रविवार, 20 जनवरी 2013

दामिनी की प्रतीक्षा ...


   ब्रिटेन के सरकारी आँकड़े बताते हैं कि वेल्स और इंग्लैण्ड में यौनदुष्कर्मों की घटनायें भारत की अपेक्षा द्विगुणित हैं। अमरीकी देशों का हाल भी ऐसा ही है। यह तुलना दोषों या अपराधों की भयावहता को कम नहीं करती। यह तुलना शासन-व्यवस्था और समाज के दोषों के अध्ययन और विश्लेषण के लिये एक तुलनात्मक आधार प्रस्तुत करती है। सबसे बुरी स्थिति अफ़्रीकी देशों की है जहाँ यौनदुष्कर्म को स्त्रियों ने अपनी नियति स्वीकार कर लिया है; किसी भी समाज के लिये यह विवश स्वीकृति न केवल निन्दनीय है अपितु घातक भी। विकसित होते समाज की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी यौनदुष्कर्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती। क्या हम यह मान लें कि यौनदुष्कर्म की प्रवृत्ति का वैश्वीकरण हो चुका है?
   मानव सभ्यता के लिये इस निरंकुश और व्यापक होते जा रहे कलंक के सामने भौतिक उपलब्धियों की उपादेयता हमारी सम्पूर्ण प्रगति के लिये एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है। यांत्रिक विकास ने मनुष्यता को बहुत पीछे धकेल दिया है। यौनदुष्कर्मों में होने वाली नृशंसता मन-मस्तिष्क को कंपा देने  वाली है। इससे भी बड़ी त्रासदी है इन अपराधों की प्रवृत्ति के आगे व्यवस्थाओं का निरुपाय होना। ...जो उपाय हैं भी वे किसी  आशा का संचार नहीं करते प्रत्युत असंतोष और आक्रोश ही उत्पन्न करते हैं।
   आज हम यह विचार मंथन करने के लिये विवश हुये हैं कि क्या भौतिक विकास ने हमें असभ्यता और नृशंसता की ओर ढकेल दिया है जिसके कारण विश्व की आधी जनसंख्या के साथ कभी भी यौनदुष्कर्म की घटना घटित होने की आशंका बन गयी है। ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी सभ्यता की उपस्थिति के लिये होने वाले अनुसन्धानों पर बेशुमार व्यय की जाने वाली धनराशि में उनका भी आर्थिक योगदान होता है जो यौनदुष्कर्म से पीड़ित होती हैं। क्या इस धनराशि का उपयोग धरती की आधी जनसंख्या की सुरक्षा के लिये नहीं किया जाना चाहिये? हम अपनी आधी दुनिया की तो सुरक्षा कर नहीं पा रहे और लगे हैं दूसरी दुनिया की सभ्यता की खोज में ...क्या इसलिये कि हम अपनी अपसंस्कृति का विस्तार वहाँ तक भी कर सकें? कल्पना कीजिये कि हम ब्रह्माण्ड में किसी अन्य मानव सभ्यता की खोज कर लेने में सफल हो जाते हैं। दोनों सभ्यताओं के लोग अपनी-अपनी सभ्यताओं के आदान-प्रदान के लिये एक प्रकल्प तैयार करने की योजना बनाते हैं। धरती के लोग हमारी सभ्यता की किन-किन बातों को छिपायेंगे और क्या-क्या प्रकाशित करेंगे? क्या वे यह बता सकने की स्थिति में होंगे कि धरती की आधी जनसंख्या असुरक्षित वातावरण में अपमानजनक जीवन जीने के लिये बाध्य है जबकि शेष आधी जनसंख्या के लोग ही इन सारी स्थितियों के लिये उत्तरदायी हैं?
   क्या हम यह मान कर चलें कि पुरुष की आदिम प्रवृत्ति आक्रामक है जो अपने ही समाज के अर्धांश के अस्तित्व के लिये चुनौती बन चुकी है? क्या यह पुरुष की वह प्रवृत्ति है जो हिंसा और पीड़ा में आनन्द के चरम को देख रही है। क्या यह पुरुष की वह प्रवृत्ति है जो निरंकुश होने में विश्वास रखती है। क्या यह पुरुष की वह प्रवृत्ति है जिसने उसे निर्लज्ज और निर्भय बना दिया है? क्या यह पुरुष की वह प्रवृत्ति है जो अपनी दुष्टता और क्रूरता से गौरवान्वित होती है? आख़िर क्यों आधी दुनिया उपेक्षित और अपमानित है और शेष आधी दुनिया या तो दुष्टता से मुस्करा रही है या फिर घड़ियाली आँसू बहा रही है?           
