शनिवार, 7 सितंबर 2024

लड़की-भेड़िया-संविधान

     १.     *सामान*

अपराजिता बिल है

एक और संविधान

न्याय के बाजार में

सजावट का एक और सामान ।  

न नौ मन तेल होगा

न राधा नाचेंगी

न कोई प्रमाण मिलेगा

न कोई दंडित किया जाएगा ।

इस तरह

होता रहेगा पराजित

अपराजिता बिल

संविधान की तरह ।

२.     *न्याय की पोटली*

बाँधकर अन्याय

न्याय की पोटली में

निकला है राजा

मृगया विहार को ।

उसके लिए

मृग-शावक होती हैं बेटियाँ

तुम जब भी न्याय माँगोगी

वह खोलकर बैठ जाएगा

न्याय की पोटली

और बिखेर देगा भरपूर अन्याय ।

३.     *त्वरित न्याय*

अपराजिता बिल लाकर

धो लिये उसने

अपने रक्त-रंजित हाथ  

बचा ली सरकार

और कर दिया

विरोधियों पर प्रहार

जो वास्तव में

प्रहार है बेटियों पर ।

बेटियों की पीड़ा होती

किसी को भी  

तो ये नाटक न होते

यह निर्लज्जता न होती

ये कभी न समाप्त होने वाली जाँचें न होतीं

केवल न्याय होता

त्वरित न्याय ।  

४.     *कोलकाता-बहराइच-कोलकाता*

मानकर मृग-शावक

बेटियों पर झपटते हैं संगठित भेड़िये

एक दूसरे को बचाने के लिए

अपनी जान भी दे देते हैं भेड़िए

वे नहीं होते मनुष्यों की तरह

टूटे और बिखरे हुए

आपदा में

एक-दूसरे को नोचते हुए ।

भेड़ियों ने नहीं लिखा

कभी कोई संविधान

वे समर्पित होते हैं

एक-दूसरे के लिए

पूरी निष्ठा से

वे नहीं होते मनुष्यों की तरह

जो बनाते हैं संविधान

कभी न मानने के लिए ।

५.     *संविधान से आगे*

कब तक जलाती रहोगी

कुछ पल जलने वाली मोमबत्तियाँ ।  

अँधेरे प्रतीक्षा नहीं किया करते

मोमबत्तियों के बुझने की

मोमबत्तियाँ सीमित हैं

और अँधेरे

असीमित,

वे

फिर घिर आएँगे ।  

बेटियों को बनना होगा

सतत ज्वाला

जीवन के अंतिम क्षण तक

बेटियों को सीखना होगा

जो नहीं लिखा है संविधान में ।

जो लिखित है वह सीमित है

जो अलिखित है वह असीमित है ।

तुम्हारे लिए

संविधान से आगे भी है  

एक और संविधान ।      

६.     *लड़की*

वे

निकालकर सबकी आँखों से काजल

उठा लेते हैं एक सामान

जिसे तुम लड़की कहते हो ।

वे

चीरते हैं, फाड़ते हैं, चबाते हैं

उस सामान को

जिसे तुम लड़की कहते हो ।

राजा की चौखट से न्याय के मंदिर तक

वे

अजेय होते हैं

उनके सुरक्षा कवच

बहुत दृढ़ होते हैं ।

उनके साथ

गुरिल्ला-युद्ध में दक्ष

हिंसक भीड़ होती है ।

लड़की

अकेली होती है

अंदर से बाहर तक

इस छोर से उस छोर तक ।

सनसनी बेचने वाले व्यापारी

मिलते ही दूसरी सनसनी

छोड़ दिया करते हैं

पहले वाली सनसनी ।

लड़की

फिर हो जाती है अकेली

बची हुयी

हर जीवित लड़की ।

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

वह फ़ीनिक्स है

दुनिया भर ने देखा कि वह बार-बार घायल हुआ, कभी-कभी राख भी हुआ लेकिन उसी राख में से फड़फड़ाकर पुनः आकाश में उड़ान भरने लगा । बाढ़ और भूकम्प जैसे प्राकृतिक प्रकोपों को झेलते और कोरोना वायरस से लड़ते हुये वह एक बार फिर सिर उठाकर खड़ा हो चुका है । उसे अपने घर के कूड़ा-करकट को उठाकर जला देने में विश्वास है, और इसके लिए वह किसी से आज्ञा नहीं लेता, किसी से कोई परामर्श नहीं करता, किसी न्यायालय के निर्णय के लिए वर्षों प्रतीक्षा नहीं करता, किसी की निंदा सुनकर अपने बढ़े हुए एक कदम को अढ़ाई कदम पीछे पलट कर नहीं ले जाता । वह वही करता है जो उसे अपने देश के लिए करना चाहिये ।

