शनिवार, 14 जनवरी 2012

संक्रांति को व्याकुल मन-मकर ...

देवेन्द्र जी के आग्रह पर मकर संक्रांति पर आज एक पुरानी रचना  ... 
स्थान था गुलाबी नगर जयपुर...और तारीख थी 14 जनवरी, 1991..


वे व्यंग्य चाहते थे ...पर वह फिर कभी, अभी तो उनके आग्रह का सम्मान कर रहा हूँ ......

शहर 
छतों पर है 
और पतंगें 
आसमान में.
कामनाओं के सूर्य 
व्याकुल हो उठे हैं ....संक्रांति को ...
नाना रूप-रंग की पतंगों पर बैठ
उड़ चले हैं. 
संक्रांति को व्याकुल 
मन-मकर की अभिलाषा है 
कि बंध जाएँ 
आकाश की सारी पतंगें  
उसी की डोर से...
और तोड़ डाले वह 
सारी सीमाएं ...सारे बंधन ...
उठ जाए आकाश में 
ऊंचा....
बहुत ऊंचा .....
सबसे ऊंचा.........
सोचता है,
दूसरों की पतंगों को काट 
कैसे बढ़ती जाय मेरी ही पतंग 
आगे ..और आगे .....
बादलों से भी परे ....
और 
कैसे कट कर आ गिरें 
आकाश में उड़ती सारी पतंगें 
मेरे ही आँगन में.
सोच 
सीमाबद्ध हो गयी है
कामना 
असीमित हो गयी है 
दांवपेंच शुरू हो चुके हैं.
चारो ओर शोर हो रहा है ....
विजय 
और हर्षातिरेक का उन्माद छा गया है.
लोग 
चीख रहे हैं, 
कांटे बंधे.. ऊंचे बांस उठाये 
भागे चले जा रहे हैं.
शायद 
किसी ने किसी की पतंग काट दी है.
कामनाओं के युद्ध में 
किसी का विश्वास खंडित हुआ है 
किसी का 
आकाश में और भी गहरे उतर गया है.
पराजित कामना को 
अभी भी परित्राण नहीं, 
खंडित होकर भी
वह उलझ गयी है 
किसी के बांस के काँटों में.
कामनाओं के क्रांतियुद्ध में 
अपना बांस जितना ऊंचा....
अपने कांटे जितने अधिक... 
उलझनें उतनी ही सुलभ ....... 
लूटने में उतनी ही सुविधा.
लुटेरा 
विजेता बनकर लौट रहा है 
........................................
और........
इस संक्रांति युद्ध में 
मैंने 
अपनी डोर खीचनी शुरू कर दी है 
मेरी कामनाएं 
धरातल पर उतरने लगी हैं 
आधारहीन आकाश से 
यथार्थ के धरातल पर .....