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शनिवार, 2 जुलाई 2022

बिना सम्बोधन

        आप उसे कुछ भी कह सकते हैं किंतु वास्तव में उसके लिए कोई सम्माननीय सम्बोधन हो ही नहीं सकता। जो नृशंस हत्याकांड को बचकानी हरकत मान कर हत्यारों को माफ़ कर देने की अनुशंसा करता हो उसके लिए क्या सम्बोधन हो सकता है! इस तरह तो हर अपराधी को माफ़ कर दिया जाना चाहिये, या फिर अपराध की परिभाषा को ही बदल दिया जाना चाहिए। इस आदमी की बात मानी जाय तो नूपुर शर्मा की प्रतिक्रिया को अपराध और हत्यारों की जघन्यता को मासूमियत माना जाना चाहिए।

वकील से कांग्रेस के एमएलए और फिर जज बने जस्टिस जेबी पादरीवाला बिना किसी तर्क एवं प्रमाण के ही यह मान चुके हैं कि उदयपुर हत्याकाण्ड के लिए नूपुर की प्रतिक्रिया उत्तरदायी है। न्याय के मंदिर में इस तरह कुछ मान लेना या समझ लेना पूरी तरह विधिशास्त्र के विरुद्ध है।   

जज ने माना कि उनकी अंतरात्मा नूपुर को कोई न्यायोचित रिलीफ़ देने के लिए तैयार नहीं है। जज की अंतरात्मा पर निश्चित ही किसी शैतान की आत्मा का प्रभाव हो गया है अन्यथा वे इस तरह की हठपूर्ण, पूर्वाग्रही, अमानवीय और न्यायविरुद्ध टिप्पणी नहीं करते।

सामान्यतः माना जाता है कि किसी व्यक्ति में न्यायविरुद्ध कुछ करने की प्रवृत्ति निरंकुशता और गुण्डत्व की परिचायक है।    

जज की टिप्पणी से मौलाना और “सर तन से जुदा” वाले लोग बमबम हैं। उन्हें  यकीन हो गया है कि वे जो कुछ बोलते और करते हैं, सब न्यायसंगत है, और उनका “सर तन से जुदा” का सिद्धांत न्यायोचित है। जज की अनौचित्यपूर्ण टिप्पणी ने मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध और अधिक हिंसक बना दिया है। राहुल की टिप्पणी से भी मुसलमान उत्साहित हुये हैं। नूपुर को सजा देने वाले बयान फिर आने लगे हैं। नूपुर समर्थकों की हत्याओं की श्रृंखला प्रारम्भ हो चुकी है। आपको याद है न! निर्भयाकाण्ड के बाद इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगने के स्थान पर एक के बाद एक कई घटनाएँ नाबालिगों द्वारा की गयीं!

अपराधियों के मन से कानून और दण्ड का भय समाप्त हो चुका है। यह किसी भी शासन और न्यायतंत्र की बहुत गम्भीर अक्षमता है। अपराधियों के समर्थकों द्वारा सेना और पुलिस पर आक्रमण कर देना अब सामान्य हो चुका है। उदयपुर काण्ड के हत्यारों को मुक्त करने के लिए मुसलमानों की भीड़ ने न केवल थाने पर पथराव किया बल्कि एक पुलिसकर्मी को भी तलवार से घायल कर दिया। क्या इससे यह प्रमाणित होता है कि भारत में शासन और कानून जैसी कोई चीज है भी?  

