गुरुवार, 5 नवंबर 2015

भारत के अस्तित्व के लिये आवश्यक है सहिष्णुता और भीरुता के अंतर को समझना

 इस्लामिक देशों में सदियों से यही परम्परा चलती आयी है । 

हम अपने अतीत के गौरव की स्मृति में या तो घोरआत्ममुग्धता में लीन हैं या फिर  घोरहीनता से ग्रस्त हैं । किसी देश, समाज और और उसकी संस्कृति के लिये दोनो ही अतिवादी दृष्टिकोण घातक हैं । हमें भारत के मध्यकालीन इतिहास को एक बार पुनः गम्भीरता से देखने की आवश्यकता है । भारत बारम्बार विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा लूटा, रौंदा और शासित किया जाता रहा, क्यों ?  हम किस महान भारत की बात करते हैं ? हम अपने अतीत की किस गौरवशाली परम्परा पर गर्व करते हैं ? क्या भविष्य में भी हम यूँ ही विदेशियों द्वारा बारम्बार रौंदे और कुचले जाते रहेंगे ? हमारी किन दुर्बलताओं के कारण विदेशी आततायी हमें अपना दास बनाते रहे हैं ? हमारी किन दुर्बलताओं के कारण विशाल आर्यावर्त बारम्बार खण्डित और मर्दित होता रहा है ? आज हम हिंदूकुश और कैलाशपर्वत से सिमटते-सिमटते, गांधार(अफ़गानिस्तान), सप्तसिंधु(पाकिस्तान), पूर्वी बंगाल(बांग्लादेश), पश्चिमी कश्मीर और मानसरोवर को गंवाते हुये खण्डित-मर्दित भारत में दुबक कर बैठे हुये हैं । हम चीन से असुरक्षित हैं । इस्लामिक विस्तारवाद के शिकार हो रहे हैं और भारत के लोग भारत में ही शरणार्थी बन कर रहने के लिये बाध्य हो रहे हैं ।
भारत न केवल अपने आसपास के पहलव-शक-हूण-मंगोल-उज़्बेक आदि पड़ोसी आक्रमणकारियों और लुटेरों से बारम्बार पराजित और शासित होता रहा बल्कि सुदूर यूनान, स्पेन, पुर्तगाल, फ़्रांस, डच, ब्रिटेन आदि देशों द्वारा भी रौंदा और कुचला जाता रहा । क्या भारत स्वाभिमानशून्य, आत्मबलशून्य और शक्तिहीन लोगों का एक दुर्बल देश है ? क्या हम विदेशी आक्रमणकारियों दारा भारत की स्त्रियों-लड़कियों के साथ क्रूरतापूर्वक किये जाते रहे बलात्कारों से उत्पन्न निर्बलसंतति के कुचले हुये उत्तराधिकारी हैं ? हम अपनी श्रेष्ठतम भाषा संस्कृत से दूर हो गये, वैदिक आचरणों से दूर हो गये, निर्दुष्ट शोधों से दूर हो गये, अपनी उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान से दूर हो गये, हम अपने स्व-भाव और संस्कृति से दूर हो गये और अब हम एक अंधकूप की ओर निरंतर अग्रसर होते जा रहे हैं ।
हमारे रक्त में विदेशी और विधर्मी आततायियों के रक्त का मिश्रण हो गया है । हम अपनी पूज्यकन्यायों और माताओं की रक्षा करने में असमर्थ होते रहे हैं । हम अपनी मातृशक्तियों को नारकीय पीड़ायें भोगते हुये मरते देखते रहे हैं । हम अपनी शक्तिस्वरूपा कन्याओं और माताओं को बुरी तरह अपमानित होने से नहीं बचा सके । क्या हम घोरतम पीड़ा के क्षणों में अपनी पूज्य शक्तियों द्वारा दिये गये श्राप का दण्ड भोग रहे हैं ?
  
