अतिविद्वान ने कहा
मत करो राजनीति की बातें
वातावरण दूषित होता है
मछलियों की बातें करो
तुम मछुआरे हो,
घंटियों की बातें करो
तुम पुजारी हो,
दूध की बातें करो
तुम ग्वाले हो।
कैसे करूँ
इन सबकी बातें
समझ नहीं पाता मैं।
मछलियों के बीज डाले ही नहीं गये
गाँव के सरकारी पोखर में
जो पहले से थीं भी
उन्हें खा गये
मंत्री जी।
पीतल की घंटियाँ
चुरा ली हैं
मंदिर के
सरकारी सेवकों ने
दूध नकली बनता है
नेता जी की फैक्ट्री में
कोई कोना नहीं
जो मुक्त हो
सरकारी हस्तक्षेप से।
सरकार माने राजनीति
राजनीति माने नेता जी की भैंस
भैंस नेता जी की ही है
क्योंकि लाठी उनकी ही है।
भैंस लेने के लिए रुपयों की नहीं
लाठी की आवश्यकता है
वह लोकोक्ति तो सुनी है न!
"जिसकी लाठी उसकी भैंस"
तो इस तरह सब कुछ
नेताओं का ही है
सरकार भी
राजनीति भी
देश भी
देश की सारी संपत्ति भी
और तुम कहते हो
अछूत है राजनीति
और राजनीति जो छू रही है सबको
उसका क्या!
केवल छू ही नहीं रही,
पकड़ कर मरोड़ दे रही है
कपड़े सा निचोड़ दे रही है
और तुम कहते हो
दूर रहो राजनीति से!
राजनीति को ही
दूर क्यों नहीं रखते
हम से
हमारे जीवन से
हमारे धर्म से
हमारे सुख-चैन से!
राजनीति
हर लेती है सब कुछ
हर किसी का
और हम
जाने दें उसे यूँ ही
बिना किये दंडित
बिना किये प्रक्षालित!
नहीं
हम निस्पृह नहीं रह सकते
तुम्हारी तरह अवसरवादी नहीं हो सकते।
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