रविवार, 13 सितंबर 2026

कृत्रिम बौद्धिकता और जातीय संघर्ष

कृत्रिम बौद्धिकता कितनी बौद्धिक?

एलन मस्क और सैम आल्टमैन ही नहीं, एआई शोधकर्ता जैकब काॅक्सन और एआई चीफ़ डारियो अमोदेई भी एआई की उल्लेखनीय सफलता के बढ़ते परिणामों के प्रति सशंकित हैं। अब यह शिक्षित युवकों के स्वावलम्बन को छीनने तक ही सीमित नहीं है, अपितु उससे कहीं बहुत आगे बढ़कर मानव सभ्यता के एक बार फिर प्रलयलीन हो जाने की आशंकाओं में परिवर्तित होता जा रहा है। 

हाँ! यह हो सकता है, जब महापंडित रावण अविवेकी हो सकता है तो एआई क्यों नहीं! एआई पर काम करते समय वैज्ञानिकों ने बौद्धिकता और विवेकशीलता में तालमेल का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में कृत्रिम बौद्धिकता के आगे विवेकशीलता को कोई भाव ही नहीं दिया गया। अब यही चूक, या कहिये मदांधता भारी पड़ रही है। 

अब स्थिति यह है कि हम बड़ी द्रुति गति से मानव सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समाप्त करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

जातीय संघर्ष की भेंट चढ़ता भारत!

जातीय गालियाँ, घृणा और असहिष्णुता की पराकाष्ठा की भारत में बाढ़ आई हुई है। यही सब देखने के लिए उड़न खटोले पर आरुढ़ हवा में तैरता "मोगैम्बो ख़ुश ही नहीं, बहुत ख़ुश" हो रहा है।

नैतिकता और नैष्ठिकता के पराभव का लक्ष्य ही आसुरी स्वप्न है, और इसके लिए आवश्यक है अराजकता को हर तरह से प्रश्रय देना। वही हो रहा है। दूर-दूर तक कहीं कोई विश्वामित्र और संदीपन दिखाई नहीं देता, कोई राम और कृष्ण भी नहीं दिखाई देते, राक्षसी शक्तियाँ प्रचंड होती जा रही हैं, और मीलाॅर्ड मौन के दीर्घकालीन हाइबरनेशन में चले गये हैं। अब जो करना है वह गिलहरियों को ही करना होगा।

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