    मनुष्य अपनी शैशवावस्था में ईश्वर का प्रतिरूप सा होता है निर्दोष। बाल्यावस्था में आते ही सतोगुण के कारण भेद, रजोगुण के कारण लोभ और तमोगुण के कारण आक्रमण करना सीख जाता है। ये ही प्रवृत्तियाँ तो पशुओं में भी देखते हैं हम, फिर वह क्या है जो मनुष्य को हिंस्रपशु से पृथक करता है?  जो पृथक करता है वह है सभी प्राणियों के प्रति हमारी संवेदना और उनके प्रति कल्याण की भावना का होना। इस संवेदना और सर्वकल्याणकारी मानवीय गुण की कोटि सभी में एक जैसी न होना हमारी समस्याओं का मूल है। समाज और शासन की व्यवस्था का औचित्य यहीं से प्रारम्भ होता है। आज औचित्य समाप्त हो गया केवल समाज रह गया और व्यवस्था रह गयी, वह भी ....अपनी सम्पूर्ण विकृतियों के साथ। तो क्या यह पुनरीक्षण किसी बड़ी क्रांति के औचित्य पर विचार करने का अवसर है? हाँ, है ....यह अवसर आ गया है।
   समय-समय पर विभिन्न देशों के समाज ने अपने यहाँ इस तरह की क्रांतियाँ की हैं, दुर्भाग्य से ऐसी क्रांतियाँ व्यापक नहीं हो सकीं और समस्या बनी ही रही।
   मैं यह मानता हूँ कि समाज के भीतर एक निश्चित क्रांति और परिमार्जन की धारा निरंतर चलती रहनी चाहिये। इस धारा के अभाव में समाज में सड़ाँध उत्पन्न होने लगती है। स्त्रियों की स्थिति को लेकर पूरे विश्व में उठ रही सड़ाँध को समाप्त करने के लिये हमें सामाजिक सुधार करने होंगे। मेरी प्राथमिकताओं में प्रथम क्रम पर है स्त्री के प्रति सम्मान का भाव हृदय में निरंतर बनाये रखना। उत्तर-प्रदेश के अवधमण्डल की एक सामाजिक प्रथा अनुकरणीय है। वहाँ के पुरुष नवजात कन्या शिशु से लेकर (अपनी पत्नी को छोड़कर) अंतिम साँसे गिन रही वृद्धा तक के आदर के साथ चरणस्पर्श करते हैं। यहाँ उम्र की सीमा कोई अर्थ नहीं रखती, बस स्त्री होना ही पर्याप्त है। ऐसे संस्कार को क्या हमें अपने पूरे देश में व्यापक नहीं बनाना चाहिये? मैं यह नहीं कहता कि इससे यौनदुष्कर्म समाप्त हो जायेंगे किंतु यौनदुष्कर्म की घटनाओं में कमी होगी ...यह निश्चित है। यह एक भावनात्मक स्थिति है जो स्त्रियों के प्रति हमारे उपभोगवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकती है, बशर्ते भावना अपने शुद्ध रूप में भावना हो भावना का पाखण्ड नहीं। छत्तीसगढ़ में ऐसी परम्परा नहीं है, किंतु एक दिन जब मैंने अपनी महिला फ़ॉर्मासिस्ट से इस बात की चर्चा की और इससे होने वाले वैचारिक परिवर्तन के परिणामों पर प्रकाश डाला तो उन्होंने तुरंत प्रतिज्ञा की कि वे अपने घर की परम्परा में परिवर्तन करेंगी। वे उस दिन अपनी छह माह की बच्ची को टीका लगवाने लायी थीं। जब मैंने कहा कि परम्परा के अनुसार कन्यादान के समय आप कन्या के पाँव पूजते हैं, नवरात्रि के दिनों में उसे शक्ति का प्रतिरूप मानकर उसके चरणस्पर्श करते हैं तो शेष दिनों में इसके विपरीत आचरण क्यों? तब उन्होंने भावुक होकर अपनी बच्ची को सीने से लगा लिया और कहा कि वे अपनी बच्ची को किसी पुरुष के पैर नहीं छूने देंगी।  
   दूसरी प्राथमिकता है यौनदुष्कर्म की घटनाओं को रोकने के लिये सामूहिक प्रयास। हमें अन्याय का विरोध करने के लिये साहस जुटाना होगा, हमें खुलकर सामने आना होगा। हमें कानूनी प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पुलिस की अन्यायपूर्ण परेशानियों से बचने के लिये सामूहिक एक-जुटता बनाये रखनी होगी। ध्यान रहे कि पुलिस कानून से ऊपर नहीं है, जो भी अन्याय करे हमें उसके विरुद्ध न्यायिक संघर्ष छेड़ देना होगा। यह भी ध्यान रहे कि पुलिस विभाग के लोग इसी समाज के भाग हैं, मानवीय भावनायें और संवेदनायें उनके अन्दर भी जगाने का काम हमें ही करना है। पुलिस और नागरिकों के मध्य एक समझ विकसित करनी होगी। पुलिस के आततायी स्वरूप को समाप्त करने के लिये पूरी तरह शासन पर ही निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं।
