सोमवार, 26 जनवरी 2015

पोस्ट और विमर्श ...


नयी खोज पर ख़ुश नहीं हूँ मैं –

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति को नियंत्रित करने की विधि खोज निकाली है । ऐसी खोजें प्रकृति के सिद्धांतों के विपरीत होने से स्वागत योग्य नहीं हैं । ऐसी खोज प्रकृति के विरुद्ध मनुष्य की दादागीरी है जिसके अंतिम परिणाम लोक कल्याणकारी नहीं होंगे, यह निश्चित है ।

यह फ़ेसबुक पर की गयी एक लघुतम पोस्ट थी जिसपर हुये विमर्श का अविकल विवरण प्रस्तुत है -

 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – मुझे नहीं लगता कि कोई वैज्ञानिक खोज ईश्वर के Divine plan से बाहर हो सकती है। ऐसे में प्रकृति विरुद्ध भी नहीं ।
 कौशलेन्द्रम – तब तो पाप और पुण्य भी डिवाइन प्लान के अंतर्गत ही होंगे ।
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – जी ! पाप और पुण्य relative हैं ।
 कौशलेन्द्रम – जोशी जी ! सत्य तो यह है कि कि मनुष्य की कल्पना में जो कुछ भी है वह सब ईश्वरीय विधान से परे नहीं है । ईश्वरीय विधान से परे कुछ हो ही नहीं सकता । किंतु तब हमें यह भी विचार करना है कि कृति और विकृति, पाप और पुण्य, शांति और परमाणु बम ... यह सब भी ईश्वरीय विधान के ही अंतर्गत है । बन्धु ! प्रश्न यह है कि हमारा विवेक किस पक्ष में है ? 
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – हमारा विवेक  विकास के पक्ष में है । पूर्व स्थापित नियमों के लिये सृजन नहीं रुकना चाहिये ।
 कौशलेन्द्रम –  “पाप और पुण्य relative हैं” के उत्तर में  - जी ! सापेक्ष हैं  ... मानता हूँ । यह सापेक्षता निम्नतर और अधिकतम के बेच झूलती है । दोनो शीर्ष बिन्दु विवेक की अपेक्षा करते हैं और इसी से निर्धारित होती है हमारे कार्यों की रूपरेखा भी । सृजन की रूपरेखा क्या होनी चाहिये .... इस पर मत भिन्नता है विद्वानों में ।
पूर्व स्थापित नियम यदि सनातन सत्य हैं तो .... ?
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – सृजन की सीमा मुझे पोप की याद दिलाती है ।
 कौशलेन्द्रम – पोप की याद ? कृपया खुलासा किया जाय .... हम पोपों की यादों की कथा से अनभिज्ञ हैं ।  
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – खगोलविदों को फांसी के तख्त तक ले जाना ।
 कौशलेन्द्रम – ओह ! यह उस ज़माने की बात है जब योरोप में धर्म अपनी जड़ता के शीर्ष पर था । हम उस प्रकार की जड़ता के पक्ष में नहीं हैं किंतु सृजन के लोककल्याणकारी होने के पक्ष में ज़रूर हैं ।  सृजन की सर्वोच्च स्थिति विघटन के द्वार खोलती है । एटम बम हमारे लिये जितना लाभकारी है उससे कहीं अधिक हानिकारक है । एटॉमिक रिएक्टर्स से होने वाले रेडिएशन के ख़तरों की उपेक्षा नहीं की जा सकती ।
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – फिर तो संसार का सबसे दुष्ट व्यक्ति वह रहा होगा जिसने अग्नि का सबसे पहले प्रयोग किया, मानव इतिहास में हमारे गरीबों की झोपड़ियाँ उसी अग्नि की भेंट चढ़ती रही हैं ...
            विकास के रास्ते में ये टूल हैं जो हमारे हाथ आ रहे हैं, अब इनका उपयोग कैसे करना है, वह सही या गलत है, न कि टूल? किसी को पेचकस दिया जाय और वह उससे आँख फोड़ ले तो पेचकस का दोष खोजना कहाँ तक सही है .... ?
