शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

हिज़ाब के समर्थन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

         हिज़ाब के समर्थन में मुसलमानों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी एक सुर में आलाप भरने लगी है, उसी सुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी गीत गाने लगा है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कर्नाटक शाखा के अनिल सिंह ने पर्दाप्रथा को भारतीय सभ्यता का एक हिस्सा मानते हुये हिज़ाब का समर्थन किया है । उन्होंने यह भी फ़रमाया कि भगवा गमछा वाले लड़कों द्वारा देश की बेटी को आतंकित करने का व्यवहार अनुचित है ।

वहीं अलीगढ़ की सपा नेता रूबीना ख़ान ने भी घूँघट और हिज़ाब को भारतीय संस्कृति और परम्पराओं का अटूट हिस्सा बताते हुये लड़कियों के आत्मसम्मान पर डाले गये हाथों को काट डालने की घोषणा कर दी है ।

हिज़ाब मामला अभी हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय में है, किंतु ठेकेदारों के फैसले अभी से आने प्रारम्भ हो चुके हैं । ज़ाहिर है, कि न्यायालयों से इन ठेकेदारों को अपने मनचाहे निर्णय की अपेक्षा है, मनचाहा निर्णय न होने की स्थिति में न्यायालयों को सुपरसीड करते हुये ठेकेदारों का निर्णय ही अंतिम माना जायेगा ।

हम भारत के लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जानना चाहते हैं कि आतंकपूर्ण व्यवहार की परिभाषा क्या है और जय श्रीराम का नारा लगाने से आतंक कैसे उत्पन्न होता है? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पर्दा प्रथा को भारतीय संस्कृति का हिस्सा स्वीकार किया है, कृपया बतायें कि क्या सीता स्वयम्वर में सीता जी ने घूँघट डालकर विवाह रचाया था? भारत के लोग यह भी जानना चाहते हैं कि रूपेश पांडे की हत्या आतंकवाद की श्रेणी का हिस्सा है अथवा नहीं?

आज भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और यूके में कर्नाटक की हिज़ाबी घटना को लेकर धार्मिक राजनीति गर्म हो गयी है, इन स्थितियों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का “भगवा गमछा” और “जय श्रीराम” के नारे पर दिया गया यह वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का यह वक्तव्य, कि जयश्रीराम का नारा लगाने से आतंक उत्पन्न होता है और हिज़ाब वाली मुस्कान ख़ान को भगवा गमछा वाले लड़कों ने आतंकित करने का प्रयास किया है, हिन्दूविरोधी नेताओं के उस आरोप को स्वीकार करता है जो हिंदुत्व और केसरिया रंग को आतंक का प्रतीक और भारत के लिये ख़तरा मानते रहे हैं । इस दृष्टि से बंगाल में जय श्रीराम का नारा लगाने वालों पर दमनात्मक कार्यवाही और कारसेवकों पर मुलायम सरकार द्वारा बरसाई गयी गोलियों की कार्यवाही को सर्वथा न्यायोचित ठहराया जा सकता है ।

ईशनिंदा के आरोप में काफिरों की हत्या कर दी जाती है, पालघर में साधुओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है, हिन्दू मंदिरों की छतों पर मजारें बना दी जाती हैं, सार्वजनिक पार्कों में दरगाहें बना दी जाती हैं ...इन सब लोकतांत्रिक और भारतीय संस्कृति को पोषित करने वाली घटनाओं पर कोई संतोषजनक और सशक्त कदम न उठाकर राष्ट्रीस्वयं सेवक संघ ने अपनी नीति-रीति से सभी को अवगत करा दिया है जिसके लिये यह देश उनका बहुत ऋणी है ।   

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दुओं को प्रकारांतर से यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भारत में हिन्दू हितों का कोई भी समर्थक और रक्षक नहीं है, इसलिये हिन्दुओं को अपनी संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व बचाने के लिये किसी संस्था पर आश्रित होने की अपेक्षा स्वयं ही उठकर खड़े होना होगा अन्यथा ईरान बनने के लिये तैयार रहना होगा ।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

यूक्रेन-रूस विवाद

 आशंका की जा रही है कि यूक्रेन और रूस से बीच कभी भी भीषण युद्ध प्रारम्भ हो सकता है ।

एशिया से योरोप तक विस्तृत भूभाग वाले पूर्व सोवियत संघ को 1991 से पूर्व दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश माना जाता था । विभाजन के बाद प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देश यूक्रेनकज़ाख़िस्तान और उज़्बेकिस्तान आदि स्वतंत्र हो गये और सोवियत रूस यूरेनियम के मामले में अपेक्षाकृत ग़रीब हो गया । तो क्या यूक्रेन के यूरेनियम स्रोतों के लिये रूस इतना आक्रामक हो उठा है! 

सोवियत संघ से पृथक होते समय रूसी बहुल जनसंख्या वाला क्षेत्र क्रीमिया यूक्रेन का एक हिस्सा बना । क्रीमिया एक महत्वपूर्ण पेनिनसुला है जिसकी आवश्यकता यूक्रेन और रूस दोनों देशों को है । रूसी बहुल क्षेत्र होने के कारण क्रीमिया के नागरिकों के हितों की सुरक्षा के लिये सोवियत रूस की सहज भावनाओं का अनुमान किया जा सकता है ।

