शनिवार, 13 जून 2026

युगपरिवर्तन

सतयुगी लोग सत्य के अधिक समीप हुआ करते थे इसलिए अधिक सुखी थे। कालांतर में जब धर्म का एक स्तंभ ध्वस्त हुआ तो सतयुग समाप्त हुआ। त्रेतायुग में धर्म का और भी क्षरण हुआ जिसने द्वापर को आमंत्रित किया। द्वापर में धर्म के तीन स्तंभों का पतन हुआ तो कलियुग को संसार की सत्ता प्राप्त हुयी। अब कलियुग धर्म के शेष रहे एकमात्र स्तंभ पर डोल रहा है। जिस दिन इस अंतिम स्तंभ का पतन होगा तब..., तब क्या होगा! यह भौतिक विज्ञान और तत्वदर्शन का विषय है, इस पर फिर कभी चर्चा होगी।

त्रेतायुग में टिश्यू कल्चर, आई.वी.एफ़, जेनेटिक स्टडी, कैटारेक्ट की शल्यक्रिया और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अनेक उपलब्धियाँ अविश्वसनीय सी लगती हैं, पर सत्य हैं। वहीं त्रेतायुग और कलियुग में राक्षसों के उत्पात, वैज्ञानिकों की तप-साधना में विघ्न, नरमांस भक्षण, नारी अपहरण और यौनोत्पीड़न जैसी कुछ नकारात्मक घटनाओं को लेकर अद्भुत समानतायें पढ़ने को मिलती हैं।
आज हमें एपस्टीन फ़ाइल की पैशाचिक घटनायें और विश्वस्तरीय आभिजात्य वर्ग के लोगों की उसमें संलिप्तता व्यथित करती है।
ऐसी न्यूनाधिक घटनायें सभी कालखंडों में होती रही हैं। तब अंतर क्या है इन युगों में! यह एक विचारणीय विषय होना चाहिए।
अंतर है अन्याय का समर्थन और प्रतिकार करने वालों एवं संस्कार विरोधियों और अपसंस्कृति के शोधन के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के अनुपात में ह्रास या वृद्धि।
त्रेत्रायुग से लेकर इस युग तक उत्कृष्टता के क्षरण और निकृष्टता के उत्कर्ष में निरंतर वृद्धि देखी गयी है।
एक अंतर और भी है, कलियुग में प्रवंचकों की भीड़ है जिसमें आम जनता से लेकर राजनेताओं, अभिनेताओं, संतों और वैज्ञानिकों में आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा है।
विषाणु आयुधों के निर्माता कौन हैं! मिथ्या और भ्रामक शोधपत्र प्रकाशित करवाने वाले शोधकर्ता और वैज्ञानिक कौन हैं! खाद्य और पेय पदार्थों में मिलावट के व्यापार में सम्मिलित लोग कौन हैं! इतिहास और विज्ञान की कूटरचित व्याख्यायें करने वाले लोग कौन हैं! देश के टुकड़े-टुकड़े करने की प्रतिज्ञा करने वाले लोग कौन हैं!
कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है ऋत में अनृत और अनृत में ऋत की प्रतीति। यह प्रतीति तक ही सीमित नहीं, यह हठ की पराकाष्ठा को स्पर्श करने की उद्दंड घोषणा भी है जो सत्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.