आदेश है
कि लोग सोचें
केवल तुम्हारी तरह
रहें
केवल तुम्हारी तरह
जियें भी
तो केवल तुम्हारी तरह
क्योंकि तुम बनाना चाहते हो
विश्वगुरु
पता नहीं
स्वयं को
या पूरे देश को!
किंतु मैं
नहीं बनना चाहता विश्वगुरु
बनकर
तुम्हारा वैचारिक दास।
संभव ही नहीं है
सच हो पाना
तुम्हारा हठ।
तुम इसे ही कहते हो
लोकतंत्र
मैं इसे ही कहता हूँ
आॅब्सेसिव कंपल्सिव बिहैवियर
जिसके लिए जाना होगा तुम्हें
किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास
हाँ!
तुम रुग्ण हो
जान चुका है पूरा देश।
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