क्रीमिया एक ऐसा क्षेत्र रहा है जहाँ समय-समय पर ग्रीकतुर्कज़र्मनपर्सियन्स और हूण आदि भी शासन करते रहे हैं । इसीलिये वहाँ के नागरिकों में 65.3% रसियन और 15.1% यूक्रेनियन के साथ-साथ 10.8 % क्रीमियन तातार, 0.9% बेलारूसियन, 0.5% आर्मीनियन एवं 7.4% अन्य लोग हैं जिनमें ग्रीकअश्केनाज़ी ज्यूज़ज़र्मन्स और पर्सियन्स भी सम्मिलित हैं ।

2014 में रूस ने क्रीमिया को फिर से रूस का हिस्सा बना लिया । यद्यपि क्रीमिया का अराबात स्पित अभी भी यूक्रेन के ही अधिकार में है । यूँ समझियेसिंधियों की दुर्दशा के कारण भारत एक बार फिर से कराची को अपना हिस्सा बना ले तो वृहत्तर भारत के खण्डित हुये दोनों हिस्सों के बीच युद्ध की आशंकायें तो होंगी ही ।

क्रीमिया के एक ओर है गर्म पानी वाला अज़ोव सागर और दूसरी ओर है काला सागर । सामरिक और आर्थिक दृष्टि से भी क्रीमिया का महत्व रूस और यूक्रेन दोनों के लिये है । कराची के अधिकांश सिंधी तो मुसलमान बन गये किंतु क्रीमिया के रूसी अभी तक रूसी ही हैं और रूस का समर्थन करते हैं ।

युद्ध सदा ही विनाशक होते हैंयूँ दिमाग की गर्मी को शांत करने का जब और कोई उपाय न बचे तो युद्ध को टाला जा सकना सम्भव नहीं होता । बिना किसी विवाद के क्रीमिया विवाद सुलझ जाने की कामना के साथ हम ईश्वर से प्रार्थना हैं ।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

भाषण की जलेबी में जलेबी का भाषण

             तो बंदरबाँट वाला असली किस्सा यह है कि एक बंदर ने कुछ लोगों को रोटी खाते हुये देखा । उसे लोगों का इस तरह आराम से रोटी खाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा । उसने स्वयं को चौधरी की तरह प्रस्तुत करते हुये बताया कि इस तरह रोटी खाना एक असमान और अन्यायपूर्ण बँटवारा है जिससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है । बंदर नें समानता-असमानता और न्याय-अन्याय जैसे विषयों पर कई दिन तक भाषणों की वर्षा की, ढपली बजाकर साम्यवादी गीत गाये, “सलाम कामरेड” बोला और रोटी खाने वालों को इस बात के लिये मना लिया कि वे जंगल के वास्तविक चौधरी की चौधराहट को नहीं बल्कि बंदर की चौधराहट को स्वीकार करते हैं और रोटी के बँटवारे का एकाधिकार उसे देते हैं ।

...और इस तरह लाखों वर्षों से जंगल के राजा रहे शेर की सत्ता को एक बंदर ने अपने जलेबीभाषणों से उखाड़ फेका । जंगल में अब कोई राजा विक्रमादित्य, राजा हरिश्चंद्र और राजा पोरस की बात भी नहीं करता, दे आर नाव आउट डेटेड एण्ड मनुवादी फ़ेलोज़ । टु इंज्वाय, इंसल्ट देम ऐज़ मच ऐज़ यू कैन । इट इज़ योर फ़ण्डामेंटल राइट, व्हिच इज़, ऐज़ यू ऑफेनली यूज़्ड टु से “अवार्डेड बाय अवर होली कॉन्स्टीट्यूशन” । 

संविधान, समानता और वर्गभेद

जब राजा कहता है कि हम जाति, लिंग, धर्म और पंथों से परे सभी जातियों, सभी लिंगों, सभी धर्मों और सभी पंथों के विशेषाधिकारों की रक्षा करेंगे तो वह प्रच्छन्नरूप से यह घोषणा कर रहा होता है कि वह अपने राज्य में जाति, लिंग, धर्म और पंथ विहीन समाज की रचना के लिये सभी जातियों, सभी लिंगों, सभी धर्मों और सभी पंथों के विशेषाधिकारों को बनाये रखेगा । जब हम विशेषाधिकारों की बात कर रहे होते हैं तो समाज को विभिन्न वर्गों में बाटते हुये समानता के अधिकार को समाप्त कर रहे होते हैं । इस जलेबीभाषण के दूरगामी लक्ष्य को समझना होगा ।

अवसर तो समान हो सकते हैं किंतु हर व्यक्ति समान नहीं हो सकता, न उसे विभिन्न उपायों से एक समान बनाया जा सकता है । हर व्यक्ति की मानसिकता, बुद्धि, उद्देश्य और क्षमतायें एक समान हो ही नहीं सकतीं । किसी को अंगूर की शराब के साथ बहत्तर हूरें चाहिये, किसी को मोक्ष चाहिये, किसी के लिये फिदायीन बनना सबब का काम है, किसी के लिये प्राणिमात्र की रक्षा करना पुण्य का काम है, आप किस समानता की बात करते हैं ?

जब हम वर्षा को नकारते हैं, ठीक उसी क्षण अ-वर्षा को स्वीकार भी करते हैं । एक पक्ष को स्वीकार करना उसके दूसरे पक्ष को अस्वीकार करना होता है । जब हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के पृथक अस्तित्व वालेसमाज को स्वीकार कर रहे होते हैं तो ठीक उसी क्षण अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक रहित समाज के अस्तित्वको अस्वीकार कर रहे होते हैं ।

जिस क्षण आपने “सभी जातियों, धर्मों, अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों” के उत्थान की बात की थी उसी क्षण आपने वर्गभेद, जातिभेद और धर्मभेद के पृथकतावादी अस्तित्व को स्वीकार करते हुये देश के “सभी नागरिकों” की एकता को खण्डित कर दिया था । ऐसी चौधराहट किसी भी समाज को कभी मनुष्य नहीं बनने देती । संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 में जब शिक्षा, संस्कृति और भाषा के संरक्षण के हितग्राहियों की श्रेणी में यह विशिष्ट पद - “चाहे अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक” लिखा गया तो समाज में दो वर्गों की घोषणा तो अपने आप हो गयी । अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के स्थान पर “देश के नागरिक” भी लिखा जा सकता था । कोई संविधान जो सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय होने की घोषणा करता है वह अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के दो पृथक अस्तित्वों की प्रच्छन्न घोषणा कैसे कर सकता है!

