शनिवार, 4 मार्च 2017

आख़िर क्यों





इसमें कोई शक़ नहीं कि ख़ूबसूरत नैरिन किस्मत वाली भी थी जबकि नादिरा की किस्मत...                
वर्ष दो हजार चौदह का अगस्त महीना अभी शुरू ही हुआ था कि तीन तारीख़ की सुबह अपने-अपने घरों में रोज़मर्रा के काम कर रही औरतें और बच्चे अचानक उठे शोर-शराबे से सहम गये । गाँव के भयभीत मर्दों ने चीख-चीख कर लोगों को गाँव छोड़कर कहीं सुरक्षित स्थान पर भाग जाने के लिए पुकारना शुरू कर दिया था । हड़बड़ाये और भयभीत लोगों ने थोड़े से कपड़ों और कुछ मूल्यवान चीजों के साथ इधर-उधर भागना शुरू कर दिया । उस दिन इस भीड़ में चौदह साल की एक ख़ूबसूरत बच्ची नैरिन भी शामिल थी जो भगदड़ और हड़बड़ाहट में अपनी अम्मी और अब्बू से बिछड़ गयी । नैरिन के साथ था उसका बड़ा भाई और बचपन की एक सहेली शायमा । वे तीनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुये भाग रहे थे । भागते समय नैरिन के भाई की आँखें अपनी नवविवाहिता नादिरा को खोज रही थीं । वह बदहवास सा नादिरा-नादिरा चिल्लाता जा रहा था । 
ईराक़ के पश्चिमी छोर पर स्थित निनवेह के मैदानी इलाके में बसे तेल उज़र में ज़िन्दग़ी रोज की तरह चल रही थी । यज़ीदियों का यह एक शांत इलाक़ा था जिसमें वे न जाने कितनी पीढ़ियों से रहते आये थे । दो हजार बारह में इस्लामिक स्टेट के लिए सक्रिय हुये ज़िहादियों ने मध्य एशिया के ग़ैरमुस्लिमों के अस्तित्व को पूरी तरह नकार दिया और उनका नस्लीय उन्मूलन शुरू कर दिया । धीरे-धीरे इस्लामिक स्टेट के प्रभुत्व वाले ईराक़ और सीरिया के कई क्षेत्रों में इस्लामिक लड़ाकों और सरकार के बीच जंग छिड़ गयी । इस्लामिक लड़ाके जहाँ जाते वहाँ तबाही मच जाती ।
तेल उज़र की भी शांति को ज़ल्दी ही ग्रहण लग गया, वहाँ के शांत वातावरण में पिछले कई महीनों से रोज-रोज उथल-पुथल मचाने वाली आइसिस की क्रूरता की नयी-नयी ख़बरें लोगों को भयभीत करने लगी थीं । इस्लामिक स्टेट के ज़िहादी ग़ैर मुस्लिम लड़कियों की अस्मत लूट रहे थे, उन्हें ज़ानवरों की तरह पीट  रहे थे, ग़ैरमुस्लिमों को या तो मुसलमान बना रहे थे या फिर उनकी हत्यायें कर रहे थे जबकि ईराक़ की सरकार और फ़ौज़ उनके सामने लाचार हो रही थी । सिंजर और मोसुल के कई इलाकों पर इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों का कब्ज़ा हो गया । आसपास के गाँवों और शहरों से आने वाली ख़बरों ने तेल उज़र की फिज़ां में दहशत घोल दी थी ।  
