रविवार, 12 मई 2013
गुरुवार, 9 मई 2013
एक हद बनाइये
आये हो क़रीब मेरे दिल में बैठिये।
दिल में बैठकर मगर न ज़ुल्म ढाइये॥
दिल खोल जाम आज फिर से टकराइये।
महफ़िल में आये हो तो एक हद बनाइये॥
कितना किया सफ़र न हमको यूँ बताइये।
महंगा है ढोल पीटना, कुछ शर्म खाइये॥
सेवक से बन गये कुबेर, कैसे बताइये।
अब इनसे, देशवासियो हिसाब लीजिये॥
काटे जो सिर शहीदों के, छीन लाइये।
न कोई वार्ता, न कोई खेल खेलिये॥
कर कत्ल टुकड़े लाश के न अब चुराइये।
दुश्मनी की भी तो एक हद बनाइये॥
रविवार, 5 मई 2013
बहुत हुआ, अब हम जीना चाहते हैं....
काष्ठ्लेख .....
कला की इस विधा को जिलाजेल कांकेर के बन्दीगृह में सीखते हैं विचाराधीन बन्दी
....कि मुक्त होने के बाद पुनर्वास में होगी सुविधा।
किंतु सपनों को यथार्थ में बदलना इतना सरल है क्या?
तीन साल से भी अधिक समय तक जेल में विचाराधीन बन्दी के रूप में रहने के बाद निर्दोष मुक्त हुये किंतु नक्सली होने का प्रमाणपत्र लेकर निकले समारू ने सोचा था कि वह अपने सिर पर लगे इस कलंक को अपनी कला साधना से धो डालेगा ....
अपने गाँव भैंसासुर वापस आकर बिना किसी सहयोग के उसने अपने पुनर्वास के लिये स्वयं ही प्रयत्न करने शुरू कर दिये
.... किंतु किसी निरक्षर और निर्धन आदिवासी के सिर पर लगे नक्सली नामक कलंक से यूँ मुक्त होना सरल नहीं है । सीमा सुरक्षा बल के जवानों को जब भी किसी वारदात की तहकीकात की ज़रूरत होती है वे आदिवासी गाँवों से कुछ लोगों को उठा लाते हैं ...
और फिर शुरू होती है उनकी "तहकीकात" ।
कोई चीखता है कि उसे कुछ नहीं पता ...कोई गिड़गिड़ाता है कि अब वह सुधर गया है और इस बार उसने माओवादियों के कहने पर किसी वारदात में कोई सहभागिता नहीं की है .....
पर फोर्स के अपने तरीके होते हैं ...अपनी संहिता होती है। समारू को छह दिन तक चौकी में रखा गया फिर छोड़ दिया गया। वह लंगड़ाते हुये चलकर वापस घर आ गया। लंगड़ी व्यवस्था में उसका लंगड़ाना कोई अनोखी बात नहीं है।
उस दिन जब मैं अंतागढ़ से किसकोड़ो के लिये निकलने ही वाला था कि एक ग्रामीण ने आकर अनुरोध किया कि मैं उसकी वृद्धा माँ को एक बार देख लूँ ...वह चल फिर नहीं सकती ...और उसके गाँव में चिकित्सा सुविधायें नहीं हैं। उसका गाँव वहाँ से दूर था, मेरी अनिच्छा देख उसने फिर कहा कि उसके गाँव में कुछ और भी रुग्ण हैं। किंचित असमंजस के बाद मुझे उसके गांव के लिये रुख करना ही पड़ा। उसके गाँव भैंसासुर में जब मैं रोगियों को देखकर वापस जाने का उपक्रम करने लगा तभी एक युवक ने आगे बढ़कर कुछ सकुचाते हुये मुझसे ताकत की दवा लिख देने को कहा। गाँव के लोगों द्वारा ताकत की दवा माँगना सामान्य बात है। किंतु मैंने देखा वह किंचित लंगड़ा रहा था। धीरे-धीरे पता लगा कि उसे सीमा सुरक्षा बल के द्वारा इण्टेरोगेशन के दौरान मारा पीटा गया था।
मुझे लगा कि मुझे उससे और गाँव वालों से बात करनी चाहिये। थोड़ी बहुत ना-नुकुर के बाद उसने बताना शुरू किया कि आदिवासी लोग माओवादियों और पुलिस के बीच पिसने के लिये विवश हैं। वह चाहता है कि उसका पुनर्वास किया जाय, भले ही पुलिस की निगरानी में ही हो जिससे वह रोज-रोज की मार-पीट से बच सके। किंतु माओवादियों के इन विवश अनुयायियों के पुनर्वास के लिये किसी के पास कोई योजना नहीं है।