संविधान ने माना कि भारतीय समाज में असमानतायें हैं जिन्हें दूर करने के लिये कुछ लोगों को उनकी योग्यता की उपेक्षा करते हुये एक निर्धारित समय तक आरक्षण दिया जाना चाहिये । ये असमानतायें विदेशियों के शासनकाल में स्थापित की गयी थीं, स्वाधीनता के बाद भी उन असमानताओं को बनाये रखने के लिये आरक्षण की व्यवस्था की गयी जो पहले कालसापेक्ष किंतु योग्यतानिरपेक्ष थी और अब कालनिरपेक्ष भी हो गयी है ।

क्या भारत के सभी नागरिकों को अपने विकास की एक समान सुविधायें उपलब्ध करवाने के संकल्प से किसी नागरिक के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है ? आख़िर ऐसे प्रावधान की आवश्यकता ही क्यों पड़ी ? भारतीय समाज में जिन्हें दलित, अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति कहकर उनकी पहचान को आरक्षण के लिये विशिष्ट बनाने के प्रावधान किये जाते रहे उन्हीं प्रावधानों ने भारतीय समाज को अपंग बना दिया । वैदिक ऋचाओं के साक्षात्कार में केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के समाज के लोगों का योगदान रहा है जिनमें न केवल स्त्रियाँ भी सम्मिलित रही हैं बल्कि वे भी सम्मिलित रहे हैं जिन्हें आपने दलित, अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति कहकर शेष समाज से भिन्न दिखाने के भरसक प्रयास किये । यदि वैदिक काल में भी आरक्षण की व्यवस्था रही होती तो हम “ब्राह्मणेतर ऋषियों” और “स्त्री ऋषियों” की बौद्धिक सम्पदा से वंचित हो गये होते । संविधान लिखते समय यह संकल्प क्यों नहीं लिया गया कि भारत के प्राचीन आदर्श राजाओं के राज्यों में प्रचलित रहे संविधानों के अनुरूप भारत का पुनरुद्धार किया जायेगा ! यदि ऐसा किया गया होता तो आज कोई अनुसूचित जाति, जनजाति या दलित नहीं होता बल्कि हर कोई केवल भारत का नागरिक होता और हर किसी को एकसमान विकास के अवसर मिलते । जब हम किसी व्यक्ति को विशेष सुविधा देते हैं तो किसी दूसरे व्यक्ति के सामान्य अधिकारों की हत्या कर रहे होते हैं । ध्यान रखिये! मुस्लिम समाज भी अनुसूचित जाति, जनजाति, दलित, अस्पर्श्य, पिछड़ा और उच्च वर्ग की परम्पराओं से मुक्त नहीं हो सका है; वहाँ भंगी है और सैय्यद भी ।

जब आपने हमें मनुवादी कहते हुये अपने पूर्वजों की प्रशस्त परम्पराओं का उपहास किया, उनकी जीवनशैली और आदर्शों को तिलांजलि दे दी, ऋषियों द्वारा संकलित वैदिक विज्ञान का तिरस्कार करते हुये वेदों को घृणापूर्वक अपने पैरों तले रौंदा और उन्हें जलाया तब आप भारत के समाज को खण्डित कर रहे थे, आप वर्गभेद के बीज बो रहे थे, आपके आंदोलन उन बीजों को पोषण प्रदान कर रहे थे और आप स्वयं को प्रगतिवादी घोषित कर रहे थे ।

प्रगतिशील और उदारवादी समुदाय के लोग संविधान और न्यायालयों की उतनी ही बातें मानते हैं जितने से उनकी स्वेच्छाचारिता का पोषण हो सकता है । वे संविधान के उन हिस्सों और न्यायालयों के उन निर्णयों को नहीं मानते जिनसे अन्य लोगों को भी जीने का अधिकार मिलता है । यही भारतीय साम्यवाद है जो इस्लामवाद का ही एक अन्य सुरक्षित रूप है ।

हिज़ाब ज़िहाद का हिसाब कब

दुनिया के सभी धर्म अपने विशिष्ट धार्मिक प्रतीकों से अपने पृथक धर्म की पहचान की घोषणा करते हैं । धार्मिक गुरुओं को छोड़ दें तो कुछ लोग धार्मिक कर्मकाण्ड के अवसरों पर ही अपनी धार्मिक पहचान का प्रदर्शन करते हैं जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो देश-काल-वातावरण की उपेक्षा करते हुये सदा ही अपनी धार्मिक पहचान को भीड़ से अलग करने की घोषणा को आवश्यक मानते हैं; ऐसा तभी होता है जब हम अपने धर्म के विस्तार के अभियान का स्वयं एक हिस्सा बनते हैं । आधुनिक विद्यालय धार्मिक कर्मकाण्ड के स्थान नहीं होते इसलिये वहाँ आपकी पहचान एक छात्रा के रूप में ही क्यों नहीं होनी चाहिये? विद्यालयों में समानता के लिये एक सामान्य परिधान (यूनीफ़ॉर्म) की व्यवस्था की गयी किंतु कुछ लोगों ने यहाँ भी अपनी धार्मिक पहचान को भीड़ से अलग प्रदर्शित करने के लिये हिज़ाब को ज़रूरी बना लिया ।