और अब सुप्रीम कोर्ट के जज की भड़काऊ टिप्पणी ने हिन्दुओं को असुरक्षित कर दिया है जिससे गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका है। क्यों न जज के विरुद्ध देश को संकट में झोंक देने के आरोप में जनहित याचिका के माध्यम से मुकदमा चलाया जाना चाहिए! कोई भी जज न तो ईश्वर है और न उसके समकक्ष, वह उसका विकल्प भी नहीं है। कोलेजियम सिस्टम की उत्तराधिकार परम्परा और शासनतंत्र की असफलताओं ने जजों को स्वेच्छाचारी और अनुत्तरदायी ही नहीं बना दिया बल्कि एक तरह से तानाशाह भी बना दिया है। यह सब बहुत चिंता का विषय है, विशेषकर तब और भी जबकि लोकतंत्र भी केवल नाम भर का ही लोकतंत्र रह गया हो और आम आदमी की आशायें केवल न्यायतंत्र पर ही टिकी हुई हों।  

क्या अब जस्टिस एसएन ढींगरा जैसे लोगों का युग समाप्त हो गया है! आख़िर जजों पर किसी तरह का कोई अंकुश क्यों नहीं है? वे भी मनुष्य हैं और मनुष्य होने के नाते उनमें भी दुर्बलताएँ हैं। सम्मान छीन कर नहीं लिया जा सकता, हर किसी को अपनी गरिमा, मर्यादा और कर्म से सम्मान अर्जित करना होता है, और इस नियम में किसी के लिए न तो कोई आरक्षण नहीं है और न कोई शिथिलता।

गुरुवार, 16 जून 2022

क्या हम हारते जा रहे हैं

           अँधेरों की विजय यात्रा अनवरत है जिसे रोक पाने में हम असमर्थ होते जा रहे हैं।

जब हम अपनी बोलियों और समझ में उलटी गंगा बहाना प्रारम्भ कर देते हैं तो आक्रमण को अपराध बिल्कुल नहीं माना जाता जबकि प्रत्याक्रमण को बहुत गम्भीर अपराध माना जाने लगता है। जिन चार शब्दों विवादास्पद बयानऔर बेतुकी बातके माध्यम से हम सब पूरी बाजी उलट देते हैं वे इतने बड़े षड्यंत्र के निर्णायक उपकरण हैं जो निरपराधी को अपराधी और अपराधी को अपराधमुक्त कर देते हैं। सोशल मीडिया इन शब्दों के प्रति या तो गम्भीर नहीं है या फिर वह भी इस षड्यंत्र में सम्मिलित है।

सनातनी आराध्यों को लेकर वर्षों से सोशल मीडिया पर अश्लील और अपमानजनक बातें बोली और लिखी जाती रही हैं। इसे कभी किसी ने अपराध नहीं माना किंतु जब इनका विरोध प्रारम्भ हुआ तो इसे विवादास्पद बयानऔर बेतुकी बातकहकर वातावरण को विषाक्त बनाना प्रारम्भ कर दिया गया। शासन-प्रशासन द्वारा भी वास्तविक अपराधी पर तो कोई कार्यवाही नहीं की जाती किंतु निरपराधी पर तुरंत कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जाती है। इसका सबसे प्रमाण तो हम सोशल मीडिया और टीवी पर दिन भर देखते-सुनते हैं। शिव, गणेश, दुर्गा, ब्रह्मा, सरस्वती, गाय, पंचगव्य, वेद, पुराण आदि भारतीय ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति से जुड़े सभी प्रतीकों पर प्रतिदिन न जाने कितनी बार आक्रमण किये जाते हैं, इन आक्रमणों पर शासन-प्रशासन क्या कार्यवाही करता है? यदि कार्यवाही हुयी होती तो टीवी डिबेट्स में दिखायी देने वाले लोगों की भीड़ अब तक जेल में होती। यह भीड़ जेल में नहीं है किंतु नूपुर शर्मा का सर तन से जुदा करने के लिए उन्हें भीड़ के हवाले कर दिए जाने के लिए दुनिया भर में हंगामें हो रहे हैं। यह न्याय और नैतिक मूल्यों के साथ सामूहिक बलात्कार है जिसके लिए हम सत्ता को निर्दोष नहीं मान सकते।  

