तुम
हमें गालियाँ देते रहे
पीटते रहे
बलात उठा ले जाते रहे
हमारी बहनों-बेटियों को
देते रहे धमकियाँ
देश से भगाने की
हमारी बेटियों से ही नहीं
हमारे इतिहास से भी
करते रहे बलात्कार
लगाते रहे
हम पर ही मिथ्या आरोप
और हमें ही
ठूँसते रहे कारा में
न्याय के नाम पर
करते रहे अत्याचार
ऐसी ही अराजक,
अनियंत्रित
और अमानवीय घटनाओं की बाढ़ में
बहा होगा वह आर्यपथ
जिससे होकर आया-जाया करते थे
सभी वर्णों के लोग..
और विवश होकर
बना ली होगी दूरी
ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने...
राज्यपोषित
एक अत्याचारी वर्ग से।
तुमने इसे छुआछूत कहा
और हमें ही बना दिया
अपयश का भागी।
हर युग में रही है
"चित भी तेरी, पट भी तेरी।"
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