कोई भी विशिष्टता सामान्य से पृथकता की घोषणा करती है । विद्यालय धार्मिक कर्मकाण्ड के केंद्र नहीं हैं जहाँ हिज़ाब पहनकर आने के लिये इतनी ज़िद की जाय । विद्यालय में हिज़ाब पहनकर आना “जीने की आज़ादी” और व्यक्तिगत पसंद” का विषय नहीं बल्कि आपके उस अभियान का एक हिस्सा है जो भारत पर अपने प्रभुत्व के लिये निरंतर प्रयत्नशील है ।

विद्यालय में हिज़ाब पहनकर आने के समर्थन में अल्ला-हू-अकबर का नारा लगाने वाली कर्नाटक की हिज़ाबी छात्रा मुस्कान ख़ान को एक इस्लामिक संगठन ने पाँच लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है । क्या यह स्वेच्छाचारिता को प्रोत्साहित करना नहीं है?

ऐसे हर अवसर पर ढाल और विष बुझे नेजे लेकर इस्लामिक अधिकारों की रक्षा के लिये प्रस्तुत हो जाने वाली दीक्षा जोशी एक बार फिर अपने यू-ट्यूब पर प्रकट हुयीं हैं । वे विद्यालय में हिज़ाब के विरोध को मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता और निजता पर हिन्दुओं का प्रहार मानती हैं । हर बात में हिन्दुओं को अपराधी और आतंकवादी आरोपित करने वाली दीक्षा जोशी भारत के विभिन्न शहरों में “पाकिस्तान ज़िंदाबादऔर “हिन्दुओं को कहीं पनाह लेने के लायक भी नहीं छोड़ेंगे” जैसे नारे लगाने वाली उत्तेजित भीड़ के कृत्यों पर कभी कुछ सोचने की भी आवश्यकता नहीं समझतीं ।

हिज़ाबी चर्चे गली-गली

अपनी धार्मिक पहचान के प्रदर्शन के लिये अपनी व्यक्तिगत पहचान की कुर्बानी देने वाली मुस्लिम लड़कियों के जज़्बे की तारीफ़ तो बनती है । यह वो फ़िलॉसफ़ी है जिसकी, हिन्दू बात तो करते हैं किंतु कभी अपने जीवन में आचरित नहीं करते । माण्ड्या के एक कॉलेज में एक लड़की ने हिज़ाब पहनकर विद्यालय आने के हठ के समर्थन में अल्ला-हू-अकबर का नारा लगाया और संयोग से दो लड़कियाँ चर्चित हो गयीं ।

कुछ लोगों का दावा है कि वे हिज़ाब वाली लड़की को जानते हैं । किसी ने उसे मुस्कान ख़ान बताया तो किसी ने नजमा नज़ीर चिक्कनराले के रूप में उसकी पहचान बतायी जो राष्ट्रीय जनता दल की एक सक्रिय सदस्य है । नजमा नज़ीर के कई चित्र सोशल मीडिया पर वायरल हुये हैं । नजमा नज़ीर भी कोई सामान्य छात्रा नहीं है । वह पहले भी कर्नाटक के विभिन्न शहरों में एनआरसी, सीएए और एनपीआर के विरोध में भाषण देती रही है । फ़ेसबुक पर उमर ख़ालिद, कन्हैया और शेहला रशीद आदि के साथ उसके फ़ोटो देखे जा सकते हैं । फ़ेसबुक पर उसके फ़ॉलोअर्स की भीड़ है जिसमें से कुछ प्रशंसकों ने नजमा नज़ीर फ़ैंस क्लबभी बनाया हुआ है ।

फ़िलहाल अभी तक यह तय नहीं है कि हिज़ाब वाली लड़की है कौन! कोई हिज़ाब में हो तो उसे कैसे पहचाना जा सकता है? जो भी हो, हिज़ाब गर्ल के नाम से मुस्कान ख़ान और नजमा नज़ीर दोनों की चर्चायें जोरों पर हैं, उधर कर्नाटक के अनहटी टाउन में मुसलमानों की एक भीड़ ने हिज़ाबी छात्रा के समर्थन में पुलिस पर पथराव किया जिसके बाद कर्नाटक के विद्यालयों और महाविद्यालयों को तीन दिन के लिये बंद कर दिया गया है ।

भारत में हिज़ाब के लिये पथराव हो सकता है, किंतु धोती-कुर्ता और भगवा की बात करना भी पाप माना जाता है, यूँ भगवा के समर्थन के लिये कभी कोई आंदोलन होगा इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं लगती । आख़िर भगवा और हिन्दुत्व विरोधी दीक्षा जोशी जैसी लड़कियों का सामना करने का साहस कितने लोगों में है! 