   हमें समाज और व्यवस्था की विभिन्न कड़ियों को भी समझने की आवश्यकता है। जब कोई शासन अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर सकने में असफल हो जाय उस समय सबसे बड़ा उत्तरदायित्व समाज का ही होता है ...तब हमें अपने उत्तरदायित्व तय करने होते हैं। हम समाज के महत्वपूर्ण घटक हैं, समाज का निर्माण हमसे हुआ है, समाज पर पड़ने वाले हर प्रभाव से हम प्रभावित होते हैं इसलिये समाज का प्रमुख उत्तरदायित्व भी हमें ही निभाना होगा। कोई भी कानून समाज के कल्याण के लिये होना चाहिये, यदि कोई कानून इस उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे कानून में परिवर्तन का उत्तरदायित्व भी अंततः हमारा ही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि समाज पर नियंत्रण के लिये किसी आदर्श सत्ता की आवश्यकता होती है किंतु सत्ता पर नियंत्रण के लिये समाज का सजग होना अनिवार्य है।
   हमें अपने सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिये कई अभियान छेड़ने होंगे। हमें अपने आपसी सम्बन्धों पर ...उनकी शुचिता बनाये रखने पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। किसी समय हमारे पड़ोसी देश के चिंतक कुंग-फू-त्जू (आंग्ल संस्करण में कंफ़्यूशियस) को भी व्यक्ति, समाज और राजनीति के मध्य कुछ अनिवार्य सम्बन्धों पर चिंतन करने की आवश्यकता पड़ी थी। एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण करने के लिये आवश्यक हो गया था ऐसा करना।
   कुंग-फू-त्जू ने मानव समाज के सम्यक विकास और कल्याण के लिये पांच गुणों की निरंतरता पर बल देते हुये ‘वू च्छांग’ के नियम को अपने अनुयायियों के लिये अनिवार्य किया। उसने बताया कि मनुष्यता (रेन)  हमारा वह जातिगतगुण है जो स्वयं से परे अन्य लोगों के कल्याण के लिये एक सहृदय एवं करणीय भाव का संचार करता है। समाज के निर्माण और फिर उसके स्वस्थ्य पारस्परिक संबन्धों के लिये युक्तियुक्त संयोजन (यी),  औचित्य (ली),  बुद्धिमत्तापूर्ण विचार और कर्म (झी), तथा शब्दों का सम्मान (जिन) करने के गुण विकसित करना मनुष्य समाज की अनिवार्य आवश्यकतायें हैं।
   कुंग-फू-त्जू ने मानवीय सम्बन्धों की शुचिता पर अधिक बल देते हुये पाँच प्रकार के सम्बन्धों (वू लुन) के लिये एक आदर्श व्यवस्था सुनिश्चित की। ये सम्बन्ध हैं अभिभावक और बच्चों के बीच सम्बन्ध, शासक और शासित के बीच सम्बन्ध, पति-पत्नी के बीच सम्बन्ध, बड़े और छोटे भाई-बहनों के बीच सम्बन्ध और मित्र-मित्र के बीच आपसी सम्बन्ध।
   महाभारत में भी राजा और प्रजा के बीच, प्रजा-प्रजा के बीच, प्रजा और पर्यावरण की शक्तियों के बीच एक संतुलित सम्बन्ध की कामना का उल्लेख किया गया है। शुभ विचारों की भौगोलिक सीमायें नहीं होतीं ...कोई बाध्यता नहीं होती; परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार उनके क्रियान्वयन की दृढ़ इच्छ-शक्ति की आवश्यकता भर होती है जिसका, वर्तमान में तो अभाव ही प्रतीत हो रहा है। भारतीय ऋषि चिंतन का वैचारिक भण्डार इतना समृद्ध है कि प्रकाश के लिये हमें कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं।
     समाजिक क्रांति के लिये एक दीप जल चुका है। इस दीप को जलाने के लिये न जाने कितनी दामिनियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी है .....आहुति का यह क्रम अभी थमा नहीं है। अब इस क्रम को विराम देना होगा और अपने पुरुषार्थ की आहुति देने के लिये तैयार होना होगा। हम तो चल पड़े  ....और आप सभी का बड़े आदर के साथ आह्वान करते हैं कि इस यात्रा के सहयात्री बनने के लिये कटिबद्ध हो आगे आ जायें। न जाने कितनी दामिनियाँ हमारी-आपकी प्रतीक्षा में हैं। यज्ञ में अपनी-अपनी आहुति डालने के लिये आप सभी का स्वागत है।    

