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बुधवार, 25 मार्च 2026

मणिपुर डायरी

सहृदयता का दण्ड

आदिवासियों का धर्मांतरण भारत की एक गंभीर समस्या रही है। यह सेवन सिस्टर्स की ही नहीं, असम, झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी ऐसी समस्या है जिसके सामने सरकारें तो नतमस्तक होती ही रही हैं, वे लोग भी नतमस्तक हुये हैं जो धर्मांतरण को अभी तक राष्ट्रांतरण मानते रहे हैं। विगत वर्षों में मणिपुर के आदिवासियों और धर्मांतरित हुये ईसाइयों के बीच हुए रक्तसंघर्ष ने देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 
धर्मांतरण की घटनाओं से व्यथित फ़िल्म निर्देशक सुजल मिश्र के मन में इस विषय को लेकर एक फ़िल्म बनाने का विचार तो पहले से ही था पर जब उन्होंने कुंभ मेले में माला बेचने वाली मोनालिसा को देखा तो उनके मन में स्लम डाॅग के पात्र झिलमिलाने लगे। बस, उन्होंने तय कर लिया कि उनकी नई फ़िल्म "डायरी आफ़ मणिपुर" की नायिका यही लड़की होगी। यह इतना सरल नहीं था, एक तो अशिक्षित ऊपर से भाषा और संवाद में कच्ची मोनालिसा को फ़िल्म के अनुरूप प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी। सुजल को लगा, वे एक अति साधारण लड़की को विशिष्ट बनाने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी उस बंजारा परिवार ने कभी नहीं की होगी। बस सुजल यहीं धोखा गये।
मोनालिसा की नई पारी फ़िल्म अभिनय ही नहीं बोली और भाषा जैसे प्रारंभिक बिंदुओं से भी प्रारंभ हुयी। सुजल को पल-पल चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
अंततः फ़िल्म पूरी हुयी तो सुजल उसका प्रमोशन उसी स्थान से करने के इच्छुक थे जहाँ से उन्होंने मोनालिसा को फ़िल्म के लिए लिया था। किंतु प्रयागराज प्रशासन ने निर्जन हो चुके संगम पर मात्र पंद्रह-बीस लोगों के एक दल को भी इसकी अनुमति नहीं दी। दूसरी ओर मोनालिसा भी बिना बताये ब्याह रचाने अपने प्रेमी के साथ केरल चली गयी। फ़िल्म का प्रमोशन नहीं हो सका। क्या योगी जी के भी राज में धर्मांतरण के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म का यही मूल्यांकन है!
सुजल पर वज्रपात तो तब हुआ जब धर्मांतरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म की नायिका स्वयं लव-जेहाद की शिकार हो गई। यह फ़िल्म के उद्देश्यों के विरुद्ध एक गहरा षड्यंत्र था। माओवादियों की समानान्तर जनतानासरकार की ही तरह एक अन्य समानांतर पटकथा एक ही मंच पर रची जाती रही। भीतर ही भीतर चल रही इस एक और अंतरकथा की लेश भी भनक सुजल को नहीं लग सकी। परिणामतः फ़िल्म प्रमोट होने से पहले ही अंतर्विवादों में फँस गयी।

केरल जाकर अपने प्रेमी से हाई प्रोफ़ाइल निकाह करके मोनालिसा ने ढोल बजाते हुये घोषित कर दिया है कि लव जेहाद एक अच्छी परंपरा है, यह भारतीय समाज में समानता, सांप्रदायिक स्वतंत्रता और भाईचारा स्थापित करने का उत्तम उपाय है इसलिए मणिपुर डायरी का कोई औचित्य नहीं।
मोनालिसा को इसी रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहेगा। यह लव जेहाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनियोजित और बहुत बड़ा षड्यंत्र है।
मोनालिसा! तुम एक साथ दो परस्पर  विपरीत भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से निभाती रहीं। एक में अभिनय करती रहीं, और दूसरी में उसके ठीक विपरीत भूमिका को अपने जीवन के लिए जीती रहीं! मानना पड़ेगा, तुम्हें तो माताहारी होना चाहिए था।

शक्ति जब अनियंत्रित होकर विकृत होती है तो फिर वह किसी के लिए भी पूजनीय नहीं रह जाती, वह अपने परिवेश के साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेती है।