एशियायी ही नहीं बल्कि सभ्य और विकसित माने जाने वाले अमेरिकी और योरोपीय देशों में भी नूपुर शर्मा को लेकर जो अन्यायपूर्ण समझ बनी है वह प्रदर्शित करती है कि धरती की एक बहुत बड़ी भीड़ को तर्क, नैतिकता और न्याय से कोई मतलब नहीं।

भारत के तार्किक मुसलमानों ने जिस निर्भयता और सत्य के साथ अन्याय और अत्याचारों का विरोध करना प्रारम्भ किया है, सनातनियों में उसका लगभग अभाव देखा जा रहा है। मुसलमानों का सनातन के प्रति तर्कपूर्ण आकर्षण एक दार्शनिक और तात्विक क्रांति है जिसके लिए उन्हें प्रकृति की सभी सात्विक ऊर्जाओं का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। दुनिया भर के तार्किकों की तरह हम भी यह समझ पाने में असमर्थ रहे हैं कि तमसोमा ज्योतिर्गमय को अपने जीवन का आदर्श मानने वाले सनातनी बंधु प्रकाश की ओर गमन क्यों नहीं करना चाहते, वे अँधकार में ही क्यों डूबे रहना चाहते हैं?   

सोमवार, 13 जून 2022

जज बनती भीड़

            “ग़ुस्ताख़-ए-नबी की क्या हो सजा, सर तन से जुदा सर तन से जुदा”।

यह देश संविधान या कानून से नहीं बल्कि उस शरीया से चलेगा जो हिंसक भीड़ के दिमाग में चलता है। संविधान और कानून तो काफ़िरों के लिए होता है जिसका पालन करते-करते अब वे इतने भीरु हो चुके हैं कि किसी अन्याय का विरोध करने की उनमें जरा भी शक्ति नहीं बची।

आसमानी किताब और हदीसों में किए गए उल्लेखों के आधार पर साद अशफाक अंसारी ने नूपुर शर्मा का समर्थन किया तो पुलिस उन्हें उठा ले गयी जिससे हिंसक भीड़ ने यह संदेश ग्रहण किया कि भारत में जो भी सत्य का समर्थन करेगा पुलिस उसे उठा लेगी? नूपुर शर्मा से मुजरा करवाने, उनकी जिव्हा काटने, उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने और उनका सिर काटने की घोषणा करने वाली आक्रामकता पर शासन प्रशासन मौन है। अशफाक अंसारी को जेल में डाला जा सकता है, किंतु इन आक्रामक लोगों को नहीं। अब समझ में आ रहा है कि भारत में इस्लामिक शासन कैसे स्थापित हुआ, हम इतिहास को पहले से भी बुरी स्थिति में वापस आते हुए देख रहे हैं।   

योगी और हिमंता विस्वा शर्मा को छोड़ दें तो मोदी और संघप्रधान मोहन भागवत भी अराजक भीड़ को यह संदेश देने में सफल रहे कि भारत में निरंकुश और क्रूर भीड़ को कानून से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, वहीं ये लोग यह संदेश देने में भी सफल रहे कि भारत में अब हिन्दुओं के लिए कोई स्थान नहीं है। सात दशक के लम्बे विलम्ब के बाद ही सही किंतु अब सनातनी भारतीयों को यह लगने लगा है कि भारत में सत्य और न्याय के लिए भी कोई स्थान नहीं बचा है। ब्रिटिश सेना के सार्जेण्ट मोहनदास करमचंद ने अपने मालिक के प्रति वफ़ादारी दिखाते हुये भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जो हठजाल फैलाया उससे निर्मित विकृत नीतियों से जर्जर हुए भारत के लोगों को भारतीयता की रक्षा के लिए आज भी यातनाएँ सहनी पड़ रही हैं। भारत का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है!  

