मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मानव संव्यवहार विश्लेषण

    
     सिंहावलोकन वाले राहुल सिंह जी ने अपने ब्लॉग पर "व्यक्तित्व रहस्य" विषय पर एक रुचिकर आलेख लिखा है ...उनके पाठकों की टिप्पणियों से मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि वह लेख, विषय या भाषा के कारण कदाचित कुछ क्लिष्ट हो गया है .....अस्तु, राहुल जी की ही बात को सहज बोधगम्य बनाने की दृष्टि से शब्दान्तरित भर करने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ. मूल लेख को उनके ब्लॉग सिंहावलोकन पर देखा जा सकता है.  
     
    मानव व्यवहार का अध्ययन बहुत ही जटिल विषय है. हम अपने नित्य जीवन में विभिन्न व्यक्तित्व वाले लोगों से मिलते रहते हैं. कोई हमें प्रभावित करता है, कोई प्रसन्न, कोई रुष्ट, तो कोई उत्तेजित ......आदि. वस्तुतः ये सारी प्रतिक्रियाएं हमारे बौद्धिक स्तर एवं परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं. स्थिति विशेष में हमारी प्रतिक्रिया हमारे आगे का मार्ग निर्धारित करती है ...जीवन की सफलता-असफलता का सारा उत्तरदायित्व इसी मार्ग पर रहता है
     हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करने ...उसे विकसित करने वाले कई घटक होते हैं, यथा - वय, व्यक्ति का बौद्धिक स्तर, घर के अन्य लोगों का व्यवहार, समाज के लोगों का व्यवहार, परिस्थितियाँ, परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया, आर्थिक स्तर, शैक्षणिक स्तर, शारीरिक स्थिति,  शासन और समाज की व्यवस्थाएं ...आदि.....  
   जीवन व्यापार में कभी हमें असंतुलित व्यवहार वाले लोगों से भी जूझना पड़ता है. ऐसे लोगों के उपचार के लिए विशेष परामर्श की आवश्यकता होती है. यह देखा गया है कि परामर्श के द्वारा किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को विकसित ...संशोधित किया जा सकता है ...यद्यपि यह सदैव संभव नहीं हो पाता ...किन्तु हम सकारात्मक सम्भावनाओं की बात कर रहे हैं.
    १९५० के दशक में कनाडाई मूल के डॉक्टर एरिक बर्नी ने फ्रायड के अध्ययनों को और आगे बढाते हुए मानव संव्यवहार के विश्लेषण का एक तार्किक स्वरूप प्रस्तुत किया. जिसे ट्रांजैक्शनल एनालिसिस कहा गया . इसे ही संक्षेप में T .A . कहते हैं. 
   फ्रायेड ने मानव व्यक्तित्व के तीन स्तरों के बारे में बताया - Id , ego , और Super  ego . बर्नी ने इन्हें क्रमशः Child , Adult और Parent  नाम दिया. प्राचीन भारतीय चिंतकों ने इन्हें क्रमशः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण कहा है. 
   यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि भारतीय मनीषियों ने पश्चिमी चिंतकों की तरह मनोविज्ञान को पृथक विषय की तरह लेकर उसका अध्ययन प्रस्तुत नहीं किया है किन्तु उनके उपदेशों में मानव व्यवहार का सूक्ष्म विश्लेषण सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है. गीता और रामायण भी तो मानव व्यवहार का लेखा-जोखा ही प्रकट करते हैं. 
   पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दिए गए ये तीनो नाम वस्तुतः हमारी बौद्धिक स्थिति के तीन स्तर हैं. हर व्यक्ति में न्यूनाधिक रूप में इन तीनो स्थितियों का सम्मिश्रण पाया जाता है. इस सम्मिश्रण में एक संतुलन की अपेक्षा की जाती है ....यह संतुलन ही हमें और समाज को प्रशस्त पथ की ओर ले जाने में सहायक होता है. असंतुलन हानिकारक है क्योंकि उससे व्यक्ति की दिशा एकान्तिक या अतिवाद की ओर हो जाती है. नित्य प्रति के व्यवहार में यह अतिवाद बड़ी सरलता से अनुभव किया जा सकता है.  भारतीय चिंतकों द्वारा किया गया सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण विभाजन भी उल्वणता के आधार पर है ...एकान्त विभाजन नहीं. 
   विभिन्न परिस्थितियों में हमारे व्यक्तित्व के विभिन्न पक्ष हमारी बौद्धिक स्थिति ....और तदनुरूप हमारे संव्यवहार को प्रदर्शित करते हैं. यह प्रदर्शन दूसरों के लिए प्रिय या अप्रिय हो सकता है..... संरचनात्मक या विघटनात्मक हो सकता है. 
   हमारे संव्यवहार के विश्लेषण की आवश्यकता का जन्म वैचारिक अतिवाद को रोकने के लिए परामर्श देने की आवश्यकता के साथ होता है. हमारे नीति वचनों में ऐसे ही परामर्श सर्वसाधारण के लिए सर्वसुलभ कर दिए गए थे ताकि स्वेछा से लोग उन्हें अपने जीवन में उतार सकें. 
    फ्रायेड, एरिक बर्नी और प्राचीन भारतीय चिंतकों के तीनों संव्यावहारिक स्तरों को तुलनात्मक दृष्टि से देखना आवश्यक है :-