वह बोलता बहुत कम है पर अपने देश के विकास और समृद्धि के काम बहुत करता है, करता ही रहता है, दुनिया उसके विकास को देखते रहती है, देख-देख कर ईर्ष्या में जलती रहती है। अमेरिका और यूरोप में उसकी निंदा होती है, उस पर प्रतिबंध लगाये जाते हैं, पर वह अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटता, प्रतिबंध लगाने वाले देशों को कुछ समय बाद झख़ मारकर प्रतिबंध हटाने पड़ते हैं, यही बात विचारणीय है । चीन पर लगाये प्रतिबंध हटाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प क्यों नहीं होता किसी के पास ? हमने मेक-इन-इंडिया का नारा दिया, लेकिन चीन के सहयोग के बिना वह भी नहीं हो सका । हम असेम्ब्लर बन कर रह गये । हम चीन के सहयोग के बिना पैरासिटामोल तक बना सकने की स्थिति में नहीं हैं । सेमी-कंडक्टर्स के लिए हमें अभी तक चीन का मुँह ताकना पड़ता है । कम्प्यूटर्स, ब्रॉडकास्टिंग उपकरण, इंटीग्रेटेड सर्किट्स, मेडिकल उपकरण, प्लास्टिक्स, कार्बनिक पदार्थ… जैसी कई चीजों के लिए हम चीन पर निर्भर हैं । कहाँ है आत्मनिर्भर भारत ? क्यों नहीं हो सका आत्मनिर्भर भारत ?

हम आतंकवादियों को संतुष्ट करने में अपनी सारी शक्ति लगा देते हैं, उनके द्वारा की जाने वाली हिंसा और तोड़फोड़ की क्षतिपूर्ति में ही लगे रहते हैं । ऐसा देश कभी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता जो अपने आंतरिक शत्रुओं को पहचान कर भी न पहचानने का पाखंड करता रहता है । चीन में कोई आतंकवाद क्यों नहीं है? वहाँ कोई रेल की पटरियों की फ़िश-प्लेट्स क्यों नहीं खोलता, वहाँ कोई ट्रेन में आग क्यों नहीं लगाता, वहाँ की संसद पर आतंकी आक्रमण क्यों नहीं होता, वहाँ निर्भया जैसी हृदयविदारक अपराधों की श्रंखला क्यों नहीं होती, वहाँ के मदरसों में आतंकवाद क्यों नहीं पढ़ाया जाता, वहाँ कोई पुलिस महानिरीक्षक “RSS मुल्क में सबसे दहशतगर्द तंज़ीम” जैसी पुस्तक क्यों नहीं लिखता...?

बहुत कुछ अप्रिय और अवांछित है जो अलोकतांत्रिक चीन में नहीं होता, बहुत कुछ अप्रिय और अवांछित है जो लोकतांत्रिक भारत में होता है... होता ही रहता है, कोई संविधान, कोई न्यायालय, कोई सरकार उसे रोक सकने में समर्थ क्यों नहीं हो पाती ? हमें साम्यवादी, जनवादी, राजतांत्रिक और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की समीक्षा कर एक ऐसी नयी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनुशासन की कठोरता हो, सैद्धांतिक दृढ़ता हो, राष्ट्रीय मूल्यों का सम्मान हो और लोककल्याण के लिए समर्पण हो अन्यथा हमें अभी और भी कई हिंसापूर्ण विभाजनों को होते हुये देखना ही पड़ेगा ।