इस बार बाबा भारती नहीं जीत सके, डाकू खड्ग सिंह जीत गया। बंजारिन लड़की के लिए सुजल के मन में उपजी सहृदयता का यही पारितोषिक है!
हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी को पूरी कथा बताई तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धनुषभंग की कथा सुनाते हुये इतना ही कहा - "जब परशुराम को श्रीराम के अवतारी होने का प्रमाण मिल गया और राम ने शरसंधान कर उसका लक्ष्य पूछा तो परशुराम ने उत्तर दिया था - हे प्रभु इस शर से मेरे पाप और पुण्य दोनों को लक्ष्य कर नष्ट कर दीजिए।"
सुजल को अपने कार्यों की श्रेष्ठता और उनके उद्देश्यों पर गर्व की अनुभूति थी। ईश्वर ने मोनालिसा के रुप में आकर सुजल को संदेश दे दिया कि अब परशुराम को पुनः अपने तप में लीन जाना चाहिए"।

रविवार, 27 नवंबर 2022

जड़ें

जिस वृक्ष की जड़ें भारत से निकालकर अरब में लगा दी गयी हों और उन्हें अरबी पोषण दिया जा रहा हो उस पेड़ के पत्ते, पुष्प और फल भारतीय कैसे हो सकते हैं! यह लाख टके का प्रश्न है जिसकी “मिली-जुली संस्कृति” के नाम पर भारत में लगातार उपेक्षा की जाती रही है।“मिली-जुली संस्कृति” इस्लामिक विस्तारवादियों का वह बहाना है जो भारत में अरबी मान्यताओं को स्थापित करने और भारतीय मूल्यों को समाप्त करने के लिए गढ़ा गया है।

शाक्य राजकुमार गौतम ने तो बुद्धत्व के लिए राज्य को त्याग दिया पर उनके अनुयाइयों द्वारा बौद्ध मत की स्थापना और राज्यसंचालन में उसके हस्तक्षेप के बाद से हमारी अपनी जड़ों को निरन्तर काटा जाता रहा है। इस काल में हमारी सनातन जड़ों को सत्ता से पोषण भी नहीं मिल सका, उनके रखवाले स्वयं भी कभी निष्क्रिय तो कभी असहाय होते रहे हैं। किसी संस्कृति के अस्तित्व के लिए उसकी जड़ों को काट देने की राज्याश्रित प्रक्रिया भारत के लिए बहुत बड़े संकट का कारण है। 1947 में सत्ता हस्तांतरण के बाद से ये प्रतिकूल स्थितियाँ और भी विकट होती रही हैं।  

जब तक धर्मांतरण को मतांतरण और भारतीय राष्टृवाद से जोड़ कर नहीं देखा जाएगा तब तक भारत पर असुरक्षा और पराधीनता के घनघोर बादल छाए रहेंगे। जिन्हें *भारतीयराष्ट्रवाद* से चिढ़ है उनके लिए हम इसके स्थान पर *मानवीयराष्ट्रवाद* का विकल्प रखना चाहेंगे।

भारतीय मुसलमान और ईसाई की चिंता मक्का-मदीना और येरुशलयीम को लेकर होती है, अयोध्या, काशी और मथुरा को लेकर नहीं। मोहनभागवत जैसे मानसिक पक्षाघात से पीड़ित लोग भारत के लाखों मंदिरों के इतिहास और उनसे जुड़ी भारतीय परम्पराओं को त्याग देने की बात करने लगे हैं। एक सच्चे भारतीय को इन सभी षड्यंत्रों की गहरायी को समझना होगा। नालंदा जैसे कई विश्वविद्यालयों को जलाकर नष्ट कर देने वाली आसुरी परम्परा के लोगों को संरक्षण देना भारत के सर्वनाश को आमंत्रित करना है। भारतीय संस्कृति को बचाये रखने के लिए भारत को अंगोला, स्लोवाकिया, ट्यूनीशिया, इस्तोनिया और आस्ट्रेलिया की नीति पर चलना ही होगा। इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। जब अंगोला और ट्यूनीशिया जैसे देश असुरत्व को पहचान कर उससे मुक्ति पाने की दिशा में अग्रसर हो चुके हैं तो विश्वगुरु का दम्भ भरने वाले भारत को ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए?  

