वर्षों पहले यूरोप में एक सोशियोपोलिटिकल तूफान आया जिसने मानव व्यवहार के अन्य सभी क्षेत्रों से धर्म के हस्तक्षेप को समाप्त कर दिया। चर्चों से सारे अधिकार छीन कर उन्हें पंगु बना दिया गया। यह आँधी पूरे विश्व में एक फैशन बन गयी तो भारत भी अछूता कैसे रहता जबकि भारत में यूरोप जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं। तत्कालीन यूरोप के चर्च अत्याचार और भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे ! इसलिये वहाँ एक धार्मिक परिवर्तन की आवश्यकता थी किंतु भारत में तो इस्लामिक और फिर ब्रिटिश शासन था, यहाँ सनातन धर्म जनता तक ही सीमित रहा। मनुस्मृति का स्वर्णिम युग तो छठी शताब्दी के अंत तक पूरी तरह समाप्त हो चुका था। पर यूरोप का अनुसरण करते हुये यहाँ भी धर्म का शिकार किया गया वह भी केवल सनातन धर्म का। परिणामस्वरूप भारत में भी धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित कर दिया गया। धर्म का राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग... आदि जीवन के सभी क्षेत्रों से अंकुश समाप्त कर दिया गया। धर्म का स्थान नेतावाणी ने ले लिया। भारतीयों के जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नेतावाणी का अंकुश और हस्तक्षेप नहीं है।
भारत के राजनेता सत्ता पाते ही तत्क्षण न केवल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ हो जाते हैं अपितु अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक, परमाणु विशेषज्ञ, गणितज्ञ, कलाकार, संगीतज्ञ अध्यात्मविशेषज्ञ, योगाचार्य आदि सब कुछ हो जाते हैं।आज भारत का राजनेता बताता है कि हमें अपनी बच्चियों को एंटी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का टीका लगवाना चाहिए जिससे उन्हें गर्भाशय के कैंसर से बचाया जा सके।
मैं समझ नहीं पाता हूँ कि वायरोलाॅजी और इम्यूनोलाॅजी पढ़ने वाले डाक्टर भी वैक्सीनेशन का समर्थन करने के लिए अपनी चेतना की हत्या करने के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? मैं अपने सभी डाॅक्टर्स से निवेदन करूँगा कि वे इन दोनों विषयों का पुनः अध्ययन करें और माइक्रोब्स के वैरिएशन्स की प्रक्रिया में वैक्सीनेशन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने का प्रयास करें। आप लोगों ने एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध दुरुपयोग करके लोगों को रजिस्टेंट कर दिया है, डायक्लोफीनेक का दुरुपयोग करके गिद्धों को समाप्त कर दिया है। सावधान!स्मरण रहे कि आप स्वास्थ्य रक्षक हैं, रोगवर्द्धक नहीं। अपने चिकित्सक धर्म की उपेक्षा से आप पूरी मनुष्य प्रजाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकते हैं।
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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.