यह नंदराजवंश से भी पहले की बात है जब मध्य-पूर्व भारत में हारण्यक और शिशुनाग राजवंशों (684-424ईसापूर्व) का राज्य हुआ करता था । तब ईसवी सन् 538 वर्षपूर्व भारत के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में फ़ारस से आये एकीमेनिड वंश के लोगों ने अपना शासन स्थापित किया । भारत पर यह पहली विदेशी हुक़ूमत थी । बाद में इस्लामिक विस्फोट के साथ अरब के उम्मैद ख़लीफ़ों ने 711-750 ईसवी तक इस्लामिकविस्तार अभियान में भारत की धरती को रौंदा । यह वह काल था जब अरब के लोग तलवार और बलात्कार के साथ पूरी दुनिया में इस्लाम की हुक़ूमत स्थापित करने में लगे हुये थे । ईसवी सन् 712 में अरब के इस्लामिक आतंकी मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध में देवल के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा, लूटमार की, बलात्कार किये, हत्यायें की और लाखों की संख्या में लोगों का ख़तना करवाया, हज़ारों भारतीयों को दास-दासी बनाकर इस्लामिक देशों में बेंचा । स्त्रियों और किशोरवय लड़कों को यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिये और पुरुषों को श्रमसंसाधन के लिये दास-दासी बनाकर बेचा । बौद्ध मंदिरों में छिपी 700 स्त्रियों को लूटकर इस्लामिक देशों में बेचने के लिये दलालों को सौंप दिया । इस्लाम का संदेश लेकर आये मुहम्मद बिन कासिम ने जिन 60 हज़ार स्त्री-पुरुषों को दास बनाया उनमें से 30 युवा स्त्रियाँ राजपरिवारों की थीं जिन्हें इस्लामिक देशों में कनीज़ बना कर तोहफ़े के रूप में पेश किया गया ।

अरबों दारा 712-13 में सिंध में आक्रमण के पश्चात् चलाये गये हिंसक अभियान के मुख्य उद्देश्य थे – भारतीयों का, ज़बरन खतना करके या उनकी स्त्रियों की इज़्ज़त लूटने की धमकी देकर धर्मांतरण करना, बलात्कार करना, मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ना, लूटमार करना, दास-दासियों के इस्लामिक बाज़ारों के लिये भारतीय स्त्री-पुरुषों को माल की तरह उपलब्ध करवाना और दहशत फैलाना । सन् 712-13 के अरब आक्रमणों में लाखों भारतीय स्त्री-पुरुषों को दास-दासी बनाया गया और लाखों की हत्या की गयी । यह कैसा इस्लामिक संदेश था ?

ईसवी सन् 1001 में महमूद गज़नवी ने काबुल पर आक्रमण किया और युद्ध में वहाँ के राजा जयपाल को बंदी बना कर उन्हें क्रूरतम यातनायें दीं । राजपरिवार के सभी स्त्री-पुरुष बंदी बना लिये गये और उन्हें गज़नी से दूर ख़ुरासान की एक दासमण्डी “मकीमन-ए-बाज़ार” में ले जाकर बोली लगाकर नीलाम कर दिया गया । राजा जयपाल को स्थानीय दलाल ने 80 दीनार में बोली लगाकर नीलाम किया । राजपरिवार के लोगों को एक विशेष रणनीति के अनुसार बारम्बार उनके नये मालिकों द्वारा खुले बाज़ार में बेचा जाता था । इस्लाम का यह कैसा आचरण है ?

ईसवी सन् 1001 में गज़नी के महमूद ने भारत में अपना लूट अभियान प्रारम्भ किया । उसने एक-दो या चार-पाँच बार नहीं बल्कि 17 बार भारत के भीतर घुस कर भारत को निर्भय होकर रौंदा । भारत के लोग महमूद गज़नवी का प्रतिकार करना तो दूर उसके अत्याचारों से अपनी रक्षा तक नहीं कर सके । महमूद ने अपने 17 युद्धों में लगभग 5 लाख भारतीय स्त्री-पुरुषों को बंदी बनाया और उन्हें दास बनाकर बेचा । वह हर बार आता, भारतीयों को दास  बना कर ले जाता । भारत की ख़ूबसूरत स्त्रियाँ और किशोरवय लड़कियाँ रोती-बिलखतीं, अपमान सहतीं इस्लामिक देशों के बाज़ारों में बिकने के लिये हाँक कर पशुओं की तरह ले जायी जाती रहीं और भारतीय इन घटनाओं को अपनी संवेदनहीन आँखों से देख-देख कर अभ्यस्त और पत्थर होते रहे । थानेश्वर पर महमूद गज़नवी ने जब अंतिम आक्रमण किया तब उसके एक-एक सैनिक के पास लूटकर बनाये गये कई दास और लड़कियाँ थीं । 1019 में जब वह वापस गज़नी गया तो उसके खेमे में 53 हज़ार बंदी थे जिन्हें इस्लामिक देशों में 2 से 10 दिरहम में बेचा गया । राजा दाहिर की राजकुमारी को यौनदासी बनाकर बाज़ार में बेच दिया गया । स्त्रियों के साथ ऐसा आचरण यदि किसी धर्म का संदेश है तो ऐसे धर्म को शीघ्र से शीघ्र समाप्त हो जाना चाहिये ।
  
