गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

दुनिया को ठगती ये परिभाषायें !



नैतिक पतन के इस युग में शब्द और परिभाषायें हमें दिग्भ्रमित करती हैं । भारतीय समाज में यह खेल बड़ी निर्लज्जतापूर्वक खेला जा रहा है । “दलित” की परिभाषा के अनुसार मायावती किसी भी दृष्टि से दलित की श्रेणी में नहीं आ सकतीं । हाँ ! मैं अवश्य “अतिदलित” की परिभाषा के कहीं अधिक समीप हूँ । 

तब मैं छोटा था जब लोगों को यह नारा लगाते हुये सुना करता था – “तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” नारा लगाने वालों में जुलूस के आगे लोग क्रोध और उत्तेजनामें हुआ करते थे जबकि पीछे के लोग ख़ुश-ख़ुश नज़र आते थे । तब मैं इसका अर्थ नहीं जानता था । एक दिन कुछ लोगों को आपस में बात करते हुये सुना तब पता चला कि तिलक का सम्बन्ध ब्राह्मण से, तराजू का वैश्य से और तलवार का क्षत्रिय से था । फिर जब मैं कक्षा नौ में आया तो एक दिन एक जाति विशेष के सहपाठियों ने मुझे बहुत अपमानित और प्रताड़ित किया । वे मुझे पंडित-पंडित कह कर अश्लील गालियाँ दे रहे थे और बार-बार पीटने के लिये उद्यत हो रहे थे । एक दिन मैं उनके मोहल्ले से निकला तो एक लड़के ने मुझे मारा और मेरे ऊपर पेशाब कर दी । यह सब मुझे भयभीत करने वाला था । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा है ?

धीरे-धीरे मैं सब समझता गया, किसी भी किशोर के मन में भावनात्मक ध्रुवीकरण के लिये यह पर्याप्त था । अच्छी बात यह थी कि मैं कभी प्रतिहिंसक नहीं हुआ, शायद मैं बहुत अधिक डर गया था । युवा होने पर सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर होने वाली इन घटनाओं का विश्लेषण करना मेरे लिये आवश्यक हो गया था । लोग कहते थे कि कभी ब्राह्मण भी उन लोगों के साथ इससे भी बुरा व्यवहार किया करते थे । उस समय छुटभैये नेता और कुछ बुल्ली लोग सवर्णों से अपने पूर्वजों के प्रति किये गये दुर्व्यवहारों का प्रतिशोध लेने के लिये उतारू हो रहे थे । संयोग से ज़ल्दी ही यह सब नेपथ्य में जाकर ओझल हो गया । क्यों और कैसे .....पता नहीं । वास्तव में समाप्त कुछ भी नहीं हुआ था केवल प्रतिशोध के तरीके बदल गये थे ।

जिस वर्गभेद को समाप्त करने का स्वप्न देखा गया था वह धूमिल हो गया । वर्गभेद समाप्त करने का तरीका अव्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के विरुद्ध होता चला गया । यद्यपि भारतीय समाज से शारीरिक अस्पृष्यता समाप्त हो चुकी है किंतु आंतरिक अस्पृष्यता समाप्त होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है ।


अब तक मैं मायावती के बुल्ली स्वभाव के कई किस्से पढ़ और सुन चुका था । फिर एक दिन खुलासा हुआ कि उनके पास हीरों के गहनों का अम्बार है । इस बीच सवर्ण प्रतिभाओं के आरक्षण की भेंट चढ़ते रहने की व्यवस्था ने वर्गभेद को कम करने के स्थान पर और भी बढ़ाने का काम किया । आज भी सामाजिक समरसता के लिये कोई निर्दुष्ट नीति नहीं बनायी जा सकी है । ये सब भारतीय समाज में आंतरिक अस्पृष्यता बढ़ाने वाले कारण हैं ।  कोई भी कानून इस प्रकार की अस्पृष्यता को समाप्त नहीं कर सकता । इसके लिये तो समाज के लोगों को ही मिलजुल कर एक सामंजस्यपूर्ण स्थिति का निर्माण करना होगा । 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सही, यह भेदभाव प्रतिभाओं को समाप्त किये दे रहा है.
    सार्थक आलेख.

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.