मिथिला में छत्तीसगढ़ का पुरोहित्

अवसर था मिथिला में अयोध्यानरेश दशरथ के पुत्रों के स्वयम्वर का। विवाह के लिये पुरोहित की आवश्यकता हुयी तो राम की ननिहाल की ओर दृष्टि उठी। कांकेर के पर्वतों पर तपस्या करने वाले कंक ऋषि के सुझाव पर श्रृंगी ऋषि को पुरोहित के रूप में आमंत्रित किया जाना तय हुआ।  

 

कांकेर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर उत्तर की ओर एक छोटा सा नगर है सिहावा। यह चित्र सिहावा की उस पर्वत श्रंखला का एक भाग है जहाँ श्रृंगी ऋषि तपस्या किया करते थे।  

कोहरे में छिपा कांकेर का गढ़िया पर्वत जो बस स्थानक से स्पष्ट दिखायी देता है। सुबह-सुबह सिहावा जाने के लिये बस की प्रतीक्षा में ......

सोमवार, 14 जनवरी 2013

धर्म और समाज


             प्रभाव किसका - धर्म का या अपनी व्याख्या का?

   इक्ष्वाकुवंशी राजा ‘दण्ड’ द्वारा दैत्यगुरु शुक्राचार्य की कन्या ‘अरजा’ के बलात्कार के अपराध में शुक्राचार्य के श्राप के परिणामस्वरूप श्रीहीन हुये उनके राज्य “दण्डकारण्य” के उत्तरी छोर पर (वर्तमान शासन द्वारा निर्मित) नव जनपद ‘कांकेर’ में एक ब्राह्मण रहते हैं। लोग उन्हें विद्वान शिक्षक के रूप में जानते हैं, शासन की सेवा से निवृत्त होने के पश्चात् अब वे ‘बहाईधर्म’ का प्रचार करने और हिन्दुओं को ‘बहाईधर्म’ में धर्मांतरित होने के लिये प्रेरित करने के कार्य में अपना शेष जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
   इसी श्रापित दण्डकारण्य की उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तर-पूर्वी सीमा को स्पर्श करते दो जनपदों में दो मुसलमान रहते हैं जो तुलसीकृत रामचरित मानस के “रामायणी कथा-वाचक” के रूप में विख्यात हैं। वे कथावाचक हैं, राम के आचरण के अनुशीलन के लिये तो लोगों को प्रेरित करते हैं किंतु किसी को धर्मपरिवर्तन के लिये नहीं।

        ऐसा क्यों है कि भारत की धरती से बाहर के आयातित धर्मों के सम्पर्क में आने के बाद धर्मप्रचारकों के जीवन का उद्देश्य दूसरों का धर्मांतरण कराना हो जाता है जबकि भारतीय धर्म के सम्पर्क में आने के बाद प्रभावितों के जीवन का उद्देश्य आचरण अनुशीलन के लिये लोगों को प्रेरित करना हो जाता है? एक विस्तारवादी बन जाता है तो दूसरा सौम्य और उत्कृष्ट मानवीय गुणों का सन्देशवाहक। यह धर्म विशेष की शिक्षाओं का प्रभाव है या व्यक्ति विशेष की धर्म के बारे में अपनी निजी व्याख्याओं का?

                    भारतीय समाज की चिंता का विषय

  अच्छे लोग अच्छे विचारों को समाज में परम्परा के रूप में सुस्थापित करने का प्रयास करते हैं। बड़े प्रयत्न के पश्चात् जब परम्परायें सुस्थापित हो जाती है तो सुविधाभोगी और विचारशून्य लोग परम्पराओं को विकृत करना प्रारम्भ कर देते हैं, तब अच्छी परम्परायें रूढ़ हो कर पाखण्ड में परिणित हो जाती हैं।
   यह समाज के बुद्धिजीवियों का उत्तरदायित्व है कि वे निरंतर विचारों और परम्पराओं का परिमार्जन करते रहें जिससे कोई परम्परा रूढ़ और विकृत होकर पाखण्ड न बन जाय, किंतु यदि ऐसा हो ही जाय तो उन्हें खुल कर ऐसे पाखण्डों के समूल उच्छेद के लिये कटिबद्ध हो जाना चाहिये। समाज के पतन के लिये असुरवृत्ति के मनुष्य तो उत्तरदायी हैं ही, बुद्धिजीवियों की वैचारिक शिथिलता भी संतुलन न बना सकने के कारण तुल्यकोटि में उत्तरदायी है। दुर्भाग्य से,  आज इस संतुलन की दिशा में लोगों की कटिबद्धता और समर्पण का अभाव समाज की एकता और देश की अखण्डता के लिये चिंता का विषय बन गया है।