आज भी मध्य एशिया की आतंकवादी गतिविधियों के अनुयायी धर्म के नाम पर पूरे विश्व में मानवता को कलंकित कर रहे हैं । गज़नी और ख़ुरासान के ग़ुलाम-बाज़ारों की पुनरावृत्ती आज सीरिया और ईराक़ के बाज़ारों में खुले आम हो रही है । यज़ीदी, शाबैक, कुर्द और क्रिश्चियन लड़कियों से सामूहिक बलात्कार के बाद उन्हें मोसुल और रक्का के ग़ुलाम-बाज़ारों में बेचा जा रहा है किंतु मंगल ग्रह पर सभ्यता की तलाश करने वाली सभ्य दुनिया की आँखों से एक बूँद आँसू तक नहीं निकलता ।   
 

सीरिया में यदि कोई लड़की यज़ीदी, कुर्द, शाबैक या क्रिश्चियन है तो उसके साथ सामूहिक बलात्कार होना निश्चित है 

भारत की संसद को कलंकित करने वाला असदुद्दीन ओवेसी नामक एक सांसद आज पश्चिम बंगाल को इस्लामी सूबा बनाने के अपने स्वप्न के लिये मुस्लिमों का आह्वान कर रहा है । 712 में मुहम्मद बिन कासिम के पापाचार को 2015 में ढोने वाला ओवेसी बचे-खुचे भारत को एक और नये बांगलादेश का दंश देना चाहता है । और भारत इन दंशों के प्रति अद्भुतरूप से सहिष्णु और सहिष्णु होता जा रहा है । किंतु आज हम यह स्वीकार करना चाहते हैं कि वास्तव में हम सहिष्णु नहीं बल्कि अतिभीरु और अतिदलित हैं । भारत के स्वाभिमानशून्य लोगो ! तुम कब अपने स्वाभिमान को जाग्रत करोगे ? 

कृपया इन संदर्भ ग्रंथों का भी अवलोकन करने की कृपा करें ।
The Arab conquest of Sind –मोहम्मद हबीब
The life and times of Mahmud of Ghazni  – एम.नज़ीम
तारीख़–ए–अल्फ़ी    –मौलाना अहमद
Growth of Muslim population in Medieval India – Lai
Muslim slave System in Medieval India    –K. S. Lal  


   यह लड़की नहीं, एक वस्तु है क्योंकि यह मुसलमान नहीं है  




मोसुल और रक्का के यौनदासी बाज़ार में बेचने के लिये ले जायी जातीं 
ग़ैरमुस्लिम स्त्रियाँ (वस्तु) । यह 2012 से आज तक की स्थिति है ।


यह कैसा इंसानी व्यवहार है ? इस्लाम की यह कौन सी शिक्षा है ? 