कुवैत में किसी भी प्रकार का प्रदर्शन प्रतिबंधित है इसके बाद भी अपनी आदत और प्रवृत्ति के अनुरूप नियम-कानून को धता बताने वाले भारतीय मुसलमानों ने नूपुर शर्मा के विरुद्ध वहाँ प्रदर्शन किया जिससे कुवैत सरकार ने उनके वीसा स्थायीरूप से निरस्त कर उन्हें वापस भारत भेज दिए जाने के आदेश दे दिए हैं। अब कुवैत से आने वाली यह भीड़ भारत में दंगे करने के लिए स्वतंत्र रहेगी। वास्तव में नूपुर शर्मा का नाम केवल उस विरोध के लिए प्तयोग किया जा रहा है जिसका उद्देश्य भारत के सनातनियों के उन्मूलन के लिए प्रतिकूल स्थितियाँ उत्पन्न करना है। यह सीधे-सीधे गजवा-ए-हिन्द है। मोदी और मोहन भागवत बिना युद्ध किए हारने के लिए तैयार हैं। मोदी को दिया गया भारतीय जनता का इतना सशक्त समर्थन किसी काम नहीं आया।

गहरी धुंध में भाषा बदल रही है, पैमाने बदल रहे हैं और यह सब देखने वाले सनातनी भी स्वीकार करने लगे हैं कि नूपुर का बयान विवादास्पद है, नूपुर से माफ़ी मँगवायी गयी जिससे यह संदेश दिया गया कि नूपुर ने अपराध किया है। विभाजन के बाद विभाजन के अधिकांश समर्थक पाकिस्तान नहीं गए और भारत में अपनी इच्छा से ही रह गए। किसी ने नहीं विरोध नहीं किया कि विभाजन के बाद भी उनकी ऐसी इच्छा क्यों है? और अब वे कहने लगे हैं कि जिन्हें उनकी “तहज़ीब पसंद न हो वे कहीं और चले जाएँ”, “हिन्दुओ! भारत छोड़ो”, “हम भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनने देंगे”........। पाकिस्तान ले लेने और भारत के एक हिस्से को इस्लामिक मुल्क बना लेने के बाद भी उनकी ऐसी ज़िद क्यों है? इस पर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछता बल्कि मोहन भागवत कहते हैं कि कलंक के काले पृष्ठों को दबा ही रहने दो, भारत की उत्कृष्ट सभ्यता और सत्य को दफन ही बना रहने दो, हर मस्ज़िद में भारत को मत तलाशो।

मंदिर और मस्ज़िद वे हथियार हैं जो आम जनता को पकड़ा दिए जाते हैं लड़कर मर जाने के लिए, इसके बाद जो बचता है वह सत्ता का उपभोग करता है। सारे युद्ध गजवा-ए-हिन्द के लिए हैं जिसे लुंज-पुज सत्ता के कारण सनातनी हारते जा रहे हैं। हमारा राजा हमारे शत्रुओं के साथ है।

पुरुषों और बच्चों के बाद अब महिलाएँ भी नूपुर शर्मा के विरोध में (जो वास्तव में भारत का विरोध है) सड़कों पर उतर आयी हैं। यह वह भीड़ है जो जिहाद के लिए कुछ भी कर सकने के लिए रात-दिन तैयार रहती है। यह वह भीड़ है जो हिंसक दंगों में किशोर-किशोरियों और अबोध बच्चों को भी हिंसक दंगों और आक्रामकता वाली कबीलाई सभ्यता के व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए अपने साथ दंगों में ले कर आती है। जब मुस्लिम बच्चे यह प्रशिक्षण पा रहे होते हैं तो मोहन भागवत मंदिर तोड़कर उनपर मस्ज़िद बनाने वाले मुसलमानों को अपना भाई बता रहे होते हैं। 

पहले भीड़ चाहती थी कि नूपुर को ग़िरफ़्तार कर उन्हें सजा दी जाय, अब भीड़ की माँग बढ़ गयी है। निरंकुश भीड़ की नयी माँग है कि नूपुर शर्मा को भीड़ के हवाले कर दिया जाय, वे ख़ुद उन्हें सजा देंगे। शायद वे तहर्रुश गेमिया का ख़्वाब देखने लगे हैं।