हम कब तक इस तात्विक सत्य की उपेक्षा करते रहेंगे कि विभिन्न स्थानों और दिशाओं से प्रारंभ होकर एक ही बिंदु और दिशा की ओर होने वाली यात्रायें उन यात्राओं से भिन्न हैं जो एक ही बिंदु और दिशा से प्रारंभ होकर किसी दूसरे बिंदु और दिशा की ओर की जाती हैं। हमें यह झूठ बताया जाता रहा है कि सभी धर्म हमें ईश्वर की ओर ही ले जाते हैं। हम जीवमात्र के कल्याण की दिशा में प्रयत्नशील होते हैं जबकि कुछ लोग हमें देखते ही घात लगाकर मार डालने को अपने जीवन का उद्देश्य बना चुके हैं। हत्या करने वाले और मरने वाले की यात्रा की दिशा और उद्देश्य एकसमान कैसे हो सकते हैं!

सावधान! असुर तो झूठ बोलते रहेंगे, हमें झूठ और सच के अंतर को समझना होगा। 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

सरकारी विद्यालय में धार्मिक घृणा का बीजारोपण


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर उपवास रहने और भगवान में आस्था रखने को दण्डनीय अपराध मानते हुये सरकारी विद्यालय के शिक्षक ने विद्यार्थियों को पीटा 

भारतीय विद्यालयों में हिंदुओं के विरुद्ध धार्मिक घृणा फैलाने के लिये एन.सी.ई.आर.टी. के माध्यम से शिक्षाविदों द्वारा वर्षों से षड्यंत्र किये जाते रहे हैं । इस षड्यंत्र के सुदृढ़ धागे पूरे देश में फैले हुये हैं । ईसाई मिशनरी स्कूलों की छोड़िये, सरकारी विद्यालयों में भी यह सब धड़ल्ले से होता रहा है, अभी भी हो रहा है । हिंदू अन्य धर्मावलम्बियों को उनके धर्म के विरुद्ध कभी कोई आपत्तिजनक शिक्षा नहीं देता किंतु ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही नहीं बल्कि वामपंथी हिंदुओं और दिग्भ्रमित वनवासियों द्वारा भी सनातनधर्म के विरुद्ध घृणा का बीजारोपण विद्यालयों में आज भी किया जा रहा है जबकि जे.एन.यू. वालों को लगता है कि भारत में उन्हें आज़ादी नहीं मिल सकी है जिसे वे छीन कर ले लेंगे ।  

बस्तर सम्भाग के कोण्डागाँव जिले में गिरोला विकासखण्ड के बुंदापारा ग्राम स्थित शासकीय उच्चतर प्राथमिकशाला के शिक्षक श्रीचरण मरकाम ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने और उपवास करने पर छात्रों को पीट दिया । गुरु जी सनातनधर्म के सिद्धांतों, मान्यताओं और परम्पराओं के विरोधी हैं इसलिए छात्रों को भी अपने जैसा ही बना देना चाहते हैं जिसके लिए वे बालमन में धार्मिक-घृणा का बीजारोपण करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । विद्यालय के छात्रों के अनुसार गुरु जी ने ज्ञान प्रदान करते हुये अपने छात्रों को बताया कि “हिंदुओं की गायत्री काल्पनिक है, सरस्वती अशिक्षित है वह किसी को क्या ज्ञान देगी । मैं तुम्हारे भगवान को खूँदूँगा (कुचल दूँगा) । तुम लोग भी भगवान को मत मानो । श्रीकृष्ण की सात गर्ल-फ़्रेण्ड थी, वे लड़कियों को स्नान करते समय देखते थे और उनके कपड़े छुपाते थे...”।

भारत का कदाचित ही कोई ऐसा प्रांत होगा जहाँ के अधिकांश ईसाई मिशनरी स्कूलों और कुछ सरकारी विद्यालयों में इस तरह की घटनायें न होती हों, स्थानीय स्तर पर बच्चों के अभिभावक बच्चों के भविष्य को संकट में नहीं डालना चाहते और चुप रहते हैं । कुछ विद्यालयों में तो हिंदी बोलने पर भी बच्चों को प्रताड़ित करने की घटनायें प्रकाश में आती रही हैं । प्रांतीय मातृभाषाओं, सनातन सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं के प्रति विद्वेष का यह षड्यंत्र स्वतंत्र भारत में आज भी रचा जा रहा है । उस पर तुर्रा यह कि हमें असहिष्णु बताते हुये हमारे विरुद्ध असहिष्णुता का आरोप भी लगाया जाता रहा है । इतना ही नहीं, अपनी भाषाओं, धार्मिकपरम्पराओं और अध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा के लिये यदि हम भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की बात भी करते हैं तो भारत से लेकर योरोप और अमेरिका तक के वामपंथी विश्वविद्यालयों में तूफ़ान आ जाता है । हम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का स्वप्न भी नहीं देख सकते, अपनी सुरक्षा का कोई उपाय भी नहीं कर सकते, न हिंदी बोल सकते हैं और न सनातनधर्म का अनुशीलन कर सकते हैं । क्या ये स्थितियाँ हमारे मौलिक अधिकारों और स्वाभिमान के विरुद्ध नहीं हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें हमारी स्वतंत्रता की लेश भी अनुभूति करा सकने में समर्थ हैं?