तीन अगस्त दो हजार चौदह की उस सुबह तेल उज़र की बदहवास भीड़ में हजारों की संख्या में स्त्रियों और मर्दों ने सिंजर का रुख़ किया । भीड़ में छोटे-छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष भी थे जो बाकी लोगों की तुलना में निरंतर पिछड़ते जा रहे थे । भीड़ के एक हिस्से ने उत्तर दिशा की ओर लक्ष्य किया, यह एक रेगिस्तानी इलाक़ा था जिसे पार करने के बाद वे सब सिंज़र पहाड़ पर बने एक शरणार्थी शिविर में पहुँचना चाहते थे । उन्हें अपने कस्बे तेल-उज़र से निकले हुये ब-मुश्किल अभी एक घण्टा ही हुआ होगा कि स्वचालित हथियारों और आइसिस के झण्डों से लैस गाड़ियों में सवार इस्लामिक ज़िहादियों ने भीड़ को घेर लिया । भयभीत औरतों और बच्चों ने बुरी तरह रोना-चीखना शुरू कर दिया, चारों ओर कोहराम सा मच गया । इस कोहराम से आइसिस के ज़िहादियों का उत्साहवर्द्धन हुआ, वे अल्लाह-हो-अकबर के नारे लगाने लगे, उनके चेहरों पर विजय का उल्लास था ।  अपनी पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार वे सब गाड़ियों से नीचे उतरे और भीड़ को तीन समूहों में बाँट दिया । एक समूह में थीं किशोरियाँ और युवतियाँ, दूसरे में थे बच्चे, किशोर और युवा जबकि तीसरे समूह में बुज़ुर्ग स्त्रियों और मर्दों को शामिल किया गया था । ज़िहादियों ने बुज़ुर्ग औरतों और मर्दों से सारी नगदी और ज़ेवरात छीन कर उन्हें पास के एक नखलिस्तान में बेसहारा छोड़ दिया, किशोरियों और युवतियों को ट्रक में ठूँस दिया जबकि तीसरे समूह को गोलियों से भून दिया । नैरिन के बड़े भाई को, जिसकी उम्र महज़ उन्नीस साल थी और जिसकी मात्र छह महीने पहले ही शादी हुयी थी, ज़िहादियों ने गोली मार दी । मर्दों के उस समूह में अब कोई भी ज़िन्दा नहीं था । 
दोपहर के बाद यज़ीदी औरतों से भरे ट्रक को सीरिया की सरहद के पास एक छोटे से कस्बे बाज में एक स्कूल के पास रोका गया । जब ट्रक से उतर कर यज़ीदी स्त्रियों ने स्कूल में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि वहाँ स्कूल में पहले से क़ैद कुछ यज़ीदी स्त्रियाँ मौज़ूद थीं और वे भी अपने घर के कई मर्दों को हमेशा के लिए खो चुकी थीं । दहशत की काली छाया उनके चेहरों पर साफ़ नज़र आ रही थी । नैरिन भयभीत थी लेकिन उसके मस्तिष्क में कई तरह की बातें उमड़-घुमड़ रही थीं । जब सभी स्त्रियाँ स्कूल के अन्दर दाख़िल हो गयीं तो एक ज़िहादी ने अन्दर आकर ऊँची आवाज़ में शहादा शुरू किया – “मैंने इस बात की पूरी तस्दीक कर ली है कि अल्लाह के अलावा और कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है और यह भी कि एकमात्र मोहम्मद ही उनके रसूल हैं। इसके बाद उसने कहा कि सभी स्त्रियाँ उसकी इस बात को दोहरायें जिससे कि वे मुसलमान बन सकें । दहशतज़दा औरतों ने एक-दूसरे के चेहरों की ओर देखा और ख़ामोश ही बनी रहीं, उन्होंने शहादा की उस घोषणा को नहीं दोहराया । यज़ीदी औरतों ने मरने या फिर हर तरह के नर्क़ को झेलने का फ़ैसला कर लिया था । इससे ज़िहादी गुस्से में आ गये और उन्होंने यज़ीदियों की धार्मिक मान्यताओं को कोसना और बद-दुआ देना शुरू कर दिया ।