सीरिया में ग़ैरमुस्लिम लड़की का सुंदर होने से बड़ा कोई पाप नहीं  

 सीरिया में ग़ैरमुस्लिम लड़की होने से बड़ा कोई अपराध नहीं  


रविवार, 1 नवंबर 2015

व्यक्त हो रहा है अव्यक्त


F चांद मियाँ, आसाराम, रामपाल, सुखविंदर ....... सब भगवान, सब ईश्वर ! कलियुग में भगवानों और ईश्वरों  के जन्म लेने की श्रंखला प्रारम्भ हो चुकी है । इक्कीसवी शताब्दी में ईश्वरों और भगवानों की अभी एक बड़ी सेना जन्म लेने वाली है । यह आस्था का विषय है ।
F अदृष्य ईश्वर अब भारत में जन्म लेने लगा है और अपनी मृत्यु के पश्चात् एक ऐसा मूर्ख, अंधभक्त और कट्टर समुदाय छोड़ने लगा है जिसकी रुचि पापाचार और व्यापार में अधिक होती है ।  
F ईसवी पश्चात् इक्कीसवी शताब्दी के भारत को एक ईश्वर बहुल देश माना जा सकता है ।
F ईश्वर की बहुलता के कारण इनके अनुयायियों में वर्चस्व और श्रेष्ठईश्वर के विषय पर संघर्ष होने लगे हैं । संघर्ष भक्तों का धर्म है, इसके लिये वे नैतिकता, शिष्टाचार और पतन की सारी सीमाओं को तोड़ सकते हैं ।  

F भगवान आस्था का विषय है । जीवित भगवान एक चमत्कार है । चमत्कार ही सृष्टि का कारण है ।  
F आस्था एक ऐसा अकाट्य और अंतिम अस्त्र है जिसके आगे सारे तर्कों को बलात् चुप करा दिया जाता है ।
F आस्था की राह भिन्न है, उसका स्वरूप भिन्न है, उसकी व्यवस्था भिन्न है, उसके उद्देश्य भिन्न हैं ।
F आस्था सदा से समाज की व्यवस्था, विमर्श, तर्क और मीमांसा को मानने से असहमत होती रही है ।
F आस्था एक वर्ग उत्पन्न करती है जो राज्य की विधि-विधायी व्यवस्था को नकारती है एवं नीतियों से परे एक स्वच्छंद मार्ग का अनुसरण करती है ।
F आस्था विज्ञान का परिहास करती है और नये-नये मानक स्थापित करती है । इन मानकों का अपना दर्शन होता है, अपने अनुयायी होते हैं, अपना अर्थशास्त्र होता है, अपनी सेना होती है और अपना विधान होता है ।

F हमें भोजन में तले हुये केचुये, काकरोच का सूप, छछूंदर का भुर्ता और नाली के कीड़े पसंद हैं । भोजन के साथ हमें महुवा की शराब पीने की आदत है । शराब पीकर गटर के किनारे या किसी बद्बूदार नाली में लेटकर सो जाने में हमें इंद्रलोकतुल्य सुख की अनुभूति होती है ।
F सभ्य-सुसंस्कृत समाज की वर्जनाओं को तोड़ने में हमारी दृढ़ आस्था है । आस्था सर्वोपरि है, उसके आगे राज्य का कोई अस्तित्व नहीं । राज्य की यह विवशता राज्य के अस्तित्व की आवश्यकता है ।
F आस्था के बिना हम जी नहीं सकते । आस्था हमारी सर्वोपरि आवश्यकता है । हमारी आस्था हमारी जड़ता को एक अद्भुत विस्तार और निरंकुशता प्रदान करती है ।
F हम अमिताभ बच्चन से लेकर सुखविंदर कौर तक सबकी मूर्तियाँ मंदिर में प्रतिष्ठित कर उनकी पूजा करते हुये शांति का अनुभव करना चाहते हैं ।

F कलियुग में भीड़ की आस्था उग्र प्रतिक्रिया को जन्म देती है । उग्र प्रतिक्रिया मूर्ति भंजकों, लुटेरों और हत्यारों को जन्म देती है ।
F कलियुग के मानवरचित ईश्वर यौनशोषण से लेकर विनाश तक सबकुछ आमंत्रित करते हैं ।

F अपनी मूढ़ आस्था के वशीभूत हम विनाश की दिशा में तीव्रता से आगे बढ़ते जा रहे हैं ।

इतिहास इस तरह लिखा जाता है ...


