मोतीहारी वाले मिसिर जी की "द्वैतकविता"
दो भगवान
एक मेरा,
दूसरा तेरा।
दो धर्म
एक प्राकृतिक,
दूसरा राजनीतिक।
दो राम
एक जनता का,
दूसरा सत्ता का।
दो सत्य
एक जन का,
दूसरा जन-प्रतिनिधि का।
दो झूठ
एक जनता का,
दूसरा सरकार का।
दो देश
एक सनातनियों का,
दूसरा घुसपैठियों का
दो दूध
एक केवल उसकी माँ का,
दूसरा बकरी का।
दो गाय
एक माता,
दूसरी काटकर खाई जाने वाली।
दो आज़ादी
एक जो मिली नहीं,
दूसरी जो मिलकर भी बची नहीं।
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