सरकारें आतंकवाद का ख़ात्मा चाहती हैं .....किंतु बिना किसी वैकल्पिक और रचनात्मक योजना के। स्वभाव से शांत आदिवासी अब अशांत हो उठा है। वह माओवादियों से मुक्त होना चाहता है ...और पुलिस एवं सीमा सुरक्षा बलों से भी। उसे माओ त्से तुंग के बारे में कुछ नहीं पता, दुनिया के नक्शे में चीन कहाँ है उसे नहीं पता, चीन की विस्तारवादी नीतियों के बारे में उसे नहीं पता। उसे तो कुछ लोग हुक्म देते हैं जिसकी अवहेलना की शक्ति उसमें नहीं होती।
मैंने पूछा - क्या तुम्हें अपने लिये अस्पताल और अपने बच्चों के लिये स्कूल नहीं चाहिये? आवागमन के लिये सुविधाजनक सड़कें नहीं चाहिये ? सबका समवेत स्वर में एक ही उत्तर था कि उन्हें वह सब कुछ चाहिये जो दूसरे गाँवों में है।
प्रश्न उठता है कि तब वे कौन लोग हैं जो विध्वंसात्मक कार्यवाहियों और बम विस्फोट की दुर्दांत वारदातों में शामिल होते हैं?
निश्चित ही, इनमें से कोई भी चीन का वाशिन्दा नहीं है। नासमझ भारतीय ही चीनी षड्यंत्रों में शमिल होकर चीनी उद्देश्यों की पूर्ति के साधन बन रहे हैं। माओवादी क्रूरता की जिन सारी हदों को पार कर नृशंस हत्यायें करते हैं उसके आगे पुलिस की प्रताड़ना तो कुछ भी नहीं है। किंतु इस तुलनात्मक तथ्य से किसी भी उत्पीड़न को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
उधर बीजिंग ख़ुश है कि भारत के लोग आपस में ही एक-दूसरे को काट-मार रहे हैं और वह अपनी धूर्त चालों में सफल हो रहा है।
आदिवासी महत्वाकांक्षी नहीं होते ..प्रकृति ने उन्हें जितना ...जो कुछ दिया है वे उतने में ही संतुष्ट हैं, किंतु माओवाद के प्रेत ने उनका सुख-चैन हर लिया है।
जंगल-ज़मीन और नदियों के गीत गाने वाला आदिवासी ...प्रकृति की पूजा करने वाला आदिवासी
आज अपना सबकुछ खोता जा रहा है। जंगल ख़त्म हो रहे हैं ...नदियाँ सूख रही हैं .....और आदिवासी भयानक विस्फोटों के षड्यंत्रों में फंसा ख़ुद को असहाय महसूस कर रहा है।
इस त्रासदी को एक भिन्न दृष्टि से देखने और उसका समाधान तलाशने की आवश्यकता है।
इस त्रासदी से जंगल कितने ग़मज़दा हैं और पहाड़ कितने उदास !!!
शनिवार, 4 मई 2013
दहशत में ख़ूबसूरती ....2
माओवादियों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया शाला भवन।
क्षतिग्रस्त शालाभवन
यह कैसी क्रांति?
शालाभवन का क्षतिग्रस्त कक्ष जहाँ अब मवेशियों ने अपना आशियाना बना लिया है।
माओवादी विकास की कहानी सुनाता शालाभवन
गाँव में दहशत है ....
अब रात में यहाँ रुकते हैं वन्यजीव
जो सुबह जाने से पहले मल त्याग करना नहीं भूलते......शायद मनुष्य नामक दरिन्दों को चिढ़ाने के लिये।
माओवादी क्रांति का सृजन कितना सुन्दर है!
किंतु ऐसी सुन्दरता चीन को ही नसीब हो
हमें नहीं चाहिये ....बिल्कुल भी नहीं चाहिये। सुना तुमने?
माओवादियों द्वारा धराशायी किया गया एक और शासकीय भवन।
जंगल में विध्वंस
माओवादियों का एक और सृजन ...
डायनामाइट से उड़ा दिया गया एक शासकीय भवन।
जंगल में हो रहे इस अमंगल को कौन रोकेगा ?
गुंडाधुर!
आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है।
गुंडाधुर के बस्तर में आज चीनी माओवाद अपने पैर पसार चुका है।
बस्तर सरल है ...ख़ूबसूरत है
....मगर दहशत में है।
ये दहशत क्यों है? कौन हैं ये दहशतगर्द ?