ध्यान रखिये, सीताहरण के लिये रावण को भी साधु होने का छल करना ही पड़ता है । जो लोग न्याय-अन्याय, समानता-असमानता, प्रगतिवाद और उदारवाद के चोले में साधु होने का स्वांग कर रहे हैं वे ही समाज के सबसे बड़े शत्रु हैं, फिर वह समाज भारत का हो या फ़्रांस और ज़र्मनी का ।

हिन्दू दूसरी श्रेणी के नागरिक हो कर रह गये

                स्वतंत्रता प्राप्ति और भारत विभाजन के बाद कुछ हिन्दुओं का विश्वास था कि अब हिन्दू भी रोज-रोज की खट-खट से मुक्त होकर स्वाभिमान के साथ जी सकेंगे । हिन्दुओं का यह विश्वास बारम्बार खण्डित होता रहा । पहले हिंसावादियों ने खुलकर हिंसा की फिर तत्काल ही अ-हिंसावादियों ने पूरे महाराष्ट्र में हिंसा की । पचहत्तर साल बीत गये, समय के साथ-साथ हिन्दुओं का विश्वास निराशा की ऊँची प्राचीरों से घिरता चला गया ।

नेपथ्य में बहुत से लोग हैं जो या तो भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के संकल्प पर आगे बढ़ते जा रहे लोगों का हर तरह से सहयोग कर रहे हैं या फिर मौन रहकर उनकी गतिविधियों का समर्थन कर रहे हैं । कुछ रावण भी हैं जो साधु के वेश में हर पल सीता का अपहरण कर रहे हैं । 

एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री परमपूज्य मनमोहन सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है किंतु कभी कुछ न समझने के लिये दृढ़प्रतिज्ञ हिन्दू ने इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया । परमपूज्य प्रातःस्मरणीय मुलायम सिंह जी ने कारसेवकों को गोलियों से भुनवा डाला, हिन्दू ने इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया । सरकारी और सार्वजनिक सम्पत्तियों के साथ-साथ मंदिरों पर पहले चुपके से और अब खुले आम इस्लामिक कब्जे होते जा रहे हैं, हिन्दू ने इसे भी अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया है । तमिलनाडु की सरकार सैकड़ों साल पुराने मंदिरों को ढहा रही है । मंदिरों पर आये दिन होने वाले निर्विरोध इस्लामिक कब्ज़ों के बाद एक दिन यह देश इस्लामिक देश बन जायेगा, इसे भी भारत के हिन्दू अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेंगे । ऐसा तब होता है जब सरकारें अपने देश के नागरिकों के साथ पक्षपात करती हैं और कोई एक वर्ग स्वयं को पूरी तरह असुरक्षित और अनाथ अनुभव करने लगता है । स्वतंत्रता के इन पचहत्तर वर्षों में हिन्दुओं को यह लगातार अनुभव कराया जाता रहा है कि वे भारत के दूसरी श्रेणी के नागरिक हैं । कोई भी सरकार, अभी तक भारत के हिन्दुओं को स्वाभिमान के साथ जीने का अवसर उपलब्ध करवा सकने की सच्ची इच्छा शक्ति का प्रदर्शन कर पाने में असफल रही है । वसीम रिज़वी जेल में हैं और हिन्दुओं को भारत से काट कर फेक देने की सैकड़ों घोषणायें करने वाले मुल्ले-मौलवी-नेता अपने अभियान को आगे बढ़ाते जा रहे हैं । दीक्षा जोशी, रविश कुमार, कन्हैया, महबूबा, ओवेसी, कपिल सिब्बल, अखिलेश ....आदि को यह सब बिल्कुल भी पक्षपात नहीं लगता ।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

“होने” और “हो न पाने” के बीच

            उसने कलम उठायी और अपने नाम के साथ तोमर लिखकर अपने उपनाम का कायाकल्प कर दिया । किसी ने चौहान या परमार लिखकर, तो किसी ने चतुर्वेदी, तिवारी, पांडे, पाठक, जोशी, व्यास, दुबे ...आदि लिखकर अपने पूर्व उपनामों का कायाकल्प कर दिया ।

वे तोमर या तिवारी ...आदि तो होना चाहते हैं ...हो भी गये हैं किंतु वे कभी क्षत्रिय या ब्राह्मण नहीं होना चाहते । क्षत्रिय या ब्राह्मण होना बहुत ही घाटे का सौदा है । सहकर्मियों को कुछ भी पता नहीं होता कि कोई क्या है और क्या होना चाहकर भी हो नहीं पा रहा है । सच तो यह है कि बाहर से किसी को कुछ भी पता नहीं होता कि कौन क्या है, अंदर की बात तो केवल सर्विस-बुक को ही पता होती है ।

भारतीय समाज होनेऔर हो न पानेके बीच थोड़ी सी कुण्ठा और थोड़े से गर्व के साथ एक पग आगे चलता है और फिर तीन पग पीछे की ओर लौट जाता है । वह जो है उसके होने में उसे लज्जा आती है, और जो वह नहीं है उसका आवरण ओढ़कर भी उससे संतुष्ट नहीं हो पाता ।

 दलित हो पाना

विधिशास्त्र में स्नातक, वाणिज्य प्रशासन और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर और पीएच.डी. करने के बाद भी वह दलित है । कैबिनेट मंत्री और सदन में विपक्षी दल का नेता रहते समय भी वह दलित ही रहा । और आज एक प्रांत का मुख्य मंत्री रहने के बाद भी वह दलित ही है ।

उसने संगीत का प्रशिक्षण लिया और मंच पर गीत गाने लगा...फिर भी वह दलित ही बना रहा, अ-दलित नहीं हो सका ।

वह व्यवसायी है और राजनेता भी, उसकी पत्नी डॉक्टर है और आत्मनिर्भर भी ...फिर भी वह दलित है ।

साल 2017 में उसने शपथ लेकर देश की प्रजा को बताया कि वह 14.51 करोड़ की सम्पत्ति का स्वामी है ...फिर भी वह दलित है ।

वह पगड़ी पहनता है और एक सिख जैसा दिखायी देता है ...फिर भी वह दलित है ।

कैबिनेट मंत्री रहते हुये उसने एक ज्योतिषी के परामर्श से अपने प्रासाद के सामने के पार्क से होते हुये एक अवैध सड़क का निर्माण करवा दिया अर्थात उसकी शक्तियाँ वैध-अवैध की सीमाओं से परे हैं ...फिर भी वह दलित है । 