दो दिन बाद उन सबको आइसिस के ईराक़ी मुख्यालय मोसुल ले जाया गया जहाँ एक बड़े से हॉल में उन्हें एकत्र होने के लिए कहा गया । हॉल में कुछ और भी यज़ीदी स्त्रियाँ पहले से मौज़ूद थीं । उन्हें भी इसी तरह उनके परिवार से अलग कर लाया गया था, वे भी अपने घर के कई सदस्यों को हमेशा के लिए खो चुकी थीं । ज़िहादी लड़ाकों में से कुछ की उम्र तो महज़ तेरह-चौदह साल ही थी किंतु क़त्ल कर देना उनके लिये एक रोमांचक खेल सा बन चुका था ।
मोसुल के उस हॉल में उन्हें क़ैद हुये बीस दिन हो चुके थे । वहाँ सभी स्त्रियों को ज़मीन पर सोना पड़ता और जीने के लिए एक दिन और एक रात में मिलाकर सिर्फ़ एक बार भोजन दिया जाता था । थोड़ी-थोड़ी देर पर वहाँ कोई न कोई आता रहता था जो सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने के बारे में कहा करता । अपने घर के मर्दों और बच्चों को खो चुकी औरतें अधिकांश समय सुबकती रहतीं और एक-दूसरे से अपने दुःखों का बयान किया करतीं । 
एक दिन उस क़ैदखाने के एक सुरक्षाकर्मी ने आकर शादीशुदा स्त्रियों और कुमारी लड़कियों को अलग-अलग कर दो समूहों में बांट दिया । नैरिन और उसकी बचपन की सहेली शायमा को फ़ल्लुज़ाह निवासी ऊँची रसूख़ वाले इस्लामिक स्टेट के समर्थक दो मुसलमानों की ख़िदमत में भेंट कर दिया गया । चौदह साल की नैरिन एक थुलथुल शरीर और काली घनी दाढ़ी वाले पचास साल के अबू अहमद के हिस्से में आयी जबकि शायमा एक अधेड़ मौलवी अबू हुसैन के हिस्से में पड़ी । अबू अहमद और अबू हुसैन अपने एक ख़िदमतगार के साथ फ़ल्लुज़ाह के जिस घर में रहते थे वह एक आलीशान महल जैसा था । उस आलीशान महल में नैरिन और शायमा को धर्म परिवर्तन और बलात्कार के लिए बुरी तरह पीटा जाता और सिर्फ़ एक बार ख़ाना दिया जाता । यह उनका रोज का सिलसिला बन गया था, ज़िन्दग़ी नर्क से भी बदतर बन चुकी थी और जीने का अब कोई मक़सद नहीं रहा था । निराश होकर दोनों ने आत्महत्या के लिए योजना बनानी शुरू कर दी । वे जब भी अकेली होतीं तो ख़ुदकुशी के बारे में बातें किया करतीं या फिर अपने घर वालों को याद कर कर के रोती रहतीं ।
फ़ल्लुज़ाह के आलीशान महल में नर्क़ भोगते हुये पाँच दिन गुज़र चुके थे । छठे दिन सुबह जब अबू अहमद अपने ख़िदमतगार के साथ व्यापार के सिलसिले में मोसुल चला गया और सातवें दिन शाम को सूरज डूबने के समय अबू हुसैन भी शाम की नमाज़ के लिए मस्ज़िद चला गया तो दोनों लड़कियों ने फ़ोन करके फ़ल्लुज़ाह के अपने एक परिचित सुन्नी महमूद से मदद की गुहार की । महमूद ने बताया कि उस महल से उन्हें निकाल पाना बहुत ही ख़तरनाक है लेकिन अगर वे किसी तरह ख़ुद ही महल से बाहर आ सकें तो वह उन्हें उनके घर तक पहुँचाने में मदद कर सकेगा । वक़्त बहुत कम था और