कभी-कभी चौड़े सीने से वे काम नहीं हो पाते जो बहुत छोटी-छोटी आँखों से हो जाते हैं । उसकी आँखें भले ही बहुत छोटी हों पर उनकी दूरदृष्टि की क्षमता की प्रशंसा करनी होगी । छोटी आँखों वाले चीनियों पर तानाशाही का ठप्पा लगा हुआ है पर क्या यह सच नहीं कि वह ठप्पा लोकतंत्र के कागजी फूलों की अपेक्षा कहीं अधिक व्यावहारिक और लोककल्याणकारी है ! वहाँ का सरकारी तंत्र अपराधियों को बचाने के लिए निर्लज्ज होकर सारी मर्यादायें नहीं लाँघता, सीधे गोली मार देता है । यहाँ तो यौनदुष्कर्म करने वाले अपराधियों का इनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारी को ही जेल में ठूँस दिया जाता है (बंगलुरु की घटना)।

हमारी स्वेच्छाचारी लोकतांत्रिक व्यवस्था हमें हर दृष्टि से अपंग, पराश्रित और स्वाभिमानशून्य बना रही है, हम न जी पाने की स्थिति में होते हैं और न मर पाने की स्थिति में, हम केवल तड़पते और सुलगते हुये ही रह पाते हैं जीवन भर ।


जाति कितनी संवेदनशील

        “हिन्दू धर्म में जाति एक संवेदनशील विषय है । यदि किसी की प्रगति के लिए आवश्यक है तो जातीय जनगणना होनी चाहिए, चुनावी लाभ के लिए नहीं” – राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ।

अब संघ से कुछ प्रश्न –

1.    क्या जाति-व्यवस्था को हिन्दू-धर्म का मौलिक एवं अभिन्न अंग स्वीकार किया गया है ? यदि हाँ, तो किस प्राचीन ग्रंथ में ?

2.    जातिव्यवस्था के विरुद्ध रहने वाले संघ को अनायास ऐसा क्यों लगने लगा कि जातिगणना से भेदभाव का नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र का विकास संभव है ?

3.    स्वाधीनता के पश्चात् से अब तक सरकारों ने जातीय भेदभाव के आधार पर कई कल्याणकारी योजनायें बनायीं, क्या वे उनके विकास के लिए पर्याप्त नहीं थी ? “किसी की प्रगति” में सहायक या बाधक कौन होता है, कुछ जातियाँ या सरकारें?

4.    क्या आप मानते हैं कि समाज के विकास के लिए सरकारों के पास अभी तक पर्याप्त और तथ्यात्मक सांख्यिकी आधार नहीं थे और अब जातियों के आधार पर ही समाज और देश का विकास किया जाना चाहिये, अवसरों की उपलब्धता और भौगोलिक आधार पर नहीं ?

5.    इस बात की क्या सुनिश्चितता है कि समाज को जाति और वर्ग में बाँट देने से समाज विभाजित होकर क्षीण नहीं होगा, राष्ट्रीय एकता खण्डित नहीं होगी बल्कि समाज और देश विकास करने लगेगा?

6.    समाज को जातियों में बाँटने से, अब तक के जातीय इतिहास में विभिन्न राजाओं, सुल्तानों और सरकारों के हित साधे जाते रहे हैं या समाज के ?

7.    क्या समाज को जातियों और समुदायों में बाँटे बिना समाज का कल्याण और विकास सम्भव नहीं ?

8.    सामाजिक न्याय और विकास के लिए जातीय आधार महत्वपूर्ण होना चाहिए या आर्थिक और भौगोलिक आधार ?  

9.    यह कौन सुनिश्चित करेगा कि जातीय जनगणना का उद्देश्य चुनावी लाभ नहीं होगा ?

10.  क्या इस तरह जाति-आधारित आरक्षण को और भी सुदृढ़ एवं स्थायी नहीं किया जा रहा है जो कि वास्तव में संविधान की अवधारणा और व्यवस्था के विरुद्ध है ?

11.  क्या कोई समाज या सरकार जातीय आधार पर किसी के साथ ईश्वरप्रदत्त उसकी नैसर्गिक क्षमता, दक्षता और गुणवत्ता को छीन सकता है, जिसे वापस किए जाने के लिए अब जातीय जनगणना की आवश्यकता है ? जो भी भेदभाव हैं वे सब अवसरों की उपलब्धता को लेकर हैं जिसके लिए सरकारें ही उत्तरदायी हैं, क्या ऐसी सरकारें जातिगणना के बाद समान अवसर उपलब्ध करवायेंगी इस बात की क्या सुनिश्चितता है ?