धर्म और समाज

शनिवार, 12 जनवरी 2013

“आमचो बस्तर” -राजीव रंजन प्रसाद का ऐतिहासिक उपन्यास


राजीव रंजन प्रसाद का हालिया लिखा उपन्यास आमचो बस्तरअपनी ही धरती पर बेगानों के साथ मिलकर अपनों द्वारा क्रूरता से छिछियाये हुये पीड़ित संसार का इतिहास है, अतीत की गुफाओं में दफ़न किये जा चुके बस्तर के देशभक्त महानायकों की गौरवपूर्ण समाधि बनाने और उन पर श्रृद्धासुमन अर्पित कर बस्तर के इतिहास को पुनर्जीवित करने का सार्थक और स्तुत्य प्रयास है, शोषण की अजस्र प्रवाहित विषधारा के प्रति व्यापक चिंता है, छोटी-छोटी समस्याओं के विराट ज्वालामुखी हैं, विदूप हो ठठाते विकास की कड़्वी सच्चायी है, पत्रकारिता की निष्ठा पर अविश्वास है, गोलियों से बहे निर्दोष ख़ून और मासूम चीखों से अपने अहं को तुष्ट करती सत्ता की कहानी है, दुनिया के द्वारा ख़ारिज़ किये जा चुके आयातित विचारों की पोटली में छिपे बम हैं ....और हैं ढेरों प्रश्न जो किसी भी निष्पक्ष पाठक को झकझोरने, अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने और एक नई क्रांति के लिये पृष्ठभूमि की आवश्यकता पर चिंतन करने को विवश करते हैं।  
उपन्यास के भीतर से एक आह उठती है – “मेरे बस्तर! क्या तुम इसी प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी लोकतंत्र का हिस्सा हो? क्या बस्तर भारत का ही हिस्सा है?” देश को आज़ाद हुये आधी सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद इस तरह के आह भरे प्रश्न आज़ादी के स्वरूप और औचित्य के लिये चुनौती हैं।   
कई बार मैं यह सोचने के लिये विवश हुआ हूँ कि नैसर्गिक सौन्दर्य और प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर बस्तर कहीं इस आर्यावर्त की अभिषप्त भूमि तो नहीं?  त्रेतायुग में रावण का उपनिवेश रहा दण्डकवन, कलियुग में दुनिया के लिये अबूझ हो गया बस्तर, बीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश, भोसले और अरब आततायियों से आतंकित बस्तर, स्वतंत्र भारत में स्वाधीनसत्ता की गोलियों से भूने जाते निर्दोष गिरिवासियों-वनवासियों के शवों पर सिसकता बस्तर और वर्तमान में लाल-सबेरा के लाल-रक्त से प्रतिदिन स्नान करता बस्तर कब तक शोषित होता रहेगा और क्यों?
बस्तर की माटी में पले-बढ़े, अपने सर्वेक्षण और चिंतन को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त करते राजीव रंजन प्रसाद के उपन्यास आमचो बस्तरके पात्र भी इन्हीं प्रश्नों से जूझते नज़र आते हैं। बस्तर के प्राच्य इतिहास को अपने में समेटे इस ऐतिहासिक उपन्यास की प्रथम यवनिका उठते ही एक गोला सा दगता है- आख़िर सुबह क्यों नहीं होती?” प्रश्न स्वगत उत्तर के रूप में अपने को और भी स्पष्ट करता है- रोज-रोज माओवादी हमलों में मारे जा रहे आदिवासियों से वैसे भी दुनिया का क्या उजड़ता है?”
 प्रकृति ने तो बस्तर को बड़ी उदारता से सब कुछ बाँटा पर मनुष्य ने बस्तर को छलने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत की स्वतंत्रता के 12 वर्षों बाद बस्तर के वनवासियों के साथ भारत सरकार द्वारा एक क्रूर परिहास किया गया; उन्हें बताया गया कि भारत सरकार के द्वारा विजय चन्द्र भंज देव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सबके महाराजा हैं।
प्रवीर चन्द्र भंज देव को अपना महाराजा ...अपना अन्नदाता ...अपना भगवान मानने वाले बस्तर के भोले-भाले लोगों को नहीं पता कब किसकी हुक़ूमत आयी और कब किसकी ख़त्म हो गयी। उन्हें दिल्ली नहीं मालुम, उन्हें भारत सरकार नहीं मालुम। उन्हें बदला हुआ सत्य न बताकर उनकी आस्था भंग की गयी। बस्तर राज्य को भारतसंघ में स्वेच्छा से सम्मिलित कर चुके महाराजा प्रवीर को भारत सरकार ने बस ‘नाम भर’ का पूर्व राजा  मानने से इंकार करते हुये उनके छोटे भाई को ‘नाम भर’ का राजा घोषित कर दिया, एक ऐसा राजा घोषित कर दिया जिसका कोई संवैधानिक अस्तित्व नहीं था। किंतु ...इस घोषणा में जिस बात का अस्तित्व था वह था झूठी शान की दिलासा में दो भाइयों को एक-दूसरे का शत्रु बनाकर सत्ता में बैठे लोगों की अहं की तुष्टि। इस तुष्टि का परिणाम हुआ 31 मार्च 1961 को बस्तर के लोहण्डीगुड़ा में आदिवासियों पर पुलिस की बर्बर फ़ायरिंग। और फिर बस्तर राजमहल में निहत्थे प्रवीरचन्द्र भंज देव की पुलिस द्वारा बर्बर हत्या। क्या स्वतंत्र भारत की यही तस्वीर है?
