रविवार, 8 नवंबर 2026

संघर्ष का अधिकार

निशा भगत की समाजोद्वेलित आत्महत्या आज के भारतीय समाज के अधोपतन को प्रतिबिंबित करता है, राजनीतिक महत्वाकांक्षायें, एक-दूसरे का उपयोग करने की होड़, सामाजिक प्रतिबद्धतायें, १९४७ से अब तक की जनचेतना यात्रा की स्थिति.... बहुत कुछ। निशा की थानेदार से हुई लाइव चर्चा के साथ-साथ संघ और भाजपा के विश्वासघात की ओर किया गया संकेत भी गंभीर है। निशा भगत को दूर से जितना जान सका वह नकारात्मक छवि तो नहीं ही बनाता है। सरना समाज की चिंता और धर्मांतरण का विरोध, निशा की एक सनातनी छवि प्रस्तुत करता है। कुल मिलाकर निशा भगत का इस तरह जाना हमारे पूरे तंत्र की विफलता और नकारात्मकता है। 

हमने बिहार के युवा तिवारी की पुलिस द्वारा घेरकर हत्या का दृश्य देखा, और अब झारखंड की निशा भगत की आत्महत्या को भी देखा। हम हत्यायें-आत्महत्यायें देखते हुए बड़े हो रहे हैं। किशोरों के मन में एक नकारात्मकता अपना स्थान बनाती जा रही है। यह भयानक स्थिति है। हम किस कोण से इसे विकास स्वीकार करें!

निशा भगत आत्महत्या से पहले मौन नहीं हुई, अपितु और भी मुखर हुई, रोते हुये थानेदार से अपनी पीड़ा व्यक्त की और फिर फंदे से झूल गई। यह हताशा में जीवन से पलायन और प्रतिशोध का मिश्रण था। उसे मालुम था, उसकी आत्महत्या पर भी राजनीति होगी, उसने इसे अवसर भी दिया... लाखों प्रश्नों के साथ। किंतु... प्रश्नों की चिंता किसे है! हम पूरी निर्लज्जता के साथ अपने ही लोगों के शवों पर चढ़ते हुये सत्ता तक पहुँचने की परंपरा स्थापित कर चुके हैं। 

सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरीके से निशा भगत की आत्महत्या के विश्लेषण किए जा रहे हैं, कुछ सही, कुछ गलत और कुछ बहुत गलत।  सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमें अपने समाज, देश और संस्कृति की बात करने का भी अधिकार नहीं?

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