 कौशलेन्द्रम – एण्टीबायटिक्स भी कभी सृजन की सीमा में हुआ करते थे । आज उसी के कारण माइक्रो ऑर्गेनिज़्म के जो न्यू स्ट्रेंस उत्पन्न हुये हैं उन्होंने चिकित्सा जगत के सामने भीषण संकट खड़ा कर दिया है । हम ऐसी खोजों को सात्विक उपलब्धि नहीं कह सकते जो मनुष्य के अस्तित्व के लिये संकट उत्पन्न कर दे ।
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – नैसर्गिक तो यह भी नहीं था कि बड़ी आबादी को केवल इसलिये मरने के लिये छोड़ दिया जाय कि प्रयोग हो रहा एण्टीबायटिक भविष्य में स्ट्रेन पैदा करेगा ...
 कौशलेन्द्रम – निः सन्देह ! टूल को दोष नहीं दिया जा सकता । उसका उपयोगकर्ता ही दोषी है । यहाँ हमारा आशय इतना ही है कि हमें संकट की सम्भावनाओं पर विचार करने की शक्ति ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी है, जिसका युक्तियुक्त उपयोग होना चाहिये ।
 ...जी बिल्कुल नैसर्गिक नहीं था । विज्ञान को सत्य के समीप होना चाहिये  ...जो उपलब्धि / खोज सत्य के समीप नहीं है उससे लोककल्याणकारी परिणामों की कैसे अपेक्षा की जा सकती है ? एंटीबायटिक्स के अन्य विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिये था ... जैसा कि अब विचार किया जाना प्रारम्भ हुआ है । अंततः विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी विवश हो कर विकल्प की बात कहनी पड़ रही है न !
 सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी – सभ्यता ऐसे ही आगे बढ़ती होगी, रातो रात किसी को ब्रह्म ज्ञान हासिल होता हो, ऐसा देखा नहीं । हमारे पास था बहुत कुछ, हम खो बैठे हैं, कुछ बहुत विद्वान लोग उसे फिर से उठाने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ उपलब्धियाँ मिली भी हैं, लेकिन दो समानांतर पथ साथ-साथ चलते रहेंगे । एक वह जो सामान्य विकास है, जिसे पश्चिम अपने तरीके से आगे बढ़ा रहा है, दूसरा वह जो शास्त्रों में वर्णित है, लेकिन मिसिंग लिंक्स के कारण हम उनका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं ....
 कौशलेन्द्रम -  जगत का सिद्धांत ही दो परस्पर विरोधी शक्तियों /  विचारों पर आधारित है । सभ्यता में उत्थान-पतन दोनो ही होते रहते हैं । मनुष्य का स्वभाव विगत से सीखने का कम और प्रयोग में अधिक होता है । सभ्यताओं के उत्थान-पतन का यही कारण है । पुरानी पीढ़ी के अनुभवों से नयी पीढ़ियाँ उतना नहीं सीख पातीं ... जितनी कि अपेक्षा होती है । वे प्रयोग करती हैं .... और प्रयोगों में फ़ाल्स निगेटिव और फ़ाल्स पॉज़िटिव परिणाम आने की सम्भावनायें होती हैं । 
            जी ! बिल्कुल ... रातोरात किसी को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता ..... यह सीखने की प्रक्रिया का उच्चतम परिणाम है । हमारे देश में प्राचीन विद्वानों ने ज्ञान और विज्ञान के सूक्ष्म अंतर को समझने का प्रयास किया था । सम्भावनाओं की कोटि को जिसने जितनी अच्छी तरह समझ लिया उसने उतना ही उच्च ज्ञान प्राप्त किया । ....और यह भी कि इस ज्ञान का लोककल्याणकारी कार्यों में कितना और कैसा उपयोग किया जाना चाहिये ।


1 टिप्पणी:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (27-01-2015) को "जिंदगी के धूप में या छाँह में" चर्चा मंच 1871 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.