लड़कियों को किसी भी तरह उस नर्क़ से बाहर आना था । अपनी सूझ-बूझ और चतुरायी से वे दोनों महल से बाहर आने में क़ामयाब हुयीं और पैदल ही उस दिशा में चल दीं जहाँ महमूद ने उनसे मिलने का वादा किया था । महमूद की हिदायत पर महल से आते वक़्त उन्होंने आबाया पहनने में भूल नहीं की इसलिए ख़ुद को छिपा कर भागने में सहूलियत हुयी । जब वे महल से भाग कर बाहर आयीं तो शाम का वक़्त था और नमाज़ की वज़ह से गलियाँ लगभग सूनी थीं । लगभग पन्द्रह मिनट चलने के बाद उन्हें महमूद दिखायी दिया तो जैसे दोनों को एक नयी ज़िन्दग़ी मिल गयी ।  उस रात दोनों लड़कियों को भरपेट खाना भी मिला और सोने के लिए एक बिस्तर भी ।  
सुबह होते ही महमूद ने बगदाद के लिए एक टैक्सी तय की । ड्रायवर आइसिस के लड़ाकों से भयभीत था किंतु ख़ुदा के नाम पर मदद के लिए सम्भावित ख़तरे मोल लेने के लिए तैयार हो गया । दोनों लड़कियों को फ़ल्लुज़ाह की स्त्रियों जैसे कपड़े और निक़ाब दिये गये । महमूद ने कहीं से दो छात्राओं के नकली परिचय पत्र भी जुगाड़ लिये थे ताकि चेक पोस्ट पर उन्हें दिखाया जा सके । हर चेक पोस्ट पर दोनों लड़कियों के साथ-साथ ड्रायवर की भी धड़कन तेज़ हो जाती । और जैसे ही चेक पोस्ट पार होता कि उन्हें फिर एक नयी ज़िन्दग़ी मिल जाती । लगभग दो घण्टे बाद दोनों बगदाद पहुँच गयीं जहाँ उन्होंने अपने यज़ीदी परिचितों से फ़ोन पर सम्पर्क किया । अपने परिचितों के घर में दाख़िल होते ही वे निढाल सी हो गयीं । ये ख़ुशी के ऐसे क्षण थे जिनका वर्णन कर पाना उन दोनों के लिए सम्भव नहीं था ।
उस दिन उन दोनों ने अच्छी तरह स्नान किया, जैसे कि इतने दिनों के नर्क को धो देना चाहती हों । पहनने के लिए उन्हें साफ़ कपड़े दिये गये और खाने के लिये लज़ीज़ खाना । इतने दिनों बाद दोनों लड़कियाँ चैन की नींद सो सकीं । सुबह हुयी तो दोनों ने बड़े आत्मविश्वास के साथ घर के बुज़ुर्गों के साथ बैठकर आगे की यात्रा की योजना पर चर्चा की । शायमा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, वह परिन्दों की तरह उड़कर तेल उज़र पहुँचने के लिए बेताब हुयी जा रही थी, ज़ल्दी नैरिन को भी थी किंतु फ़ल्लुज़ाह के नर्क़ की यादें अभी तक उसका पीछा नहीं छोड़ पा रही थीं जबकि वह उन यादों को किसी निक़ाब की तरह नोच कर फ़ेक देना चाहती थी । वह बारबार अपने विचारों को झटकने की कोशिश करती किंतु घनी काली दाढ़ी वाले घिनौने से लगने वाले थुलथुल आदमी की सूरत उसे बारबार दबोच लेती ।  
बगदाद में उनके लिए एक बार फिर दो नये नकली परिचयपत्रों की व्यवस्था की गयी । योजना यह थी कि लड़कियों को हवाई यात्रा से कुर्दिस्तान की राजधानी इरबिल तक पहुँचाया जाना था । परिचितों ने आनन-फ़ानन में उनके लिए फ़्लाइट की व्यवस्था की । बगदाद की हवाई पट्टी को छोड़ते ही दोनों ने राहत की साँस ली । सारे दुःस्वप्न पीछे छूटने लगे थे, ज़िन्दग़ी जैसे फिर से खिलखिलाने को तैयार होने लगी थी ।