हमारे देश में एक सुदृढ़ लॉबी है जो वनवासियों को हिंदू नहीं मानती; वनवासियों को भड़काया जा रहा है कि वे ही इस देश के मूलनिवासी हैं जबकि हिंदू लोग बाहर से आये हुये आक्रमणकारी हैं । मूलनिवासी एवं बाहरी आक्रमणकारी के कुतर्कों के साथ वनवासी ही नहीं, बौद्ध, सिख एवं जैन आदि परम्पराओं को भी हिंदूधर्म से पृथक करने के षड्यंत्र को समझना होगा । हम कबीलों में बँटे हुये अफगानी नहीं हैं, हमारी गौरवमयी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत रही है, जब तक हम इस विरासत को सहेजे रहेंगे तब तक भारत अखण्ड, समृद्ध और शांत बना रहेगा ।  

हम शिक्षक को गुरु और आचार्य भी मानते हैं, आचार्य बह है जिसका आचरण अनुकरणीय हो । इस घटना से स्पष्ट है कि शासकीय विद्यालय के शिक्षक श्रीचरण मरकाम की शिक्षाओं और उनके आचरण का अनुकरण किया जाय तो भारत की नयी पीढ़ी घृणा के विष से भर उठेगी । अपने विषाक्त आचरण से शिक्षक की मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाला कोई व्यक्ति क्या शिक्षक के पवित्र दायित्वों का निर्वहन कर सकने योग्य है ? जिलाधीश ने ग्रामीणों की लिखित शिकायत, जिसमें वीडियो और ऑडियो प्रमाण भी संलग्न किये गये हैं, पर शिक्षक को निलम्बित कर दिया है किंतु क्या यह पर्याप्त है? ज्ञान के मंदिर में घृणा की खेती करने वाले व्यक्ति को शिक्षक के गरिमामय पद बने रहने का क्या औचित्य है?

रविवार, 1 अगस्त 2021

धर्मांतरण लोकतंत्र का अमोघ अस्त्र बन गया है

पुलिस अभिलेखों और विभिन्न सर्वेक्षणों के आँकड़ों से पता चलता है कि सत्ता में असामाजिक और अराजक तत्वों की भरमार होती जा रही है जो भारत के प्रबुद्धजीवियों के लिये गम्भीर चिंता का विषय है । प्रबुद्धजीवी मतदाता ऐसे लोगों को वोट नहीं देता इसलिये ऐसे प्रत्याशियों को अपने लिये एक ऐसा वर्ग उत्पन्न करना होता है जो उन्हें वोट दे सके । विगत कई दशकों से भारतीय राजनीति में भाड़े के गुण्डों का एक विशाल वर्ग उत्पन्न किये जाने के लिये राजनेताओं के संरक्षण में “मतदाता उद्योग” खड़ा किया जाता रहा है । इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में जागरूक मतदाताओं की अपेक्षा अराजक मतदाताओं की भीड़ बढ़ने लगी है, और यही अपराधी नेताओं का इष्ट भी है ।   

हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था के काले पक्षों को भी देखना चाहिये, और काला पक्ष यह है कि सत्ता के लिये वोट चाहिये, वोटों के लिये अंधसमर्थक मतदाता चाहिये, अंधसमर्थन के लिये धर्मांतरित लोगों की भीड़ चाहिये और भीड़ को अपना समर्थक बनाने के लिये लालच का बाजार चाहिये । लालच कभी किसी को कर्मठ नहीं बनाता जो किसी भी देश और समाज की उन्नति की सबसे बड़ी आवश्यकता है बल्कि लालच से मनुष्य की आत्मा को ख़रीदकर मक्कारों और आतंकियों के समूह तैयार किये जाते हैं । लोकतंत्र का यह सर्वाधिक विद्रूप पक्ष है जिसमें जातीय उन्मूलन और अमानवीय घटनाओं के बीज पोषित किये जाते हैं ।