हम उसे एक उच्च शिक्षित सिख समझते रहे जो व्यवसायी होने के साथ-साथ एक सुस्थापित राजनेता भी है किंतु अचानक एक दिन पता लगा कि वह दलित है ।

हम पूरी गम्भीरता से खोज रहे हैं कि वह कहाँ से दलित है ...कितना दलित है ...कब तक दलित बना रहेगा और उसके दलित्व की कोटि क्या है ? मेरी खोज पूरी नहीं हो पा रही है, …सच कहूँ तो खोज का प्रारम्भिक सूत्र ही पकड़ में नहीं आ रहा है ।

यदि दलित शब्द के अर्थ को एक ओर सरका कर देखें तो सचमुच दलित होना एक सौभाग्य की बात है, और इसीलिये अब मैं भी एक दलित होना चाहता हूँ । कितना अच्छा होता यदि पूरा देश ही दलित हो पाता, बल्कि रोमानिया और लॉस एंजेलेस के लोग भी दलित हो पाते । मुझे रोमानिया की उन बारह साल की किशोर होती बच्चियों और लॉस एंजेलेस की लड़कियों के लिये बहुत दुःख होता है जिनकी देह को यौनव्यापार की फ़ैक्ट्री बना दिया जाता है । काश! पूरी दुनिया के लोग दलित हो पाते!

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की योद्धा तवायफ़ों की अनकही कहानियाँ

          अपनी हस्ती मिटाकर

मिल गयी मिट्टी में

वो मिट्टी भी

जो हँसती थी कभी

बोलती थी कभी  

वो मिट्टी न होती

तो ये ताज न होता तेरे सर पे ।

नाम न पूछ

इतिहास में चिंगारियों के नाम नहीं लिखता कोई

कागज जल उठेंगे ।

 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दो हिस्सों में देखा जाता है, एक वह जो ईस्ट-इण्डिया कम्पनी सरकार के विरुद्ध राजाओं, नवाबों और विद्रोही सिपाहियों द्वारा लड़ा गया और दूसरा वह जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध राजाओं और नवाबों के अतिरिक्त आम हिंदुस्तानियों और क्रांतिकारियों द्वारा भी लड़ा गया । हम इसे दो हिस्सों में बाँटे जाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि हर हाल में यह सारी उठा-पटक अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही थी चाहे वह कम्पनी हो या फिर ब्रिटिश सत्ता । यदि 1857 में ईस्ट इण्डिया के ख़िलाफ़ बगावत न हुयी होती तो शायद हम आज भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ग़ुलाम होते । आज हम जिस भी स्थिति में हैं उसके लिये बदलाव की उस आँधी को समग्र रूप में देखना होगा जो अंग्रेज़ी अत्याचारों के ख़िलाफ़ चलती रही ।

“घरों पर तबाही पड़ी सहर में, खुदे मेरे बाज़ार, हज़रत महल ।

तू ही बाइस-ए-ऐशो आराम है ग़रीबों की ग़मख़्वार, हज़रत महल”।

सन् 1856 में कलकत्ता रवाना होने से पहले नवाब वाज़िद अली शाह ने बड़ी हसरत और गहरे दर्द के साथ लख़नऊ का दारोमदार हज़रत महल के हवाले किया और रवाना हो गये । तलवार सत्ता को हासिल करती है और धन अवाम पर हुकूमत करता है । ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास तलवार भी थी और पैसा भी, उसके मुकाबले तत्कालीन भारत की कुल 579 रियासतों में से मात्र इक्कीस रियासतों के पास पैसा तो था लेकिन उस पैसे की हिफ़ाज़त करने की ताकत नहीं थी । लालची और धूर्त अंग्रेज़ों ने अवसर का लाभ उठाया और भारत में व्यापार करने वाली ब्रिटेन की व्यापारिक कम्पनी एक-एक कर भारतीय रियासतें हड़पने में लग गयी ।  अंग्रेज़ों का अत्याचार बढ़ने लगा तो हिंदुस्तान की अवाम अंदर ही अंदर बगावती होने लगी । कुछ राजा-रजवाड़े और नवाब तो अंग्रेज़ों के आगे अपना ज़मीर बेचने में लगे थे तो बहुत से ऐसे भी थे जो भीतर ही भीतर अंग्रेज़ों से लोहा लेने के लिये जंगी तैयारियाँ कर रहे थे । मातंगिनी हाजरा और बेगम हज़रत महल जैसी स्त्रियों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया, वह बात अलग है कि उन्हें सफलता की जगह पर सिर्फ़ तबाही ही तबाही मिली ।

धीरे-धीरे, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चपेट में आ चुके हिंदुस्तान के बहुतेरे भाग में कम्पनी सरकार के ख़िलाफ़ अवाम का गुस्सा बेकाबू होने लगा । एक समय वह भी आया जब समाज की तिरस्कृत समझे जाने वाली तवायफ़ों ने भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया । इतिहास में इनका कहीं कोई नाम नहीं है, यहाँ तक कि लोकगीतों में भी इन्हें कोई स्थान नहीं मिल सका । तवायफ़ों के अतिरिक्त भटियारिनों और सरायवालियों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में जो किया वह भुलाया नहीं जाना चाहिये । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारत की यह वो परित्यक्त मिट्टी थी जिसकी ख़ुश्बू ने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं के लिये गुप्त मार्ग खोल दिये थे । क्रांति में सहायक बने बहुत से लोग ऐसे भी रहे हैं जिनकी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के बाद भी इतिहास में उनकी कहीं कोई चर्चा नहीं होती । गन्ने के खेत में छिपे क्रांतिकारियों को चुपचाप भोजन-पानी पहुँचाने, भागने के लिये यथाशक्ति धन उपलब्ध करवाने, उन्हें अंग्रेज़ी गतिविधियों की गुप्त सूचना देने वाले... अनजान ग्रामीणों में गाँवों के वृद्धजनों और बच्चों की कहीं कोई गणना नहीं है, किंतु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ये वो कड़ियाँ थीं जिन्होंने क्रांति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी ।    