इरबिल में ईराक़ी पार्लियामेण्ट के यज़ीदी सदस्य वियान दाख़िल के यहाँ उन्होंने एक रात और गुज़ारी । नैरिन और शायमा को यक़ीन नहीं हो रहा था कि वे आज़ाद हो चुकी हैं, वे पागलों की तरह ख़ुशी से चीखना चाहती थीं । अगले दिन वे यज़ीदी धर्म गुरु बाबा शेख़ से मिलने के लिए शेख़ान गयीं और फिर वहाँ से ख़ानके जहाँ नैरिन की अम्मी आइसिस के चंगुल से किसी तरह बचकर अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पहुँच गयीं थीं और दिन-रात अपने बेटे, बेटी और जवान बहू के लिये रोती रहती थीं ।
अम्मी ने जैसे ही नैरिन को देखा तो वे चीख पड़ीं, उन्हें जैसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था । उन्होंने दौड़ कर नैरिन को सीने से लगाकर दोनों बाहों में दबोच लिया । रोती हुयी अम्मी ने थोड़ी देर बाद जब नैरिन को चूमने के लिए पकड़ ढीली की तो वे अचानक जैसे होश में आ गयीं, नैरिन उनकी बाहों में बेहोश हो चुकी थी । वहीं ज़मीन पर बैठी शायमा रोये जा रही थी ।
         होश में आने के बाद नैरिन ने सबसे पहले अपनी भाभी नादिरा के बारे में पूछा । नादिरा गज़ब की ख़ूबसूरत थी, इसीलिये फ़ल्लुज़ाह के नर्क़ को भोग चुकने के बाद नैरिन उसके लिए बेहद चिंतित हो रही थी । जब उसे बताया गया कि आइसिस के ज़िहादियों ने उसे मोसुल में यौनदासी बनाकर क़ैद में रखा है तो दोनों लड़कियाँ चीख मार कर रो उठीं । बाद में नैरिन ने रोते हुये अम्मी को बताया कि आइसिस के लड़ाकों ने उसी दिन भाई को गोली मार दी थी । ख़बर सुनकर अम्मी जैसे पत्थर की हो गयीं । उनका मस्तिष्क शून्य सा हो गया । शायमा रोती हुयी चीख रही थी – ये इस्लाम वाले दुनिया को ख़त्म कर देने पर क्यों उतारू है ? आख़िर हमने किया क्या है ?    

गुरुवार, 2 मार्च 2017

कहानी नहीं इतिहास



  
नन्हीं याना उसकी आत्मा का बन्धन थी, याना की ममता ने उसे मरने नहीं दिया और इस्लाम ने उसे जीने नहीं दिया । तीन साल की याना को उसकी माँ आनिया की गोद से छीनकर कमरे से बाहर कर देने के बाद घनी दाढ़ी वाले अबू-अली-शम ने अन्दर से दरवाज़े की कुण्डी बन्द कर ली । नन्ही याना ने चीख-चीख कर रोना शुरू कर दिया तो अबू के रहमदिल दोस्त ने जेब से चॉकलेट निकालकर याना को देने का प्रयास किया । वह लगातार रोये जा रही थी, उसने चॉकलेट नहीं ली और बन्द दरवाज़े की ओर बारबार अपनी नन्हीं उंगली से इशारा कर अम्मी-अम्मी रटती रही । ऐसा प्रतिदिन होता था, कभी-कभी तो दिन भर में चार-पाँच बार तक भी । नन्हीं याना यह कभी नहीं समझ सकी कि कुछ लोगों के आते ही उसे कमरे से बाहर क्यों भगा दिया जाता और फिर उनके जाते ही अम्मी उसे भींच कर क्यों बिलख उठती थी । उसे अनजान लोग कभी अच्छे नहीं लगते, वह अम्मी को एक पल के लिए भी नहीं छोड़ना चाहती थी । बहुत ज़ल्दी उसने अनजान लोगों के आते ही चिड़चिड़ी हो उठना सीख लिया था । कमरे के बाहर याना का रुदन आनिया के कान में पिघले लोहे सा लगता और वह सुन्न हो जाती । 