अमन का वायदा करते हैं जो .....कहाँ हैं अब?
कौन हैं ज़िम्मेदार ...दहशत के लिये ....और अमन का झूठा वायदा करने के लिये?
कौन हैं इस ख़ूबसूरती के दुश्मन ?
कौन हैं वे
जो छीन लेना चाहते हैं इस ग्राम्य सरलता को ?
किसे नहीं भाती ये ख़ूबसूरती?
कौन हैं वे
जो नहीं चाहते कि बस्तर में अस्पताल हों ....स्कूल हों ......पेड़ हों ....जंगल हों ....
और हों सीधे सरल लोग
ग़र्मी में धरती झुलस रही है
पर यहाँ करंज फूल रहे हैं
कभी देखे हैं धरती पर बिखरे इतने सारे करंज के फूल?
कोई भूखा नहीं रहता यहाँ
सैकड़ों चिड़ियाँ और बन्दर देख रहे हैं छीन्द (खजुरिया) के पकने की राह ।
लद गये हैं पेड़ खट्टे-खट्टे आमों से
कुटज की भीनी-भीनी सुगन्ध से भर गया है पूरा जंगल
आग लगाने के लिये गुलमोहर क्या कम है!
इन्हें किसी से नहीं है कोई शिकायत
श्रमिक हैं .....निर्धन हैं ....पर प्रसन्न हैं ।
पर लोग क्यों छीन लेने पर तुले हैं इनकी ख़ुशियाँ? माओवाद के नाम पर वे क्या देना चाहते हैं इन्हें ? कौन सी गुप्त समस्यायें दूर करना चाहते हैं इनकी?
ग्रीष्म हो ...शीत हो ....या वर्षा
ये यूँ ही परिश्रम करते हैं
और जंगल इन्हें वह सब कुछ देने का वायदा पूरा करता है
जो इन्हें चाहिये।
जैसे ही बन्द हुयीं पाठशालायें
जंगल ने बड़े प्यार से बुलाया इन बच्चियों को ...और कहा ..
कि तैयार हो गया है हरा सोना (तेन्दू पत्ता) .... आओ और तोड़ कर ले जाओ
जंगल के लोगों ने वह सब कुछ सहेज कर रखा है जो अब शहरी रिवाज़ों से बहुत दूर जा चुका है।
कांसे का लोटा .......शहरी पीढ़ी को किसी संग्रहालय में ही मिल सकता है देखने को
पर बस्तर के वनांचल में यह आम घरों में रोज़ की ज़िन्दगी का हिस्सा है आज भी ।
थाली भी कांसे की
और भोजन !
बचपन के भोजन का स्वाद ....एक लम्बी मुद्दत के बाद।
ऐसा सुस्वादु भोजन तो लाख रुपये ख़र्च करने के बाद भी नसीब नहीं होता ।
प्रसन्न्मुद्रा में वाहन चालक कार्तिक का तो यही कहना है।
(अरहर की गाढ़ी दाल, पेठे की ख़ुश्बूदार बड़ी की सब्ज़ी, पत्थर के सिल पर पिसी जंगली टमाटर और धनिया की चटनी, नीबू-प्याज़ का सलाद और ढेकी के कुटे चावल का भात ....किस्मत वालों को ही नसीब हो पाता है। इस भोजन का स्वाद और आदिवासी परिवार का निश्छल प्यार कभी नहीं भूल पाऊँगा। पिछले महीने आयी स्टेला पॉल की भी यही अनुभूति थी)
बस्तर की कहानी अधूरी रह जायेगी यदि ज़िक्र न किया
भूमकाल के महानायक गुंडाधुर का।
गुण्डाधुर ....यानी
बस्तर में अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ाने वाला लंगोटीधारी एक धुरवा आदिवासी।
अंग्रेज़ों को बस्तर की धरती से बाहर खदेड़ने के लिये हुये भूमकाल संग्राम में शहीद होनेवाले गुंडाधुर के बस्तर में आज चीनी माओवाद अपने पैर पसार चुका है। दहशत जारी है। वन विभाग का एक धराशायी भवन ......माओवादियों के लिये यह सब रोज़मर्रा का खेल हो चुका है। आख़िर कौन सी क्रांति लाना चाहते हैं वे ?
जहाँ तक शोषण की बात है तो शोषण रोकने के नाम पर् सर्वाधिक तबाही और शोषण तो वे ख़ुद कर रहे हैं। माओवाद चीन में ही रहे
हमें नहीं ज़रूरत है उसकी। ........
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