ऊपर जिस “मतदाता उद्योग” की बात की गयी है उसके टूल्स में धर्मांतरण, जातीय विद्वेष और सामाजिक विभाजन के अतिरिक्त विदेशी आततायियों, भगोड़ों और अपराधियों को संरक्षण देना सम्मिलित किया गया है । भारतीय राजनीति में सृजन के स्थान पर विखण्डनकारी और विध्वंसक गतिविधियों ने अपना सुदृढ़ स्थान बना लिया है ।

दिल्ली में “मतदाता उद्योग” के लिये प्रधानमंत्री आवास योजना का सहारा लिया गया है । इस योजना के लाभार्थियों में सत्तर प्रतिशत संख्या उन रोहिंग्याओं की है जो अपनी अराजक और हिंसक गतिविधियों के लिये म्यानमार से निकाल दिये गये थे । इन रोहिंग्या को न केवल पैसे दिये जाते हैं बल्कि राजनीतिक संरक्षण भी दिया जा रहा है जिससे कि वे समय समय पर जातीय दंगे करने के लिये तैयार रहें । दिल्ली की रोहिंग्या बस्ती के मुसलमान किसी शरणार्थी की तरह नहीं बल्कि चिंगेज ख़ान के सैनिकों की तरह रहते हैं । उनके व्यवहार में दबंगई और गुस्ताख़ी साफ देखी जा सकती है जो राजनीतिक संरक्षण के बिना कतई सम्भव नहीं है । राजतंत्र के समय भी भारत में ऐसे देशद्रोही राजाओं और सेनापतियों की कमी नहीं थी जिन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं को देशी राजाओं पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । दुर्भाग्य से, भारतीय राजनीति की इतनी पतित परम्परा आज तक समाप्त नहीं हो सकी है जिसके लिये यहाँ की प्रजा भी कम दोषी नहीं है जो दूसरों के बहकावे में आकर जातीय खण्डों और विद्वेषों में ही अपना उत्थान देखने की अभ्यस्त हो गयी है ।

“मतदाता उद्योग” के एक महत्वपूर्ण टूल के रूप में धर्मांतरण का प्रमुख स्थान है जिसने केरल और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की तरह अब पञ्जाब में भी अपनी जड़ें जमा ली हैं । सिख परम्परा का यह पतन हर भारतीय के लिये पीड़ादायी है । भारत-विभाजन के समय हिंसा और यौनदुष्कर्म के शिकार लोगों में सबसे बड़ी संख्या सिखों की ही थी । आज उन्हीं सिखों के वंशजों को यह याद दिलाने की आवश्यकता आ पड़ी है कि उनके पूर्वजों के शिकारी वे मुसलमान थे जिन्हें आज वे अपना मित्र मानने लगे हैं । सनातनी हिंदू समाज की रक्षा के लिये गुरुअर्जुन सिंह जी और गुरुगोविंद सिंह जी ने जिस सिख पंथ को अपने बलिदान से सुदृढ़ किया था आज वह बिखरने लगा है । सिखों का एक समुदाय अब स्वयं को हिंदू नहीं मानता, उन्हें भारत से अलग अपने लिये एक खालिस्तान चाहिये । पञ्जाब में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जिनके आदर्श अब गुरु नानक देव और गुरु गोविंद सिंह जी नहीं बल्कि मोहम्मद साहब और यीशु हो गये हैं, उनका हृदय भारत के लिये नहीं बल्कि येरुशलम और पाकिस्तान के लिये धड़कने लगा है । वीरों और बलिदानियों की भूमि पञ्जाब नशे और धर्मांतरण के जाल में जकड़ती जा रही है । सिखों का यह धर्मांतरण गुरु गोविंद सिंह और बंदा बैरागी जैसे न जाने कितने सिखों के बलिदान का घोर अपमान है । सिख भूल रहे हैं कि गुरु अर्जुन देव को तपते हुये तवे पर धीरे-धीरे भून डालने की नारकीय यातना देने वाले कौन थे, वे भूल रहे हैं कि बंदा बैरागी के शरीर के मांस को तपते हुये चिमटों से नोच-नोच कर और फिर हाथी से कुचल कर क्रूर यातना देने वाले कौन थे । पञ्जाब के सिखों का ईसाई और इस्लामिक कट्टरपंथियों के जाल में फ़ँसते जाना न केवल पीड़ादायी है बल्कि आत्मघाती भी है ।