आनिया को जिस मकान में रखा गया था वहाँ अल्लाह में गहरा यक़ीन रखने वाले काली, खिचड़ी या फिर सफ़ेद दाढ़ी वाले तीन-चार लोग आया करते, याना को कमरे से बाहर कर दिया जाता और फिर एक-एक कर आनिया के ज़िस्म को नोचा जाता । ईराक़ और सीरिया में अल्लाह के बन्दे अपने प्यारे नबी के हुक़्म का पालन करने के लिए यज़ीदी, शॉबेक, कुर्द और ईसाई स्त्रियों के साथ इसी तरह पेश आते हैं, उनका विश्वास है कि इस तरह वे अल्लाह में ग़ैर-इस्लामिक स्त्रियों का ईमान लाने में क़ामयाब होंगे । वे मानते हैं कि दुनिया भर की स्रियों का इस्लाम में यक़ीन होना बहुत ज़रूरी है और इसके लिए उनके साथ महीनों तक सामूहिक बलात्कार किया जाना जायज़ है । ईराक़ और सीरिया का यह किस्सा कोई हजार-दो हजार साल पुराना नहीं बल्कि ईसवीं सन् दो हजार चौदह का है । यह युग वैज्ञानिक समुदाय में हिग्स बोसॉन के लिए और संवेदनशील लोगों में मध्य एशियायी देशों में इस्लामिक विश्व के युद्ध के लिए चर्चित हो रहा है । ब्रह्माण्ड में नयी धरतियों की तलाश की जा रही है जबकि इस धरती की औरतों को सुकून का एक पल जीने के लिए कहीं कोई कोना नहीं मिल सका । 
मकान की ऊपरी मंज़िल के उस छोटे से कमरे में प्रतिदिन कई बार बलात्कार की दर्दनाक सूली पर चढ़ने-उतरने वाली आनिया का ज़िहादी नर्क में आज तेरहवाँ दिन है । अभी दोपहर नहीं हुयी थी कि तभी छह लोगों ने दरवाज़े पर दस्तक दी । चाबुक और बूट की ठोकरें खा-खा कर आनिया का पूरा ज़िस्म अधपके फोड़े सा हो चुका था ।  उसने घबराते हुये सांकल खोली और चुपचाप जाकर पलंग पर लेट गयी, गोया वह एक मांस का लोथड़ा भर हो जिसकी आत्मा को निचोड़ कर धूप में सूखने के लिए डाल दिया गया हो । मांस के लोथड़े ने पिछले कई दिन से स्नान करना बन्द कर दिया था किंतु उसकी यह युक्ति पूरी तरह बेकार साबित हुयी । और फिर दाढ़ी वालों ने जब उसे स्नान करने के लिए मज़बूर करना शुरू कर दिया तो आयना ने हण्टर खाये बिना ही स्नान करना पुनः प्रारम्भ कर दिया । आज का पहला मर्द महज़ सोलह साल का एक ज़िहादी था किंतु ज़िस्म को बुरी तरह नोचने-खसोटने वाला तीसरे नम्बर का ज़िहादी था एक सफ़ेद दाढ़ी वाला मर्द । हर मर्द की यह ख़ूबी होती है कि वह औरत के सामने आते ही अपने मर्द होने के सारे सबूत पेश करने लगता है, भले ही किसी औरत ने उन सबूतों की कभी कोई मांग न की हो । एक-एक कर सभी मर्द अपनी मर्दानगी के सारे सबूत आनिया के समक्ष पेश करते रहे जिन्हें आनिया की मज़बूर देह के साथ-साथ मज़बूर मन-मस्तिष्क भी पहाड़ सा ढोता रहा । आनिया अब हर पल मरने लगी थी हर पल जीने लगी थी ।