एक हज़ार साल बाद दुष्ट इतिहासकारों द्वारा भारत का इतिहास कुछ इस तरह लिखा जायेगा –
ईसवी सन् 2015 तक भारत के लोग भोजन से पूर्व हाथ धोना तक नहीं जानते थे । कार्ल मार्क्स, लेनिन और प्रभु यीषु के परोपकारी अनुयायियों ने भारत के ज़ाहिलों को भोजन से पूर्व हाथ धोना सिखाया । इसके लिये उन्हें विशेष अभियान प्रारम्भ करने पड़े इसके बाद भी अच्छी तरह हाथ धोना सीखने में भारतीयों ने कई शताब्दियाँ लगा दीं ।
शिक्षा के मामले में हिंदुस्तान के लोग मूर्खतापूर्ण प्रयोग पर प्रयोग किये जा रहे थे किंतु इसके बाद भी वे यह कभी नहीं समझ सके कि शिक्षागुणवत्ता और आरक्षण दो परस्पर विरोधी तत्व हैं । सरकारी विद्यालयों में एक से एक अज्ञानी और शराबी लोग शिक्षण कार्यों के लिये नियुक्त किये गये थे । वे शराब पीने और कन्या छात्रावासों की लड़कियों से बलात्कार करने को पढ़ाई की अपेक्षा कहीं अधिक प्राथमिकता देते थे ।
इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में लोगों को पीने का स्वच्छ जल नहीं मिलता था । नल-जल व्यवस्था इस प्रकार कुव्यवस्थित की गयी थी जिससे पीने के पानी में सैल्मोनीला टाइफ़ी के अतिरिक्त कई प्रजातियों के घातक जलजंतु भी स्थायीरूप से निवास करते थे ।
इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीयों में राजनीतिक चेतना शून्य हुआ करती थी । सत्ता और राजनेता अपराधमूलक थे । भयानक अपराधियों के हाथ में सत्ता की बागडोर थी । अल्लाह ने ज़ाहिल और नोमैडिक हिंदुओं को सुधारने और सभ्य बनाने के लिये असदुद्दीन ओवेसी को तलवार लेकर हिंदुस्तान में अवतार लेने का हुक्म दिया । असदुद्दीन ने 2015 के अक्टूबर (पाक ज़िहादी माह मोहर्रम) महीने में पश्चिमी बंगाल पहुँचकर इस्लामिक सूबे का ऐलान किया जिससे हिंदुओं में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी ।                      

भेड़िया

हमारे गाँव में एक भेड़िया घुस आया है, उसने गाँव के कुछ मोहल्लों को वीरान कर दिया है ।

गाँव की अपूरणीय क्षति के बाद भी हम भेड़िये को मारना नहीं चाहते किंतु इतना अवश्य चाहते हैं कि वह वापस जंगल में चला जाय । हमने उसे भगाने का विचार किया ही था कि हमारे गाँव के कुछ लोग हमारे ऊपर टूट पड़े । उन्होंने हमारे ऊपर आरोप गढ़ना प्रारम्भ कर दिया कि हम गाँव की विविधता और बहुलता को आग लगाने का काम कर रहे हैं ।

तेरहवीं शताब्दी से गाँव में घुसे इस भेड़िये ने गाँव के कुछ मोहल्लों में 1947 में अपना जंगलराज स्थापित कर लिया । अब वह कुछ और मोहल्लों में जंगलराज स्थापित करना चाहता है । हम चाहते हैं कि भेड़िये की विस्तावादी दुष्टता से हम अपने बचे-खुचे गाँव को बचा लें किंतु “विविधता और बहुलता” के छद्म सिद्धांत आड़े आ रहे हैं । हमारे गाँव के कुछ लोगों को भेड़िये से गहरी मोहब्बत हो गयी है । ये लोग मनुष्य से अधिक भेड़ियावाद को महत्व देते हैं । अब वे भेड़िये के साथ मिलकर हमारे ऊपर आक्रमण करने लगे हैं । जब हम अपनी रक्षा के उपायों पर मंथन करते हैं तो हमें मनुष्यता का अपराधी घोषित करने में वे लेश भी विलम्ब नहीं करते ।  

      अंततः आज हम यह मंथन करने के लिये विवश हुये हैं कि अख़िर यह “विविधता और बहुलता” है क्या ? समाज और राष्ट्र के लिये इसका औचित्य क्या है ? सामाजिक संरचना और शांति में इसकी क्या उपादेयता है ? हमारे गाँव के कुछ लोग इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं ?

