भारत में रहकर भारत के विरुद्ध कुवैचारिक आंदोलन करना बहुत सरल हो जाता है यदि सत्ता भी भारत के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की इच्छा से कूट क्रियाओं और षड्यंत्रों में लिप्त हो। मैं बात कर रहा हूँ स्वातंत्र्योत्तर भारत के अभारतीयकरण की, जिसमें पराधीनता युग की परम्पराओं, स्मृतियों, कुविचारों और दुष्प्रचारों को सुस्थापित किये जाने के सफल प्रयास किये जाते रहे।
जवाहरलाल ने प्रसादयुग की परिष्कृत हिंदी के स्थान पर फ़ारसी और अरबी मिश्रित हिंदी
बोली को प्राथमिकता क्यों दी, यह विचारणीय विषय होना चाहिए। उन्होंने इस्लामिक पराधीनता वाले भारत की राजशाही
बोली, जो कि तुर्क, फ़ारसी और मुगल शासकों
द्वारा विकसित की गयी बोली “उर्दू” थी, को भारत पर थोपने के लिये
जनता को प्रोत्साहित किया, जबकि अभिजात्य लोगों के बीच उन्हें
अंग्रेजी बोलना पसंद था। समृद्ध द्रविड़ भाषाओं के कारण यह काम दक्षिण भारत में सम्भव
नहीं था इसलिये उत्तर भारत पर ही उर्दू थोपी जाती रही। जवाहरलाल का वश होता तो तो
वे हिंदी को देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि में लिखने की भी अनुशंसा करते। स्वतंत्र
भारत पर स्वतंत्र भारत के शासक के द्वारा यह प्रथम आक्रमण था जो भाषाहत्या के रूप में
था। बाद में हिंदी और द्रविड़ भाषायी विवाद को लेकर भी हिंसा होने लगी और दर्पण की
तरह भारत एक स्थान पर चटक गया।
साधारण जनमानस में स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारत के भारतीयकरण की अपेक्षा की
गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ। पराधीनता की पीड़ादायी स्मृतियों को सम्मानित
करने के लिये भवनों, मार्गों, राजप्रासादों,
दुर्गों और अन्य राष्ट्रीय महत्व के स्थानों के नाम क्रूर और अत्याचारी
विदेशी शासकों के नाम पर ही जाने जाते रहे, जबकि इनमें से अधिकांश
स्थान भारतीय शासकों द्वारा निर्मित किंतु विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अपने अधिकार
में लिये हुये थे, उनके द्वारा निर्मित नहीं। भारत पर भारत की
स्वतंत्र सत्ता द्वारा पूरी धूर्तता के साथ किया गया यह दूसरा आक्रमण था जिसने भारत
की स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व की हत्या करने का प्रयास किया।
भारत पर स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा तीसरा आक्रमण शिक्षा के पश्चिमीकरण और
सनातन मूल्यों की हत्या के लिये किये जाने वाले विविध आक्रमणों के रूप में था जिसमें
रोमिला थापर जैसे लोगों द्वारा लिखी गई काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर विद्यार्थियों
को परोसा जाता रहा । परिणामस्वरूप आज भारत की कम से कम तीन पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क
में भारत के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना स्थायीरूप से घर कर चुकी है। इस घृणा
की जड़ों ने भारत की अपनी भाषा, स्थानीय बोलियों, संस्कृति,
सामाजिक मूल्यों और पूर्वजों के त्याग-बलिदान आदि में घुसकर उन्हें बुरी
तरह जकड़ लिया है। आज की तिलचट्टा पार्टी इसका एक ताजा उदाहरण है।
दर्पण अब कई स्थानों से टूट चुका है, दर्पण को तोड़ने के प्रयास
अनवरत चल रहे हैं। भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिये यह संक्रांतिकाल
है जिसमें हम सबको अपनी-अपनी भूमिकायें सुनिश्चित करनी ही होंगी।
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