भीड़ जब जजबन जाती है और जज मूकश्रोतातो लोकतंत्र हार जाता है। भारत की हिन्दूविरोधी हिंसक भीड़ जज बन चुकी है, लोकतंत्र बंदी बना लिया गया है और सत्य को जगह-जगह सरे आम फाँसी दी जाने लगी है।

इस समय भारत के किसी भी राजनैतिक दल के पास सत्य का समर्थन करने के लिए समय नहीं है। हर कोई शतरंज खेलने में व्यस्त है।  

शुक्रवार, 10 जून 2022

जुम्मे की नमाज और पत्थर

            जुम्मे की नमाज के बाद पत्थरबाजी, हिंसा और आगजनी अब परम्परा बनती जा रही है। यह परम्परा शहर-दर-शहर फैलती जा रही है। ओवेसी बंधु राम, लक्ष्मण, हनुमान और दुर्गा आदि के नाम को भी मनहूस बताते हैं जिसे कभी हेट-स्पीच नहीं माना जाता रहा। पिछले लगभग दो दशकों से भारत की जनता को परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से यह बताया जाता रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लामिक धमकियाँ, निजाम की हुकूमत और हिन्दुओं की सामूहिक हत्या जैसी बातों का ऐलान करना, साथ ही मनुस्मृति को जूतों तले रौंदना संविधान के अनुसार अनुचित नहीं है, यदि अनुचित माना जाता तो उन पर कठोर कार्यवाही की गयी होती और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति थम चुकी होती। यह भी बड़े जोर-शोर से बताया जाता रहा है कि क्रिटिक के नाम पर देवी-देवताओं के बारे में अश्लील टिप्पणियाँ और कला के नाम पर अश्लील चित्रकारी करना गंगा-जमुनी तहज़ीब और विविधता के लिए आपत्तिजनक नहीं है, यदि यह आपत्तिजनक माना गया होता तो इस पर कार्यवाही हुयी होती। पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा यह भी बताया गया कि इस देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है, यदि यह न बताया गया होता तो रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, पार्क, सड़क और मंदिर परिसर जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण कर मजार, दरगाह और मस्ज़िदें नहीं बनायी गयी होतीं।

यह कभी नहीं बताया गया कि इस देश के संसाधनों पर हिन्दुओं का पहला अधिकार क्यों नहीं है? यह कभी नहीं बताया गया कि गाली और अपमानजनक व्यवहार उनके लिए हेट-स्पीच क्यों नहीं है और प्रतिवाद करना हमारे लिए हेट-स्पीच क्यों है? यह कैसा देश है? हम कैसे देश के निवासी हैं?

संविधान की पुस्तक में राम का चित्र है, जिनका नाम भी लेना विधायक अकबरुद्दीन ओवेसी को मनहूस लगता है। कोई यह नहीं बताता कि राम के नाम को मनहूस कहने का अर्थ संविधान को भी मनहूस बताना है। भारत के सनातनी यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग पैमाने क्यों हैं?

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पैतृक गाँव में धार्मिक सौहार्द्य ख़राब होने की आशंका के कारण दुर्गा पूजा प्रतिबंधित होती है किंतु आये दिन शुक्रवार को नमाज के बाद होने वाली पत्थरवाजी को रोकने के लिए सामूहिक नमाज को प्रतिबंधित करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अराजकता को नियंत्रित करने के लिए सत्ता का यह कैसा प्रबंध है? इसका उत्तर मोदी और मोहन भागवत के पास नहीं, किंतु सनातनियों के पास है जो उचित समय पर बताया जाएगा।