विविधता और बहुलता – कल और आज !
कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था ब्राह्म, शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सिख आदि । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था अरुणांचल प्रदेश से सिंध तक, कन्याकुमारी से कंधार तक और कच्छ से लेह तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था द्रविण भाषाओं से लेकर डोंगरी और सिंधी से लेकर संस्कृत तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था ध्रुपद से लेकर लोकगीत तक और कलियरिपट्टु से लेकर कत्थक और मणिपुरी तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था जौं की रोटी से लेकर पंचगव्य तक । इस विविधता और बहुलता में अरब कहीं नहीं था, उसके लिये कोई स्वाभाविक स्थान नियत नहीं था । अरब ने भारत में आकर अपने लिये स्थान हमसे छीना है । छीने हुये स्थान में स्थापित की गयी आयातित विविधता और बहुलता भारत का स्वाभाविक अंश नहीं है । जो स्वाभाविक नहीं है वह हमारे लिये अहितकर है, दुर्भाग्यजनक है । यह अस्वाभाविक अंश हमारे अस्तित्व के लिये संकट है । हम इस प्रकार की आक्रामक, विस्तारवादी, परोपजीवी और हिंसामूलक विविधता और बहुलता को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हैं । केर-बेर की स्वाभाविक प्रकृतियों की उपेक्षा कर उनकी सामीप्यता का छद्म आदर्श केर के अस्तित्व की हत्या का षड्यंत्र है । हमारे गाँव के छद्म बुद्धिजीवियों को अपना आचरण बदलना होगा । या फिर हमें ही गाँव छोड़कर एक बार फिर कहीं और जाना होगा । हम पहले ही सप्तसैंधव, गांधार और पूर्वी बंगाल को छोड़ चुके हैं । छद्म बुद्धिजीवी इस बात पर चिंतन क्यों नहीं करते कि आख़िर किन परिस्थितियों ने हमें हमारे गाँव के पारम्परिक मोहल्लों को छोड़ने के लिये विवश किया है ? उनकी मिलावटी विविधता और बहुलता ने अभी तक इस आर्यावर्त को क्या दिया है ? हाँ ! हमने बहुत कुछ खोया अवश्य है इस विविधता और बहुलता के कारण । हमारी विविधता-बहुलता की थाली में पारम्परिक व्यञ्जनों के साथ संखिया और धतूरे को भी सम्मिलित कर दिया गया है । व्यञ्जनों के समकक्ष संखिया और धतूरे की विषाक्तता को महिमामण्डित करने का कुचक्र भारतीय जनता को समझना होगा ।


छद्मबुद्धिजीवियों द्वारा नव गढ़ित परिभाषाओं और तत्व में अतत्व की मिलावट ने भारत का बहुत कुछ अमूल्य लूट लिया है । हम यदि अब भी अपनी कुम्भकर्णी नींद से नहीं जगे तो भारत को ईरान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तिब्बत बनने से कोई नहीं रोक सकेगा । 

पुरस्कार, देश की चिंता और विरोध का सैलाब ...