कला और तहज़ीब की परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ले जाने वाली तवायफ़ों के कोठों पर हर कोई आया करता थाक्रांतिकारी, सेनानी, अमीर, उमरे, ज़मींदार, नवाब और यहाँ तक कि अंग्रेज़ भी । शुरुआती दिनों में कोठे और सराय क्रांतिकारियों के लिये निरापद स्थान हुआ करते थे किंतु बाद में राज खुल जाने पर अंग्रेज़ों की वक्रदृष्टि से वेश्यायें, भटियारिनें और सरायवालियाँ भी बच नहीं सकीं । क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों, सूचनाओं के आदान-प्रदान और जासूसी के अतिरिक्त इस वर्ग ने आर्थिक रूप से भी न केवल क्रांतिकारियों बल्कि गांधी के अवज्ञा आंदोलन में भी अपनी महत्वपूर्ण आहुतियाँ डाली थीं । कानपुर, लख़नऊ, बनारस, बलिया, मुज़फ़्फ़रनगर और मुर्शिदाबाद की तवायफ़ें आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हुआ करती थीं, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नफ़रत ने उन्हें अपना सब कुछ देश के लिये न्योछावर कर देने के लिये उत्साहित कर दिया था । अंग्रेज़ों को जब पता चला तो उन्होंने कई तवायफ़ों और सरायवालियों को बंदी बनाकर उन पर शारीरिक यातनाओं का कहर ढाना शुरू कर दिया और उनकी सम्पत्तियाँ ज़ब्त कर लीं । उन्हें तबाह कर दिया गया उनमें से कई तो दाने-दाने को मोहताज होने लगीं, फिर भी उनके उत्साह और देशप्रेम में जरा भी कमी नहीं आयी और उन्होंने हर हाल में क्रांति की अलख को जलाये रखा ।

कानपुर के जिन लोगों ने शहर की तवायफ़ अज़ीज़नबाई को मर्दाना लिबास में पिस्तौल के साथ घोड़े पर देखा वही अपनी माटी के प्रति उसकी सरफ़रोशी का ऋणी हो गया । वह जासूस थी, ख़बरी थी और स्वतंत्रता सेनानी भी । अज़ीज़नबाई की तारीफ़ में किसी ने कहा– “तेरे यलगार में तामीर थी तखरीब न थी, तेरे ईसार में तरग़ीब थी तादीब न थी”।

बनारस की हुस्ना बाई ने तो बाकायदा एक तवायफ़ सभा बनाकर विदेशी सामानों का बहिष्कार किया और गहनों के स्थान पर लोहे की कड़ियाँ पहनने का आह्वान किया । तवायफ़ों ने भारत के लिये जो किया उसके लिये हर भारतीय उनके बलिदान और त्याग का कर्ज़दार है ।

यह किस्सा है कानपुर की हुसैनी ख़ानम बेगम का जो नाना साहब की रखैल हुआ करती थीं । तारीख़ थी14 मई और साल था 1857 का जब दोपहर के वक़्त कम्पनी सरकार के अधिकारी क्रांतिकारियों के डर से अपने-अपने परिवार के साथ गंगा के रास्ते नाव से इलाहाबाद भागने की तैयारी में थे । नाना साहब के साथी भी आसपास ही थे, तभी कम्पनी के कुछ अधिकारियों ने क्रांतिकारियों पर गोली चला दी जिससे क्रांतिकारी बेकाबू हो गये और उन्होंने नावों पर हमला कर दिया । क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों की स्त्रियों और बच्चों को अलग करके मर्दों को गोली मार दी । बाद में नानाराव के आदेश से उन सभी स्त्रियों और बच्चों को बीबीघर भेज दिया गया जो कम्पनी अधिकारियों की अय्याशगाह हुआ करती थी और जहाँ उनकी ख़िदमत में भारतीय लड़कियों को परोसा जाता था । नाना ने उनकी सुरक्षा के लिये हुसैनी खानम बेगम और कुछ सुरक्षा कर्मियों को तैनात कर दिया । नाना की यह इंसानियत उनके किसी काम नहीं आयी । बीबीघर की अंग्रेज़ स्त्रियों ने कम्पनी सरकार के लिये जासूसी शुरू कर दी और इलाहाबाद सूचनायें पहुँचाने लगीं । ज़ल्दी ही अहसानफ़रामोश अंग्रेज़ों ने कानपुर को चारो ओर से घेरना शुरू कर दिया जिससे क्रोधित होकर तात्या टोपे ने बीबीघर की स्त्रियों और बच्चों को मार देने का संदेश भिजवाया । नाना और उनके क्रांतिकारी साथियों ने तात्या के इस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया । तब हुसैनी ख़ानम बेगम ने अपने आशिक सरवर ख़ान की मदद ली जो दो मुसलमान कसाइयों और दो अन्य हिन्दुओं को लेकर आया जिनमें से एक की पहचान सौराचंद के रूप में हुयी । इन लोगों ने 15 जुलाई1857 को बीबीघर की कुल 73 अंग्रेज़ स्त्रियों और उनके 125 बच्चों को तलवार से काट डाला । सुबह उनकी लाशें बीबीघर के बड़े कुएँ में फेक दी गयीं । कानपुर में जिस समय यह सब हो रहा था उसी समय फ़तेहगढ़ में कम्पनी सरकार के सैनिक भारतीय क्रांतिकारियों के ज़िंदा ज़िस्मों में आग लगाकर उन्हें हवा में उछाल रहे थे और उनकी चीखों पर ज़श्न मना रहे थे ।  