ना ना, इसे अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध नहीं कहते

पश्चिम बंगाल में चुनाव के समय और बाद में बड़े पैमाने पर हुयी हिंसा के बाद भी राष्ट्रपती शासन नहीं लगाए जाने से उत्साहित अराजक तत्वों के हौसले और भी बुलंद हुए हैं। यही कारण है कि हनुमान चालीसा पढ़ने का संकल्प करने पर राणा दम्पति को जेल की सजा काटनी पड़ती है, किंतु नूपुर शर्मा के साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने का ऐलान करने वाले को पकड़ा भी नहीं जाता। हेट-स्पीच की सिलेक्टिव परिभाषाओं और कानूनी कार्यवाहियों के बाद भारत की सनातनवादी हिन्दू जनता के सामने मौनधारण कर लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं बचता। क्या भारत का लोकतंत्र अब इसी तरह चलेगा? एक ब्रिटिश सार्जेण्ट की मनमानी और हठों से हुये परिवर्तनों के परिणाम भारत की जनता को न जाने कितनी सदियों तक भोगना पड़ेगा, और अब हिन्दुत्व के ठेकेदार भारत के वर्तमान बंदी बनाने और भविष्य को पूरी तरह समाप्त कर डालने की राह पर चल पड़े हैं।  

योगी के कठोर शासन के बाद भी आये दिन उत्तर-प्रदेश में नई-नई हिंसक चुनौतियों का सिर उठाना क्या संकेत करता है, इसका यदि सही उत्तर दिया जाय तो उसे हेट-स्पीच मानकर कानूनी कार्यवाही होने का ख़तरा है। तमसोमा ज्योतिर्गमय अब भारत का आदर्श वाक्य नहीं रहा। हमें प्रकाश से अंधकार की ओर चलने के लिए बाध्य किया जा रहा है। भारत की संस्कृति और अस्तित्व को समाप्त करने के लिए हिन्दुओं के स्वयंभू ठेकेदार पूरे जोश में हैं।

भारत में धर्मांतरण की स्वतंत्रता है किंतु घर वापसी पर आपत्ति है। घर वापसी के लिए सहयोग करने वाले स्वामी जीतेंद्रनारायण जैसे संतों को हत्या करने की धमकी दी जा रही है। किसी की हत्या की धमकी और सामूहिक यौनदुष्कर्म करने वाले के लिए करोड़ों के इनाम के घोषणा न तो हेट-स्पीच है और न आपसी सौहार्द्य समाप्त करने का कारण है। घरवापसी करने वाले एक्स मुसलमान युवकों और लड़कियों को खुले आम हत्या की धमकी देने वालों पर कोई कार्यवाही न होना इस बात की घोषणा है कि भारत में मुसलमानों को हर तरह की छूट है जबकि सनातनियों को आत्मसम्मान से जीने का कोई अधिकार नहीं है।

भारत के सनातनियों को भारत की अखण्डता, सम्प्रभुता और सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए एक सशक्त राजनीतिक विकल्प का तुरंत निर्माण करना होगा।  

फ़ैक्ट चेक में मिलावट

विषय था ज्ञानवापी परिसर में प्राप्त शिव मंदिर के साक्ष्यों का जिसमें अन्य सारे महत्वपूर्ण साक्ष्यों को पीछे धकेलते हुये सारी चर्चा को केवल शिवलिङ्ग पर ही केंद्रित क्यों किया जाने लगा, हम यह आज तक नहीं समझ सके। टीवी चैनल्स ने सनसनी फैलाने के लिए उद्देश्यहीन डिबेट्स आयोजित करनी प्रारम्भ कीं जिससे पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को और हवा मिलने लगी। जिन्हें लिङ्ग का अर्थ भी नहीं पता वे विमर्श में साधिकार सम्मिलित हुये और ताल ठोककर शिवलिंग के बारे में अश्लील एवं अपमानजनक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दीं। दो पीढ़ी पूर्व हिन्दू से मुसलमान बने तसलीम रहमानी ने आग लगायी जिस पर प्रतिक्रिया करते हुए नूपुर शर्मा ने कुरान के तीन उदाहरणों का उल्लेख किया। पहला था छह साल की आयशा से बावन साल के नबी का निकाह और नौ साल में शादी। दूसरा था – धरती का चपटा होना, और तीसरा था- उड़ने वाले घोड़े का उल्लेख। इन तीनों बातों का उल्लेख कुरआन में किया गया है, इसके बाद भी नूपुर पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने, ज़ुबान काटने और सिर काट कर लाने वाले लोगों को कई व्यक्तियों एवं मुस्लिम संगठनों ने एक-एक करोड़ के इनाम का ऐलान कर दिया। एक करोड़ के इनाम का ऐलान करने वालों में अधिवक्ता अली अब्बासी, भीम पार्टी के प्रमुख नवाब सतवंत तंवर और ओवेसी की पार्टी भी सम्मिलित है।