 उपन्यासकार राजीव रंजन की एक बड़ी पीड़ा यह भी है कि देश के लोग बस्तर को अन्धों के हाथी की तरह देखते रहे हैं ...वह भी अपनी पूरी ज़िद के साथ। दूर दिल्ली में बस्तर के प्रति एक आम धारणा देश की संचार एवं सूचना व्यवस्था का परिहास करती है – “ ... अरे बस्तर से आये हो, लेकिन तुमने तो कपड़े पहन रखे हैं।
लोगों की दृष्टि में बस्तर कैसा है, लेखक ने इसका  बख़ूबी वर्णन किया है –“बस्तर में ख़ूबसूरती तलाशने के लिये दिल्ली से एक बड़ी पत्रिका के पत्रकार और प्रेस फ़ोटोग्राफ़र आये थे। जंगल-जंगल घूमे। उन्हे यहाँ की हरियाली में ख़ूबसूरती नज़र नहीं आयी। चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे जलप्रपात उन्हें सुन्दर नहीं लगे, न ही कुटुमसर जैसी गुफ़ाओं के रहस्य ने उन्हें रोमांचित किया। जिस ख़ूबसूरती की तलाश थी वह थी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपी निर्वस्त्र आदिवासी युवती।
बस्तर में ख़ूबसूरती तलाशने आये एक फ़्रांसीसी जोड़े को भी किसी नग्न आदिवासी युवती की तलाश थी। घुटनों से ऊपर स्कर्ट और टीशर्ट पहनने वाली रीवा को देखकर स्थानीय युवक के मन प्रश्न उठता है कि आख़िर इतने ख़ुलेपन और न्यूनतम वस्त्रभूषा के बाद भी इन्हें बस्तर में निर्वस्त्र आदिम जीवन को ही देखने की उत्कंठा क्यों है?” आगे लेखक ने चुटकी लेते हुये लिखा है- ....वह पिछड़ों के नंगेपन और विकसितों के नंगेपन के बीच के अंतर का विश्लेषण कर रहा था।
लेखक बस्तर की इस कृत्रिम छवि से व्यथित है इसलिये उसे ऐतिहासिक हवाला देते हुये बस्तर राज्य के पूर्व मंत्री की हैसियत वाले एक पात्र के माध्यम से यह स्पष्ट करना पड़ा कि, राजा अन्नमदेव से पहले नाग राजाओं की शासन पद्धति गणतंत्रात्मक थी। वैदिक युग से नागों के युग तक बस्तर की जनता का भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में विकास हुआ था। आगे, लेखक ने बस्तर की त्रासदी को रेखांकित करते हुये एक स्थान पर लिखा - जब एक समाज बाहर और भीतर के द्वार बन्द करले तो समझिये उस समाज ने पीछे की ओर दौड़ लगाना आरम्भ कर दिया है। राजा अन्नमदेव गणतांत्रिक व्यवस्था को कायम नहीं रख सके ...
 बस्तर की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास जंगल से दूर किसी महानगर के भव्य भवन के वातानुकूलित कक्ष में सुने-सुनाये मिथकों और कल्पना के सहारे नहीं लिखा गया बल्कि बस्तर के जंगल के भीतर बैठकर लिखा गया। इसीलिये उपन्यास एक ऐतिहासिक अभिलेख बन पड़ा है जिसके अतीत में खोये पात्र अत्याचार के विरुद्ध जूझते हुये और शोषण को अपनी नियति स्वीकार कर चुके आधुनिक पात्र विकास की आशा में बड़ी उत्सुकता से बस्तर से बाहर की ओर झाँकते नज़र आते हैं। गहन वन के अंधेरों को बेचकर ख़ुद के लिये रोशनी का ज़ख़ीरा जमा करते लोग बस्तर के अंधेरों को बनाये रखने के हिमायती हैं। अंधेरों के ख़िलाफ़ लड़ने की कसम खाते हुये कुछ तत्वों ने रूस और चीन से आयातित विचारों के सहारे एक समानांतर सत्ता कायम कर ली है जो अब ख़ुद भी अंधेरे बेचने लगी है। सत्ता के गलियारों में नक्सलवाद और माओवाद एक अज़ूबा फ़ैशन बनता जा रहा है जिसे समझने और समझाने की कोशिश में लेखक ने आदिवासी समाज की एनाटॉमी, प्रशासन की फ़िज़ियोलोजी और सत्ता की पैथो-फ़िज़ियोलॉजी का पूरी ईमानदारी के साथ विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण के प्रयास में एक कुशल जुलाहे की भूमिका निभाते हुये लेखक को अपनी बीविंग मशीन में आगे-पीछे के कई तानों-बानों को आपस में पिरोना पड़ा है जिसके कारण यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कई कहानियों को अपने में समेट कर चल सकने में समर्थ हो सका।
जल संसाधन की दृष्टि से बस्तर सम्पन्न है परन्तु बस्तर से होकर बहने वाली इन्द्रावती का लाभ पड़ोसी आन्ध्रप्रदेश के हिस्से में जाता है, लेखक ने इस जनसरोकार पर बहस छेड़ते हुये मुआवज़े के हक़ की बात अपने पाठकों के समक्ष रखी है। 
