रविवार, 6 सितंबर 2026

स्वर्णमूर्ति

आगे बढ़ना
हिमालय पर चढ़ना होता है
जिसके लिए उतारने होते हैं
एक-एक कर अपने सारे बोझ।
आगे की यात्रा 
शून्य की यात्रा है
संकुचित से विराट की यात्रा 
जहाँ सब कुछ 
छोड़ देना होता है एक-एक कर
और तुम 
मंदिर बनवा रहे हो
ताकि स्थापित हो सके 
तुम्हारी स्वर्णमूर्ति!
भगवान बनने का 
ऐसा ही अदम्य दुस्साहस
हिरण्यकश्यप ने भी किया
दशानन ने भी किया
और अब तुम भी कर रहे हो
उपेक्षा कर इस सत्य की भी
कि प्रतिपल बनते इतिहास में
लिखा जा रहा है सब कुछ।

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