जातीय वर्गीकरण को समाज और देश के लिए विभाजनकारी और हानिकारक मानने वाले राष्ट्रीय-स्वयं-सेवक-संघ का अपने ही पूर्व सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर ऐसा वक्तव्य एक तरह से हिन्दूविरोधियों और विपक्षी दलों की जातीय जनगणना की माँग का समर्थन करता है ।

फलादेश ज्योतिषीय वर्गीकरण से स्पष्ट है कि सनातनी हिन्दूसमाज में जातीय वर्गीकरण कभी भी मौलिक सिद्धांत नहीं रहा, यह तो कालक्रम से निर्मित राजकीय और सामाजिक व्यवस्था रही है जिसका अस्तित्व दो हजार वर्ष पूर्व तक तो था ही नहीं । जातीय विभाजन के अस्तित्व में आने के बाद से यह विषय निरंतर विवादास्पद होता चला गया तथापि यह विषय इतना संवेदनशील भी कभी नहीं रहा जितना कि आज ।

राष्ट्रीय-स्वयं-सेवक-संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर संघ के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध अब यह मानते हैं कि – “...जातिगत गणना देश की एकता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है इसलिए इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, न कि चुनाव और राजनीति को ध्यान में रखकर ! ...देश और समाज के विकास के लिए सरकार को सांख्यिकी तथ्यात्मक आधारों की आवश्यकता होती है, इसका व्यवहार भिन्न-भिन्न जातियों और समुदायों की भलाई के लिए करना चाहिये । समाज की कुछ जाति के लोगों के प्रति विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है जिसके लिए जातीय-जनगणना करवानी चाहिए । इसका व्यवहार लोककल्याण के लिए होना चाहिए

तथाकथितरूप से सामाजिक न्याय और कल्याण के लिए जातीय-जन-गणना की माँग” पर विपक्षी राजनीतिक दलों के सुर में सुर मिलाते हुये अब संघ भी भाजपा नीति के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है । अब से पहले तक तो संघ के नेता इसे समाज को बाँटने वाला और असमानता का मूल बताते रहे हैं । वर्ष २०२३ के माह दिसम्बर में संघ प्रचारक और विदर्भ प्रांतप्रमुख श्रीधर गाडगे देश में जातिगत जनगणना को प्रोत्साहित किए जाने के विरुद्ध वक्तव्य देते रहे हैं ।

संघ-प्रचार-प्रमुख सुनील आंबेकर का यह विचार पूरी तरह से “तथाकथित सेक्युलर” एवं वामपंथी सिद्धांतों का समर्थन करता है । जनसंघेतर विचारक धर्म, जातिवाद और राष्ट्रवाद का विरोध तो करते हैं पर अपनी कूटनीतिक चालों से इन्हें बनाये भी रखना चाहते हैं । अभी तक भाजपा भी जातीय जनगणना को सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक मानती रही है किंतु अब उसकी मातृ-संस्था के करवट लेने से उसे भी एक बार गहन मंथन करना होगा जिसके परिणाम पूरे भारतीय समाज के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होंगे ।

सनातनी भारतीय समाज में जातियाँ

            ज्योतिषीय परम्पराओं में चार वर्ण हैं, तीन गण हैं, पाँच वश्य हैं और चौदह योनियाँ हैं, जबकि जातियाँ एक भी नहीं हैं । यह मनुष्य की प्रकृतिनिर्धारित संवैधानिक व्यवस्था (बायोलॉजिकल कांस्टीच्यूशन) है जिससे जातक जीवन भर अनुशासित और संचालित होता है

जातीय विभाजन पूरी तरह से सत्ताधीशों के निजी हितों की पूर्ति के लिए किया जाता रहा है । विभाजित और दुर्बल समाज पर शासन करना सत्ताधीशों के लिए सरल होता है ।

