रविवार, 13 सितंबर 2026

मित्र-शत्रु बोध

न मित्र, न शत्रु केवल अवसर की ताक।

कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं, हर कोई हर किसी का मित्र है, हर कोई हर किसी का शत्रु है। महत्वपूर्ण है अवसर और उसके नेपथ्य में पल रही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा। यही धरातलीय सत्य है।

अमेरिका ही नहीं, कोई भी देश, न किसी का मित्र है, न शत्रु। हर कोई अपने वर्चस्व के लिए अवसर की ताक में घात लगाये बैठा है। हर कोई ओट्टोमन साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य की तरह वैश्विक साम्राज्य बनाना चाहता है। 

अरब चाहता है कि हूतियों पर अंकुश लगाने में अमेरिका सहयोग करे पर ट्रंप ऐसा नहीं चाहता।                    अमेरिका और इज्रेल के सपने बहुत बड़े हैं। इस्लाम विभिन्न देशों में घुस कर फैला हुआ अपने आप में एक "साम्राज्य" है। घात-प्रतिघात चल रहे हैं। कोई अस्तित्व छीन रहा है, कोई अस्तित्व बचा रहा है।   

इस सबमें भारत कहाँ है??? 

भारत और भारत की सरकार जातीय और धार्मिक स्वयंभू ठेकेदारों के हाथों में खेल कर ही आत्ममुग्ध है। हम तो ठहरे व्यापारी, विश्वगुरु बनने के सपने बेचते रहे, 

...जबकि सचमुच ऐसा कोई सपना कभी था ही नहीं।

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