रक्का की मण्डी में उस दिन अधिक चहल-पहल नहीं थी फिर भी कुछ शौक़ीन लोग ख़रीद-फ़रोख़्त में लगे हुये थे । यह एक ज़िस्मानी मण्डी थी जिसमें यज़ीदी स्त्रियों को माल की तरह ख़रीदा-बेचा जा रहा था । तीन-चार घण्टे मण्डी में मटरगश्ती करने के बाद सत्ताइस साल के अबू-अली-शम को एकतालीस साल की आनिया ही अंततः पसन्द आयी । कुछ ही महीने पहले जब इस्लामिक ज़िहादियों ने आनिया को उसके घर से उठाया था तो चीखती आनिया ने अपनी तीन साल की बच्ची को सीने से भींच लिया था । ज़िहादियों ने बच्ची को अलग करने की बहुत कोशिश की पर चाबुक और बूट की ठोकरें खाती आनिया ने बच्ची को नहीं छोड़ा तो नहीं ही छोड़ा । एक ज़िहादी को उस पर रहम आ गयी और वह बच्ची सहित आनिया को ले चलने के लिए राजी हो गया । सात ख़ूंख़ार लोग जो कि अल्लाह के बनाये और प्यारे नबी के बताये रास्ते पर चलने का दावा किया करते थे, आनिया और उसकी बच्ची को घसीटते हुये लेकर चले गये । आनिया के शौहर की ख़ून में लथपथ लाश वहीं पड़ी रह गयी ।
       सीरिया और ईराक़ के इस्लामिक ज़िहादियों को जनाने ज़िस्म की बेहद ज़रूरत हुआ करती है, धरती पर वह माल होती है और ज़न्नत में वह हूर होती है । कोई ज़िहाद शायद ज़नाने ज़िस्म के बिना पूरा नहीं हो पाता । आनिया तो फिर भी एकतालीस साल की है, कई बच्चियाँ तो महज़ नौ साल से चौदह साल के बीच की भी हैं जिन्हें माल की तरह स्तेमाल किये जाने और मण्डी में बेचने का ज़िहादियों को स्वाभाविक इस्लामिक हक़ प्राप्त है ।
एक दिन इस्लामिक ज़िहादियों ने आनिया को बाइस साल के इस्लामिक ज़िहादी अबू सफ़ोउआन से निक़ाह के लिए मज़बूर किया । निक़ाह हुआ तो स्थान बदल गया किंतु ज़िन्दग़ी नहीं बदली । यह शादी मात्र बीस दिन तक चली, इस बीच आनिया के ज़िस्म को इस्लाम के नाम पर भरपूर नोचा-खसोटा गया फिर ज़िस्मानी भूख़ के कम होते ही आनिया और उसकी तीन साल की बच्ची को कुछ दिन इधर-उधर रखने के बाद दहूक से रक्का ले जाया गया जहाँ उसे सत्ताइस साल के ज़िहादी अबू अली शम को बेच दिया गया ।
पन्द्रह अगस्त दो हजार चौदह को जबकि पाकिस्तान में आज़ादी का ज़श्न मनाया जा रहा था उधर सुदूर मध्य एशिया में इस्लामिक ज़िहादियों ने सिंजर पर्वत के एक गाँव कोजो में प्रवेश किया । उन्होंने जिन दर्ज़नों ग़ैर इस्लामिक लोगों को क़त्ल कर दिया उनमें से एक आनिया का शौहर भी था और कोजो गाँव से जिन लगभग एक सौ यज़ीदी स्त्रियों को उठा लिया गया उनमें से एक स्त्री एकतालीस साल की आनिया भी थी । वे सब बीस वर्ष की युवतियों से लेकर बयालीस वर्ष तक की प्रौढ़ायें थीं । युवतियों को तो तुरंत बेच दिया गया जबकि प्रौढ़ाओं को बेचने के लिए ईराक़ और सीरिया के कई स्थानों पर ले जाया जाता रहा । अन्य स्त्रियों की तरह आनिया भी आठ महीने तक बारबार बेची और ख़रीदी जाती रही । फिर एक दिन कुछ तस्करों ने हमला किया तो वहाँ कैद सभी स्त्रियों में एक बार फिर जीने की उम्मीद जाग उठी ।