आज़ादी के बाद विकास की गंगा बहाये जाने का दावा करने वाली राज्यों की देशी सरकारों के पक्षपातपूर्ण सत्य को उजागर करने में, जहाँ भी अवसर मिला लेखक पीछे नहीं हटता –“बचपन का अर्थ होता है तितली हो जाना, खिलखिलाना, कूदना, सपने बुनना और जगमग आँखों से आकाश के सारे तारे लूट लेना ...लेकिन ऐसा बचपन?  शैलेष ने एक बार फिर भरी निगाह से देखा ...नहीं, उसमें बचपन था ही कहाँ?  वह लड़की आठ वर्ष की अधेड़ थी।          
आदिवासी समाज की समस्याओं का निर्धारण वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नहीं किया जा सकता। किंतु किया यही जाता है इसलिये बस्तर को विकास की धारा में शामिल करने का प्रयास एक पाखण्ड से अधिक और कुछ नहीं हो पाता। स्वतंत्र भारत की शिक्षानीति पर प्रहार करते हुये लेखक ने कई प्रश्न उठाये हैं- सोमली नहीं समझ पाती कि पढ़ायी क्यों ख़रीदी जानी चाहिये। .... पेट्रोल और डीजल को सब्सिडी देने वाली सरकारें शिक्षा के लिये भी ऐसा ही क्यों नहीं करतीं? एक जैसी स्कूल ड्रेस कर देने से एक जैसी शिक्षा तो नहीं हो जाती?  ....क्या यह ख़तरनाक नहीं है कि विद्यार्थियों में उन संस्थानों का गर्व हो जाये जहाँ सुविधा-सम्पन्नता अधिक है? ...ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जैसे स्कूल की ड्रेस एक जैसी होती है वैसे ही सबके स्कूल भी एक जैसे ही हों? उसी स्कूल में कलेक्टर का लड़का भी पढ़े तो वहीं झाड़ूराम की लड़की भी?”
देश में लागू की गयी व्यवस्था जब अपने नागरिकों में भेद करने लगे तो प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं – “ये तरक्की शालिनियों के ही हिस्से में क्यों है? यह कैसी व्यवस्था है जिसमें पिसने वाला अंततः मिट जाता है। व्यवस्था ऐसा सेतु क्यों नहीं बनती जिसका एक सिरा शालिनी हो और दूसरा सोमली?”
 सरकारी तंत्र ने वर्ग भेद समाप्त करने के नाम पर वर्ग भेद को समाज में इस कदर व्याप्त कर दिया है कि जंगल से शहर तक इसकी कटु अनुभूति पीछा नहीं छोड़ती –“कितनी अजीब बात है शालिनी, जगदलपुर में आदिवासी-ग़ैरआदिवासी वाली गालियाँ सुनते रहे; अब पिछड़ों और ग़ैर-पिछड़ों वाली गालियाँ सुनो।
नक्सलवाद बस्तर का मैलिग्नेण्ट कैंसर है। नक्सलवाद के प्रति आदिवासियों के स्वाभाविक झुकाव का दावा करने वाले नक्सली दावों की पोल खोलते हुये लेखक ने हक़ीक़त का बयान करते हुये स्पष्ट कर दिया है कि अपनी मोटियारिन के दैहिक शोषण से उफ़नाये ठुरलू ने फावड़े से मुंशी की हत्या कर दी और जंगल में भागकर नक्सलियों की शरण में चला गया। ठुरलू के नक्सली बन जाने की घटना की व्याख्या लेखक ने अपने एक पात्र मरकाम के द्वारा कुछ इस तरह की- ठुरलू का नक्सलवादी हो जाना परिस्थिति का परिणाम है, किसी विचारधारा का नहीं।
सन् 1857 की क्रांति से तुलना करते हुये लेखक ने आधुनिक नक्सलियों की विचारधारा का विरोध कुछ इस तरह से किया- जैसे चिंगारी से आग लग जाती है वैसे ही क्रांति भी स्वतः स्फूर्त होती है। क्रांति आयातित नहीं होती, क्रांति के लिये बड़ी-बड़ी विचारधाराओं की किताबें नहीं चाटी जातीं, ...”
नक्सलियों द्वारा बारूदी सुरंगों के ज़रिये की जाने वाली हत्याओं की दैनिक परम्परा में शासकीय कर्मचारी की मौत पर लेखक का आक्रोश बहुत ही सधे शब्दों में व्यक्त होता है –“देवांगन आम आदमी थे या नहीं इस पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों में मतभिन्नता हो सकती है। देवांगन तथाकथित क्रांतिकारियों के मापक में कितने डिग्री के आम आदमी कहलायेंगे इस पर समाजसेवियों तथा प्रबुद्ध लेखकों में महीनों का विचारमंथन अवश्यम्भावी है।
 नक्सलियों द्वारा बलात् स्थापित आदिवासी क्रांति के हश्र की एक निहायत भोली और विवश अनुभूति लेखक की कलम से कुछ इस तरह व्यक्त होती है – “ .....अपने घर से उठाये जाने के बाद बोदी को महीनों शारीरिक और मानसिक यातनाओं के दौर से गुज़रना पड़ा। अब उसे याद नहीं कि वह कितने शरीरों के लिये मोम की गुड़िया बनी। क्या क्रांतिकारियों के शरीर नहीं होते?”
 नक्सलियों के सच को प्रतिबिम्बित करती एक अभिव्यक्ति देखिये – “झोपड़ी के दरवाजे पर एक कागज़ चिपकाया गया जिस पर लाल स्याही से कुछ लिखा हुआ था। लिखे हुये अक्षर कोई नहीं समझता किंतु लाल रंग के आतंक से अब कौन परिचित नहीं? सुबह अंधेरा और फैला ....गाँव खाली हो गया।
