वह सामान्य था
पिछड़ा हो गया
फिर अतिपिछड़ा हो गया
फिर दलित हो गया
अब अतिदलित भी हो गया
जैसे-जैसे
चढ़ता गया शिखरों पर
सत्ता के
वह गिरता गया।
वह होता जाता है निरंतर
और भी अधिक
वंचित, पीड़ित, शोषित...
सत्ता की उपलब्धियों के साथ।
यह नया समाजविज्ञान है
बिना किसी वैज्ञानिक तथ्य के
कि चढ़ते हुए शिखर पर
होता जाता है नायक
कितना नालायक
और कितना पतित
झपटने के लिए चरमानंद
जैसे
पतन में प्राप्त करते हैं
चरमानंद
एप्स्टीन की दुनिया के लोग।
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