        भारत के साहित्यकार, कलाकार और अब वैज्ञानिकों ने पुरस्कार वापसी अभियान से सरकार, देश और दुनिया को प्रथम दृष्ट्या यह संदेश देने का प्रयास किया है कि देश के बुद्धिजीवी वर्तमान व्यवस्था से चिंतित हैं और व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं । बुद्धिजीवियों द्वारा सरकार के विरोध के सैलाब ने कुछ प्रश्न खड़े कर दिये हैं जिन पर देशव्यापी मंथन आवश्यक है ।
पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ कि व्यक्तिगतरूप से मैं स्वयं देश और समाज की कुव्यवस्था से व्यथित हूँ, किंतु यह तो सदा से है । जब से मैंने होश संभाला है सत्ता और समाज की बढ़ती दूरियों और स्वार्थों की राजनीति ने मुझे आहत किया है । देश की व्यवस्था कभी अच्छी नहीं रही, आर्थिक भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों का हनन, हत्या, अपराध, बलात्कार, नैतिक पतन, रिश्वतखोरी, झूठे वायदे, वर्गभेद … कुछ भी तो नहीं बदला बल्कि सभी में वृद्धि ही होती रही है । लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की समग्रक्रांति के अपवाद को छोड़ दिया जाय तो इससे पूर्व या इसके पश्चात् देश के बुद्धिजीवियों ने कभी ऐसे तेवर नहीं दिखाये । तेवर तो छोड़िये कभी सामान्य विरोध भी नहीं किया और करते भी क्यों वे तो स्वयं उसी व्यवस्था में रच-बस जाना ही उचित समझते रहे हैं । आज हमें बुद्धिजीवियों की इस विरोधीसेना में कोई प्रेमचंद, निराला, फणीश्वर नाथ रेणु या अब्दुल कलाम नहीं दिखता । जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति के समय हुये जनआंदोलन में जिन बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन कुव्यवस्था के विरोध में अपनी सक्रिय और दृढ़ भूमिका का निर्वहन किया वे वास्तव में देश और व्यवस्था के प्रति चिंतित थे । उनकी चिंता आत्मस्फूर्त चेतना से प्रेरित थी, उनमें सच्चीनिष्ठा थी, कहीं कोई कृत्रिमता नहीं थी । आज के बुद्धिजीवियों द्वारा किये जा रहे विरोध प्रदर्शन में उस चेतना और निष्ठा के दर्शन नहीं होते । यह एक सुविधाजनक विरोध है जिसे मैं एक नकारात्मक विरोध की संज्ञा देना चाहूँगा । भिक्षा में प्राप्त सम्मान वापस करने की क्षुद्रता से कुव्यवस्था के प्रति ईमानदार चिंता प्रकट नहीं होती । यदि वे किसी क्रांति की पृष्ठभूमि निर्मित कर रहे हैं तो इस यज्ञ में उनकी अपनी समिधा क्या है ? इनका विरोध एक काकस्वर से अधिक कुछ और नहीं प्रतीत होता । हम इस प्रकार के सुविधाजनक पाखण्डपूर्ण विरोध का समर्थन नहीं कर सकते । वास्तव में इन तथाकथित बुद्धिजीवियों का यह पाखण्डपूर्णकृत्य भर्त्सना के योग्य है । हमें निष्ठावान और अवसरवादी बुद्धिजीवियों में विभेद कर उन्हें पहचानना होगा । हम व्यवस्था में परिवर्तन नहीं चाहते, कुव्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं जिसके लिये देश को भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे निष्ठावान और समर्पित क्रांतिकारियों की आवश्यकता है ।
यह देश का दुर्भाग्य है कि इन अवसरवादी बुद्धिजीवियों ने इससे पूर्व देश की व्यवस्था को सुधारने के लिये कोई ठोस और रणनीतिपूर्वक कदम नहीं उठाया । निर्भयाकाण्ड को लेकर हुआ विरोधप्रदर्शन एक स्वस्फूर्त आंदोलन था, अपनी लड़कियों की सुरक्षा को लेकर एक तात्कालिक प्रतिक्रिया थी । यह आंदोलन निष्फल रहा, यौन अपराध होते रहे, उसी क्रूरता के साथ होते रहे, सामूहिकरूप में होते रहे और अब तो 3-4 वर्ष की बच्चियों के साथ भी ऐसी दरिंदगी की घटनायें बढ़ती जा रही हैं । आंदोलन एक उबाल के बाद बुझ गया । एक रस्म अदायगी हुयी और फिर सब कुछ पूर्ववत् होने लगा । यह बुद्धिजीवियों का आंदोलन नहीं बल्कि एक जनआंदोलन था जिसमें बुद्धिजीवी भी सम्मिलित हो गये थे । उस आंदोलन को क्रांति तक ले जाने में बुद्धिजीवियों की रुचि क्यों नहीं हुयी ? इसलिये नहीं हुयी क्योंकि तेजपाल जैसे बुद्धिजीवी अवसरवादी होते हैं । वे जनसमूह के साथ विरोध में भी खड़े हो जाते हैं और अवसर मिलते ही भेड़िया बन कर नोच खाने के लिये भी तत्पर हो जाते हैं । जिस तरह देश को बाबाओं, बाइयों, भगवानों, देवियों और नेताओं से सावधान रहने की आवश्यकता है उसी तरह अब ऐसे अवसरवादी और छद्मबुद्धिजीवियों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है ।