 नक्सलियों की तथाकथित जनक्रांति पर लेखक की चिंता पाठक को झकझोरती है – “यह कैसी क्रांति होने जा रही है जिसमें मरने और मारने वाला तो आदिवासी होगा लेकिन इस खेल के सूत्रधार शतरंज खेलेंगे।
कुख्यात ताड़मेटला काण्ड, जिसमें केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को नक्सलियों द्वारा उड़ा दिया गया था, पर चर्चा करते हुये लेखक ने कहा है – “वे क्रांति कर रहे थे। उन्हें इतना लहू चुआना था कि एक-एक दिल में दहशत घर कर जाये। वे उन सभी के घरों में घना अंधेरा करने की नीयत से ही आये थे जो क्रांति की राह में रोड़ा बन गये हैं। ..... वो औरंगज़ेब के ज़माने थे जब व्यवस्थायें तलवार की नोक पर बदला करती होंगी। माओ के नाम पर ख़ून-ख़राबों ने कई दशक देख लिये, क्या बदल गया?  कहाँ आयी वह लाल सुबह?  क्या आवाज़ उठाने का तरीका हथियार ही है?  क्या लहू बहेगा तो ही बदलाव की कालीन बनेगा?” 
 शहरों में बैठकर जंगल के बारे में की जा रही पत्रकारिता की संदिग्ध निष्ठा लेखक को उद्वेलित करती है। प्रकाशन का व्यापार किसी लेखक के लेखनधर्म को किस तरह दुष्प्रभावित करता है इस पर एक व्यंग्य देखिये – “जानकारियाँ काफ़ी नहीं होतीं। ......पाठक क्या पढ़ेंगे उसकी नब्ज़ पकड़ो। फिर नक्सलवाद क्या है? यह सोशियो-इकोनॉमिक प्रॉब्लेम है। ...तुम दोनों को अभी और पढ़ने की ज़रूरत है। मार्क्स को पढ़ो, लेनिन और माओ को जानो, चे ग्वेरा के संघर्ष को समझो तभी नक्सलवाद को गहराई से जान सकोगे। तभी तुम बस्तर के नक्सलवाद का सही विश्लेषण कर सकोगे।
 मैंने बस्तर पर आर्टिकल लिखा था। मुझे नारायणपुर में रहते बीस साल से अधिक हो गये। मुझे सिखाता है कि बस्तर कैसा है और मुझे क्या लिखना चाहिये।
पत्रकारिता के हो रहे नैतिक पतन से आहत लेखक का एक व्यंग्य देखिये –“ देवी जी प्रयोग करके देखिये। आप ग़ुलाब हैं, ग़ुलाबी ड्रेस में ख़ूबसूरत दिखती हैं। कल हमारी रिपोर्ट ले जाइयेगा और अदब से झुककर खन्ना से मिलियेगा।
खन्ना के केबिन से बाहर आने के बाद निधि सीधे दीपक के पास आयी और बगल में बैठ गयी ...
क्या हुआ ? दीपक मुस्कराया।
कल मैटर लग जायेगा।
यह मेरी लिखी हुयी लाइन का नहीं, तुम्हारी नेक-लाइन का कमाल है। 
पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता भी बस्तर की त्रासदियों में अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभाती है, लेखक की यह पीड़ा कुछ इस तरह अभिव्यक्त हुयी है – “ .....इन घटनाओं में राष्ट्रीयसमाचार बनने के तत्व क्यों नहीं हैं? दिल्ली के पास साउण्ड है, कैमरा है और एक्शन है ...नौकर ने मालिक का क़त्ल किया राष्ट्रीय ख़बर है। बाप ने बेटी का क़त्ल कर दिया सी.बी.आई. जाँच करेगी। बियर-बार में क़त्ल हुआ समूचा राष्ट्र आन्दोलन करेगा। मानव केवल दिल्ली या कि नगरों-महानगरों में रहते हैं जिनके अधिकार हैं?”
 बस्तर के सच्चे इतिहास की सदा ही उपेक्षा की जाती रही है। लेखक ने प्रश्न किया है – “क्यों इतिहास बाबरों-अकबरों और अंग्रेजों के ही लिखे जाते हैं? भारत देश के इतने विशाल भूभाग के प्रति ओढ़ा गया अन्धकार क्या नक्सलियों को प्रोत्साहन नहीं है? क्या जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कहानिय़ाँ ही पाठ्यपुस्तकों में परोसी जायेंगी ? क्या गुण्डाधुर, डेबरीधुर, यादव राव, व्यंकटरव, गेंद सिंह जैसे संकल्पी और साहसी आदिवासी इतिहास के किसी पन्ने को दस्तक देने की क्षमता रख सकते हैं? क्या यह होगा कि अगले सौ-पचास साल बाद जब बस्तर का इतिहास लिखा जायेगा तो इसके नायक बदल चुके होंगे? अतीत के इन आदर्शों की स्मृतियों पर लाल खम्बे गड़ चुके होंगे?”
बस्तर की जनजातीय परम्परायें अनोखी और आकर्षक रही हैं। बस्तर एक दीर्घकाल तक शेष विश्व के लिये अबूझ रहा। बस्तर अपने घरेलू और बाहरी शोषकों के लिये उर्वर चारागाह रहा। बस्तर एक जीती जागती प्रयोगशाला रहा। पर्यटन की दृष्टि से विश्व स्तर का स्थान होते हुये भी बस्तर उपेक्षित रहा। बस्तर की धरती अमीर है पर इसके निवासी सदा ग़रीब रहे। बस्तर को दूर बैठकर करीब से देखने का एक अवसर है “आमचो बस्तर”।