बीबीघर नरसंहार के बाद अंग्रेज़ों ने कानपुर के आसपास के कई गाँवों में आग लगा दी और नानाराव पार्क में बरगद के पेड़ पर135 क्रांतिकारियों को एक साथ फाँसी पर लटका दिया । कानपुर की ही एक और तवायफ़ होस्सैनी बाई इस नरसंहार की मुख्य योजनाकारों में से एक थीं ।

कानपुर विद्रोह के बाद कम्पनी ने कानपुर और उसके आसपास के गाँवों में आगजनी और कत्लेआम किया जिसमें छह हजार लोग मारे गये और कई क्रांतिक्कारियों को फाँसी दी गयी । कम्पनी के अधिकारी ब्राम्हणों को पकड़-पकड़ कर पहले तो उन्हें बीबीघर की फ़र्श पर पड़े ख़ून को जीभ से चाटकर साफ़ करवाते और फिर उनकी हत्या कर देते । 31 जुलाई 1857 को एक और घटना हुयी, कम्पनी अधिकारियों के हुक्म से मुस्लिम क्रांतिकारियों के मुँह में ज़बरन सुअर का और हिन्दू क्रांतिकारियों के मुँह में गाय का माँस ठूसा गया फिर उनकी हत्या कर दी गयी । कम्पनी के अधिकारी ने कहा कि हम तुम्हें मरने के बाद भी स्वर्ग का हकदार नहीं बनने देंगे ।

           यह तो छोड़िये, 15 अगस्त सन् 1947 को जबकि भारत को आज़ाद कर दिया गया था, सुबह सतना के आज़ाद मैदान में जब उपस्थित भीड़ में से कोई राष्ट्रगीत गाने के लिये तैयार नहीं हुआ तो वहाँ की तवायफ़ पंखुड़ीजान ने ही आगे बढ़कर बंकिमचंद्र के लिखे गीत को गाने का साहस किया ।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

मोतीहारी वाले मिसिर जी की चार बकबक

 १-   

कविता लिखा कर

      

सो जा मोहन प्यारे!

जागा मत कर

सोये-सोये कविता लिखा कर ।

गीतकार है

तो प्रेम के गीत लिख

कोई कितने भी जड़ता रहे तड़ातड़ तमाचे

प्रतिक्रिया मत कर 

खिलखिलाकर हँसा कर 

कविता लिखा कर ।

 

उत्कर्ष के गीत गा

पीड़ा को भूल जा ।

साहित्यकार है न!

तभी तो तेरी सोच निगेटिव है

पॉज़िटिव बन

बकबक मत कर

डाटा सजाया कर 

प्रशंसा के लेख लिखा कर

ऐश किया कर, ज़िंदगी जिया कर

कविता लिखा कर ।

 

तू साहित्यकार है

तो सच क्यों बोलता है बे! 

कल्पना के पर लगाकर

आसमान में उड़ा कर 

तुझे राजनीति से क्या लेना देना!

मुझ से कुछ सीख

कभी सच मत बोल

तोल मोल कर नहीं 

झूठ को सच बनाकर बोल

भाँति भाँति के रूप धरा कर

आइने तोड़

तुमुल को शांति कहा कर

कविता लिखा कर ।

 

२-  

पहला हक

 

आज़ादी तो मिल गयी

बिना खड्ग बिना ढाल

हक नहीं मिला

वह भी दिला दे बाबा 

बिना खड्ग बिना ढाल ।

 

मालिक ने दे दिया उन्हें

पहला हक

जिन्होंने किया था ऐलान कि वे

नहीं रह सकते

साथ हमारे ।

ले लिया ओसारा

उन्होंने हमारा

मगर रहते हैं आज भी, साथ हमारे

भूनते हुये होरा छाती पर हमारी

दलते हुये मूँग छाती पर हमारी

नहीं गये वे कहीं भी 

और ले लिये सारे हक

हमारे, हमारे बाप दादों के । 

हमने पूछा

हमारा हक कहाँ है

उन्होंने खींच लीं तलवारें

ख़ामोश! तुझे पता नहीं

काफ़िरों का हक नहीं होता

हमने पूछा – “हम कहाँ रहें?”

उसने कहा जहन्नुम में

और फिर चला दी तलवार ।

मेरे ज़िस्म से फूट पड़ा

ख़ून का फव्वारा

ठीक तभी खिल उठा

उनके ग़ुलदस्ते में

एक और काला ग़ुलाब

गुलाब ने गीत गाया

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...।

 

३-

उसी नम्बर पर

 

सरकार की बात

रिश्वत न दें

रिश्वत की माँग की शिकायत

इस फोन नम्बर और ई मेल पर करें ।

 

बात मान ली हमने

कर दी शिकायत

दो साल हो गये

नहीं मिल पाया समयमान वेतन

बाबू कहता है, ले लो न

उसी नम्बर पर बात करके ।

 

४-

न्योछावर

 

मेरा ड्राइविंग लायसेंस

री-न्यू करवा दे कोई

तो जानूँ

बिना दिये न्योछावर।