आनिया अब क़ुर्दिस्तान के एक राहत शिविर में है और कृतज्ञ है उन तस्करों की जिन्होंने आठ महीने तक इस्लामिक ज़िहादियों की यौनदासता के नर्क़ से उसे मुक्त किया । यह जिजीविषा ही थी कि तिल-तिल कर मरती आनिया के लिए हर पल एक नये जन्म की आशा लेकर आता था । इस्लामिक ज़िहादियों की यौन दासता के आठ महीनों की उस अनंत वेदना को अब वह भूल जाना चाहती है, इस बीच उसने असंख्य बार जन्म और मृत्यु के क्षणों को भोगा है । यह आज का ज़िन्दा इतिहास है जो शायद कभी इतिहास नहीं बन सकेगा ...आख़िर इसे लिखेगा कौन ...और ज़रूरत भी क्या है किसी को लिखने की ! दुनिया का ऐसा ही न जाने कितना कुरूप इतिहास कभी नहीं लिखा गया, जबकि यह एक ऐसा अलिखित दस्तावेज़ है जो मनुष्य की पशुता के वीभत्सतम स्वरूप को अपने अन्दर संजोये हुये है ।

(डच ज़र्नलिस्ट ब्रेण्डा स्टोटर की सूचनाओं पर आधारित)

बुधवार, 1 मार्च 2017

प्रधानमंत्री के फ़ोटो की जूते से पिटायी...




       दिल्ली के रामजस कॉलेज में 21-22 फ़रवरी को “विरोध की संस्कृति” पर एक बड़ी सम्भाषा होने वाली थी, देशभक्त उमर ख़ालिद के आमंत्रण के विरोध के कारण नहीं हुयी । किंतु बिहार में “विरोध की संस्कृति” पर एक डिमॉंस्ट्रेशन ने सम्भाषा की कमी को पूरा कर दिया जहाँ एक माननीय मंत्री जी ने माननीय प्रधानमंत्री को जूते मारने का आह्वान किया । भक्तों ने पहले से ही तैयारी कर ली थी, एक भक्त ने अनुशीलन करते हुये प्रधानमंत्री की फ़ोटो को जूते से जी भर पीटा, कैमरे की तरफ़ अपना चेहरा दिखा-दिखा कर पीटा, क़ानून को ठेंगा दिखाते हुये पीटा, पूरी ग़ुस्ताख़ी के साथ पीटा, बड़ी बहादुरी की भावभंगिमा के साथ पीटा ।

यह भारत के लोकतंत्र की यात्रा का एक दृश्य है । हम इसे नफ़रत की खेती की फ़सल नहीं कहेंगे बल्कि भारत का सांस्कृतिक और चारित्रिक विकास कहेंगे ।

यह एक लोकतांत्रिक आज़ादी है, यह अभिव्यक्ति की आज़ादी है, यह कुछ भी करने की आज़ादी है । अब उमर ख़ालिद, शेहला रशीद शोरा, अपराजिता राजा, कन्हैया, मणिशंकर, खड़गे... आदि आदि को प्रसन्न होना चाहिये कि उनकी मुराद पूरी हुयी... उन्हें आज़ादी प्राप्त हो गयी... बिना खड्ग बिना ढाल प्राप्त हो गयी... पूरे गांधीवादी तरीके से प्राप्त हो गयी... अहिंसा की ताक़त के भरोसे प्राप्त हो गयी ।

देश धन्य हुआ ! लोकतंत्र धन्य हुआ !! आज़ादी धन्य हुयी !!! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धन्य हुयी !!!!