जिहादी वातावरण की घात लगाकर बैठे एक फ़ैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर ने इस विवाद में घुसपैठ की, बहाना किया फ़ैक्ट चेक का और कर दी मिलावट अपने मिशन की। मोहम्मद जुबैर ने बड़ी चतुराई दिखाते हुये नूपुर शर्मा के साथ तसलीम रहमानी की डिबेट के कुछ अंशों को फ़ोर्टीफ़ाइड करते हुये मुस्लिम देशों में हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा फैलाने की लॉबिंग की और सफल हुआ। इसके बाद दंगों और धमकियों का एक दौर शुरू हुआ जिसके शोर शराबे में फ़ैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर और आग लगाने वाले तस्लीम रहमानी अद्भुत तरीके से मंच से अदृश्य हो गये जबकि नवीन ज़िंदल नेपथ्य में चले गये और नूपुर शर्मा को खलनायिका बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया। भारत सरकार ने नूपुर के प्रतिक्रियात्मक वक्तव्य को हेटस्पीच माना और उन पर पार्टी से निलम्बन की कार्यवाही कर दी, जबकि भीम सेना के चीफ़ सतवंत तंवर द्वारा नूपुर के बारे में कही गयी तमाम आपत्तिजनक और अपमानजनक बातों पर कार्यवाही की अभी तक आवश्यकता नहीं समझी गयी। भारत साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, हिंसा और विद्वेष की आग में जलने लगा है। कई शहरों में शुक्रवार की नमाज के बाद पथराव होने लगे हैं। नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल के साथ-साथ अन्य कई लोगों पर कार्यवाहियाँ शुरू कर दी गयी हैं, सिवाय उन लोगों के जो इस काण्ड के मुख्य खलनायक हैं। विश्वगुरू बनने का दावा करने वाले भारत को कतर जैसे देशों के सामने झुककर भारत के स्वाभिमान की हत्या कर देने के लिए तैयार होना पड़ा। रण में शौर्य प्रदर्शित करने के आदर्श वाला भारत रणछोड़दास बन गया।

चौथे स्तम्भ की भूमिका

पत्रकारिता के नाम पर वक्ता की रक्षात्मक प्रतिक्रिया को विवादास्पद कहने का चलन भारत में स्थापित हो चुका है। सुलझाने के स्थान पर उलझाने वाले इस मंत्र को जपने वाले पत्रकारों की बल्ले बल्ले।

कई टीवी चैनल्स किसी भी नेता या संत के वक्तव्य को अविवादित होने पर भी विवादित कहने का शौक करते रहे हैं। नूपुर शर्मा का वक्तव्य रक्षात्मक प्रतिक्रिया थी जिसे किसी भी कोण से विवादास्पद नहीं माना जा सकता किंतु कई टीवी चैनल्स यहाँ तक कि जी टीवी के सुधीर चौधरी भी उनके वक्तव्य को “विवादास्पद बयान” बताने में संकोच नहीं करते।

