आगे बढ़ना
हिमालय पर चढ़ना होता है
जिसके लिए उतारने होते हैं
एक-एक कर अपने सारे बोझ।
आगे की यात्रा
शून्य की यात्रा है
संकुचित से विराट की यात्रा
जहाँ सब कुछ
छोड़ देना होता है एक-एक कर
और तुम
मंदिर बनवा रहे हो
ताकि स्थापित हो सके
तुम्हारी स्वर्णमूर्ति!
भगवान बनने का
ऐसा ही अदम्य दुस्साहस
हिरण्यकश्यप ने भी किया
दशानन ने भी किया
और अब तुम भी कर रहे हो
उपेक्षा कर इस सत्य की भी
कि प्रतिपल बनते इतिहास में
लिखा जा रहा है सब कुछ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.