फ्रायेड           एरिक बर्नी                      भारतीय चिन्तक  

Id                 Child- emotion, creativity  सतोगुण- निश्छलता, समष्टिगतभाव, परोपकार, नवीनता ... 
Ego             Adult- logic, revolution, change  रजोगुण- महत्वाकांक्षा, आधिपत्य, स्वार्थ, शक्ति....
Super ego  Parent- value, conservation, experience तमोगुण- व्यष्टिगतभाव, स्वार्थ, परम्परा, जड़ता... 


    फ्रायेड की अपेक्षा बर्नी का वर्गीकरण अधिक बोधगम्य और प्रतीकात्मक है. मोटे तौर पर देखा जाय तो किसी भी व्यक्ति का जीवनव्यवहार अपनी वय के मुख्य तीन कालों में नया स्वरूप धारण करता है. किन्तु पूर्व का व्यवहार ....पूर्व की विवेक बुद्धि कभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती....बनी ही रहती है. एक पूर्ण प्रौढ़ व्यक्ति में बुद्धि के ये तीनो स्तर आवश्यकतानुसार समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं. हमारा व्यवहार कभी तो बच्चों की तरह निश्छल, भावुकतापूर्ण, उत्सुकता लिए हुए, नवीनता की ओर उन्मुख, चंचल, कुछ रचनात्मक करने की चाहत लिए हुए, समष्टिगत चिंतनयुक्त ......हो सकता है. दूसरे पड़ाव पर हमारा व्यवहार युवकों की तरह तर्कपूर्ण, क्रांतिकारी, परिवर्तन की ओर उन्मुख, स्वार्थपूर्ण, शक्तिप्रधान, व्यष्टिगत चिंतनयुक्त.... हो सकता है. तीसरे पड़ाव पर हमारा व्यवहार परम्परावादी, निर्णयप्रधान, अनुभवजन्य, संरक्षणात्मक, बचावपूर्ण, समझौतावादी, व्यक्तिपरक ...हो सकता है. 
    हमारा सामाजिक व्यवहार ...हमारी प्रतिक्रियाएं ....हमारा व्यक्तित्व ....सभी कुछ बुद्धि के इन्हीं तीन स्तरों के सम्मिश्रण से प्रभावित होते हैं. एक मनोरोग विज्ञानी किसी प्रौढ़ व्यक्ति के व्यक्तित्व में उत्पन्न हुए व्यक्तित्व क्षरण या असामान्य व्यवहार विचलन के कारणों को खोजने के लिए उसके संव्यवहार का विश्लेषण करता है ताकि गड़बड़ी वाले स्तर को सुधारने के लिए उसे उचित परामर्श दिया जा सके.           







  

4 टिप्‍पणियां:

  1. धन्‍यवाद कौशलेन्‍द्र जी,
    कुछ बिन्‍दु काफी और बेहतर स्‍पष्‍ट हो रहे हैं आपके इस लेखन से किन्‍तु असहमति सहित कहना है कि फ्रायड के Id में डॉ. एरिक बर्न का Child, emotion, creativity तो है लेकिन उसमें भारतीय चिन्तकों के सतोगुण का (निश्छलता, नवीनता है) समष्टिगत भाव, परोपकार कतई नहीं है, इसलिए यह और अन्‍य भी संगति नहीं बैठ पा रही है.
    अगर भारतीय परम्‍परा में घटाने का प्रयास किया जाए तो शायद कुछ हद तक Super ego/Parent मर्यादा पुरुषोत्‍तम राम हैं या विदुर हैं, Ego/Adult गीता के योगेश्‍वर कृष्‍ण या चाणक्‍य हैं और Id/Child कृष्‍ण की ही बाल-लीलाएं हैं. वैसे हमारी परम्‍परा में भी कृष्‍ण को ही सोलह कलाओं से पूर्ण पुरुष कहा गया है, यानि इन तीनों का संतुलित व्‍यवहार.

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  2. main aapaka aur aadarniy rahul singh ji ka dhanywad karata hun.sath hi anurodh ki is wishay par bhag 2 men kucha aur anshon ko spashta karane ka kasht karen taki wyahar anurup wyahar karane men koi chuk na ho jisase kisi ka swabhiman aahat ho.

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  3. wishay ko sahaj saral banane ke prayas ka dhanwad
    kripaya kuch anya binduon ko spasht karane ke liye bhag do post karane ka anurodha karata hun jisase wyawahar anurup uchit wyawahar ho paye .
    aadaraniya rahul singh ji ke post ko wistar dene ka dhanywad

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.