ज्योतिष परम्परा में मनुष्य (जातक) का वर्गीकरण उसकी सकारात्मक विशेषताओं को प्रोत्साहित करने और दुर्बलताओं को सुधारने के प्रयासों के लिए प्रशस्त माना जाता है । यह वर्गीकरण व्यक्ति को समाज से तोड़ता नहीं बल्कि युक्तियुक्त तरीके से जोड़ता है ।  

सनातनी भारतीय व्यवस्था में वर्गीकरण –

चार वर्ण  

ब्राह्मण-वर्ण कर्क, वृश्चिक, तथा मीन राशि के जातक ।

क्षत्रिय-वर्ण मेष, सिंह एवं धनु राशि के जातक ।

वैश्य-वर्ण वृषभ, कन्या एवं मकर राशि के जातक ।

शूद्र-वर्ण मिथुन, तुला एवं कुम्भ राशि के जातक ।

 

तीन गण –

देव-गण – सुंदरो दान शीलश्च मतिमान सरलः सदा। अल्पभोगी महाप्राज्ञो तरो देवगणे भवेत् ॥

मनुष्य-गण – मानी धनी विशालाक्षो लक्ष्यवेधी धनुर्धरः। गौरः पौरजन ग्राही जायते मानवे गणे ॥

राक्षस-गण – उन्मादी भीषणाकारः सर्वदा कलहप्रियः। पुरुषो दुस्सहं बूते प्रमेही राक्षसे गणे ॥  

 

पाँच वश्य –

चतुष्पाद – मेष एवं वृष राशि के जातक ।

मानव – मिथुन, कन्या, तुला, धनु एवं कुम्भ राशि के जातक ।

जलचर – कर्क, मकर एवं मीन राशि के जातक ।

कीटक – वृश्चिक राशि के जातक ।

वनचर – सिंह राशि के जातक ।


चौदह योनियाँ –

अश्व-योनि – अश्विनी एवं शतभिषा नक्षत्र के जातक ।

गज-योनि – भरणी एवं रेवती नक्षत्र के जातक ।

मेष-योनि – कृतिका एवं पुष्य नक्षत्र के जातक ।

सर्प-योनि – रोहिणी एवं मृगशिरा नक्षत्र के जातक ।

श्वान-योनि – आर्द्रा एवं मूल नक्षत्र के जातक ।

मार्जार-योनि – पुनर्वसु एवं अश्लेषा नक्षत्र के जातक ।

मूषक-योनि – मघा एवं पूर्वा फाल्गुणी नक्षत्र के जातक ।

गौ-योनि – उत्तरा फाल्गुणे एवं उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के जातक ।

महिष-योनि – हस्त एवं स्वाति नक्षत्र के जातक ।

व्याघ्र-योनि – चित्रा एवं विशाखा नक्षत्र के जातक ।

मृग-योनि – अनुराधा एवं ज्येष्ठा नक्षत्र के जातक ।

वानर-योनि – पूर्वाषाढ़ा  एवं श्रवण नक्षत्र के जातक ।

नकुल-योनि – उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के जातक ।

सिंह-योनि – धनिष्ठा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के जातक ।

 

जातक की प्रकृति, रुचि, प्रवृत्ति, क्षमता, उन्मुखता, आशंकाओं, सम्भावनाओं आदि के संकेत ज्योतिष के इस वर्गीकरण से प्राप्त होते हैं । यह गणितीय और बायोलॉजिकल विश्लेषण है, जिसमें जाति का कहीं कोई प्रावधान नहीं है । आज जाति-जन-गणना को लेकर चर्चाएँ हो रही हैं, उनके पक्ष-विपक्ष में तर्क-कुतर्क दिए जा रहे हैं । जाति-व्यवस्था के लिए ब्राह्मणों, मनुस्मृति और वेदों को उत्तरदायी मानते हुये उन्हें गालियाँ दी जा रही हैं जबकि जातियों को बनाये रखने के लिए ही नहीं बल्कि और भी नयी-नयी जातियाँ उत्पन्न करने के लिए सभी राजनीतिक दल हर तरह की उठा-पटक करने के लिए तैयार रहते हैं । क्या अब भी आप इस सामाजिक विभाजन के लिए उन्हें ही उत्तरदायी मानते रहेंगे जिनका इसमें कभी कोई योगदान रहा ही नहीं ?