायी स्मृतियों को सम्मानित करने के लिये भवनों, मार्गों, राजप्रासादों, दुर्गों और अन्य राष्ट्रीय महत्व के स्थानों के नाम क्रूर और अत्याचारी विदेशी शासकों के नाम पर ही जाने जाते रहे, जबकि इनमें से अधिकांश स्थान भारतीय शासकों द्वारा निर्मित किंतु विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अपने अधिकार में लिये हुये थे, उनके द्वारा निर्मित नहीं। भारत पर भारत की स्वतंत्र सत्ता द्वारा पूरी धूर्तता के साथ किया गया यह दूसरा आक्रमण था जिसने भारत की स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व की हत्या करने का प्रयास किया।

भारत पर स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा तीसरा आक्रमण शिक्षा के पश्चिमीकरण और सनातन मूल्यों की हत्या के लिये किये जाने वाले विविध आक्रमणों के रूप में था जिसमें रोमिला थापर जैसे लोगों द्वारा लिखी गई काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर विद्यार्थियों को परोसा जाता रहा । परिणामस्वरूप आज भारत की कम से कम तीन पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क में भारत के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना स्थायीरूप से घर कर चुकी है। इस घृणा की जड़ों ने भारत की अपनी भाषा, स्थानीय बोलियों, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और पूर्वजों के त्याग-बलिदान आदि में घुसकर उन्हें बुरी तरह जकड़ लिया है। आज की तिलचट्टा पार्टी इसका एक ताजा उदाहरण है।

दर्पण अब कई स्थानों से टूट चुका है, दर्पण को तोड़ने के प्रयास अनवरत चल रहे हैं। भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिये यह संक्रांतिकाल है जिसमें हम सबको अपनी-अपनी भूमिकायें सुनिश्चित करनी ही होंगी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

तुम

 तुम 

हमें गालियाँ देते रहे

पीटते रहे

बलात उठा ले जाते रहे 

हमारी बहनों-बेटियों को

देते रहे धमकियाँ

देश से भगाने की

हमारी बेटियों से ही नहीं

हमारे इतिहास से भी 

करते रहे बलात्कार

लगाते रहे 

हम पर ही मिथ्या आरोप

और हमें ही 

ठूँसते रहे कारा में 

न्याय के नाम पर

करते रहे अत्याचार

ऐसी ही अराजक, 

अनियंत्रित 

और अमानवीय घटनाओं की बाढ़ में 

बहा होगा वह आर्यपथ 

जिससे होकर आया-जाया करते थे 

सभी वर्णों के लोग..

और विवश होकर 

बना ली होगी दूरी 

ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने... 

राज्यपोषित 

एक अत्याचारी वर्ग से।

तुमने इसे छुआछूत कहा 

और हमें ही बना दिया 

अपयश का भागी। 

हर युग में रही है

"चित भी तेरी, पट भी तेरी।"