शिव के लिए मुस्लिम स्कॉलर के आपत्तिजनक वक्तव्य पर नूपुर शर्मा के आयशा के निकाह व शादी के उद्धरण के साथ प्रतिक्रियात्मक वक्तव्य को विवादास्पद बताने वाले टीवी चैनल्स, राजनेताओं और मुस्लिम स्कॉलर्स को इस्लामिक जगत में प्रोत्साहित किया जा रहा है। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की माँग है कि नूपुर शर्मा का निलम्बन पर्याप्त नहीं, उन पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। कुछ लोग चाहते हैं कि उन्हें तुरंत फाँसी दी जानी चाहिए। कुछ लोग चाहते हैं कि नूपुर शर्मा को उनके दरबार में नाचने के लिए पेश किया जाना चाहिए। कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने नूपुर शर्मा को उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने एवं हत्या कर देने की धमकियाँ दीं जिन पर तत्काल किसी कार्यवाही की आवश्यकता नहीं समझी गयी। आनन-फानन में कतर, कुवैत, ईरान, सऊदी अरब, बहरीन, यूएई, ओमान, इण्डोनेशिया, ईराक, मालदीव, जॉर्डन, लीबिया, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान आदि 57 सदस्यीय इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने प्रकरण को जाने- समझे बिना ही भारतीय राजदूतों को बुलाकर अपना विरोध प्रकट किया।  

मुम्बई में रज़ा अकादमी ने नूपुर के विरुद्ध एफ़ आई आर दर्ज़ की। महाराष्ट्र की टीपू सुल्तान पार्टी द्वारा भी एक एफ़आईआर दर्ज़ की गयी। अलकायदा ने दिल्ली और मुम्बई पर आत्मघाती हमले की धमकी दी और दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा धमकियों और विरोधों का दौर शुरू हो गया। इस बीच मानवतावादी और पाक-साफ विचारधारा वाली गिनी चुनी मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों द्वारा नूपुर शर्मा का जोरदार समर्थन करते हुये उनकी बेगुनाही के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए गये किंतु इस सारे हंगामे के बीच उनकी आवाजें अधिक प्रभावी नहीं हो सकीं। हमें भी लगता है कि अब यह मामला सुनवायी के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही चाहिए जिससे सारे फ़ैक्ट्स सामने आ सकें और दोषियों को दंडित किया जा सके। यूँ भारत का मुसलमान इतने से भी संतुष्ट नहीं है वह नूपुर शर्मा को ख़ुद अपने हाथों से फ़ाँसी की सजा देना चाहता है। ये वही मुसलमान हैं जो मोहन भागवत के भाई हैं।   

हामिद अंसारी का कच्चा चिट्ठा – Mission R&AW (लेखक -आरके यादव, पूर्व अधिकारी रा)

दस साल तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे, तीन साल तक संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे, कई देशों में भारत के राजदूत और विदेश सेवा के अधिकारी रहे हामिद अंसारी की भारत के प्रति निष्ठा पर प्रश्न नहीं उठाये जा रहे बल्कि भारत के प्रति विश्वासघात के प्रमाणों को सार्वजनिक किया जा रहा है। यह आवश्यक है, भारत के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उनके देश की बागडोर कैसे लोगों के हाथों में रही है। विभिन्न सेवाओं और राजनैतिक दायित्वों से मुक्त होने के बाद हामिद अंसारी भारत विरोधी आतंकी संगठनों के समारोहों में भाग लेने के लिए जाने जाते हैं। ईरान में भारत के राजदूत रहने की अवधि में हामिद अंसारी ने बड़ी क्रूरतापूर्वक भारतीय अधिकारियों को शारीरिक यंत्रणाएँ दिलवाने में ईरान सरकार के प्रतिनिधि की तरह कार्य किया। हामिद का इस्लामिक और पाकिस्तान के प्रति प्रेम के साथ-साथ भारत के प्रति द्वेषभाव अब और भी खुलकर सामने आने लगा है। भारत और भारत के बाहर भी इतने महत्वपूर्ण पदों पर दीर्घकाल तक हामिद अंसारी जैसे भारत विरोधी व्यक्ति का बने रहना भारत की राजनीति में विश्वासघाती तत्वों की मजबूत जड़ों के अस्तित्व का एक नमूना मात्र है।