गुरुवार, 18 जून 2026

कुप्रथा

 माँग कर रहे हैं लोग

कि सरकार बनाये 

एक विधान ऐसा

कुछ जजिया कर जैसा

कि ब्राह्मणों को ब्याहनी होगी 

अपनी बेटी 

किसी दलित के साथ।

अंबेडकर ने भी तो ब्याही थी 

अपनी बेटी सावित्री

भीमराव सकपाल के साथ

बनाये बिना कोई विधान

और दिया अपना उपनाम

अंबेडकर भी।

कितनी निभी, पता नहीं!

क्या क्रांति हुयी, पता नहीं!

क्या शिक्षा मिली, पता नहीं!

बाध्यकारी विधान बनेगा 

तो कदाचित्

भारत विश्वगुरु बनेगा

और कार्यकारी होगा यह विधान

पूरे विश्व में।

बन गया विधान 

तब एक दिन

महेश मणि के घर आई

एक नन्हीं परी

घर-परिवार डूबा 

मनाने उत्सव

फिर उसी रात्रि 

गला दबा दिया महेश मणि ने

नन्हीं परी का। 

सब अचंभित!

ऐसा क्यों किया महेश मणि ने!

प्रश्नों का अंत नहीं।

न्यायालय में बताया

महेश मणि ने

अब मेरी कोई बेटी 

नहीं ब्याही जाएगी 

किसी दलित के साथ।

समय चलता रहा

फिर...

यह परंपरा बन गयी

एक नई कुप्रथा

तो दलितों ने कहा

ब्राह्मण होते हैं 

स्त्री विरोधी

जन्म से हत्यारे        

राक्षस

नरपिशाच...                            

इन्हें नहीं मिलना चाहिए               

जीने का अधिकार।

होना ही चाहिए इनका

"सर तन से जुदा"

जब मिलें 

तभी

जहाँ दिखाई दे जाएँ

वहीं। 


निर्बल का विवश समाधान

जब बनती है कुप्रथा

तब भी 

मौन रहते हैं

राजसिंहासन

उनसे नहीं पूछा जाना चाहिए

कोई प्रश्न।

बस

तुम बने रहो

विनम्र सेवक

राजसिंहासन के

कुचलकर अपनी आत्मा।



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