रविवार, 14 नवंबर 2010

.....उत्तर-मधुशाला

बस्तर की मधुशाला से पहले कुछ और रंग.........
व्यापारी हैं सारे रिश्ते 
राह निहारे साकीबाला /
कहीं मिले ना सुकूं अगर, तो 
आ जाना तुम  मधुशाला /

उतरे चढ़ कर, ऐसी हाला 
से मत भरना अपना प्याला /
कहीं मिले तो ले आना तुम
भरे  हृदय की धधकी   ज्वाला  /

दाम चुका कर  भी  न  मिलेगी 
मैं  पीता हूँ  जो हाला /
सारे जग की पीड़ा तपकर 
बन पाती है असली हाला /

ताक रहा क्यों इधर-उधर तू
करके अपना खाली प्याला /
तेरे हिस्से में जितनी है 
उतनी पी, हो जा मतवाला /

औरों को कर देती बेसुध
होश में रहकर साकीबाला /
होश संभालो अपने-अपने
जग की रीत है मधुशाला /





3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद उम्दा प्रस्तुति।
    बाल दिवस की शुभकामनायें.
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (15/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  2. वन्दना जी ! सादर अभिवादन
    मधुशाला की इस प्रस्तुति को साहित्यिक मंच पर चर्चा हेतु चुनने के लिए सादर आभार /
    कल आपके आदेश का पालन अवश्य होगा

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.