रविवार, 1 नवंबर 2015

भेड़िया

हमारे गाँव में एक भेड़िया घुस आया है, उसने गाँव के कुछ मोहल्लों को वीरान कर दिया है ।

गाँव की अपूरणीय क्षति के बाद भी हम भेड़िये को मारना नहीं चाहते किंतु इतना अवश्य चाहते हैं कि वह वापस जंगल में चला जाय । हमने उसे भगाने का विचार किया ही था कि हमारे गाँव के कुछ लोग हमारे ऊपर टूट पड़े । उन्होंने हमारे ऊपर आरोप गढ़ना प्रारम्भ कर दिया कि हम गाँव की विविधता और बहुलता को आग लगाने का काम कर रहे हैं ।

तेरहवीं शताब्दी से गाँव में घुसे इस भेड़िये ने गाँव के कुछ मोहल्लों में 1947 में अपना जंगलराज स्थापित कर लिया । अब वह कुछ और मोहल्लों में जंगलराज स्थापित करना चाहता है । हम चाहते हैं कि भेड़िये की विस्तावादी दुष्टता से हम अपने बचे-खुचे गाँव को बचा लें किंतु “विविधता और बहुलता” के छद्म सिद्धांत आड़े आ रहे हैं । हमारे गाँव के कुछ लोगों को भेड़िये से गहरी मोहब्बत हो गयी है । ये लोग मनुष्य से अधिक भेड़ियावाद को महत्व देते हैं । अब वे भेड़िये के साथ मिलकर हमारे ऊपर आक्रमण करने लगे हैं । जब हम अपनी रक्षा के उपायों पर मंथन करते हैं तो हमें मनुष्यता का अपराधी घोषित करने में वे लेश भी विलम्ब नहीं करते ।  

      अंततः आज हम यह मंथन करने के लिये विवश हुये हैं कि अख़िर यह “विविधता और बहुलता” है क्या ? समाज और राष्ट्र के लिये इसका औचित्य क्या है ? सामाजिक संरचना और शांति में इसकी क्या उपादेयता है ? हमारे गाँव के कुछ लोग इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं ?

विविधता और बहुलता – कल और आज !
कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था ब्राह्म, शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सिख आदि । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था अरुणांचल प्रदेश से सिंध तक, कन्याकुमारी से कंधार तक और कच्छ से लेह तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था द्रविण भाषाओं से लेकर डोंगरी और सिंधी से लेकर संस्कृत तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था ध्रुपद से लेकर लोकगीत तक और कलियरिपट्टु से लेकर कत्थक और मणिपुरी तक । कल तक विविधता और बहुलता का अर्थ था जौं की रोटी से लेकर पंचगव्य तक । इस विविधता और बहुलता में अरब कहीं नहीं था, उसके लिये कोई स्वाभाविक स्थान नियत नहीं था । अरब ने भारत में आकर अपने लिये स्थान हमसे छीना है । छीने हुये स्थान में स्थापित की गयी आयातित विविधता और बहुलता भारत का स्वाभाविक अंश नहीं है । जो स्वाभाविक नहीं है वह हमारे लिये अहितकर है, दुर्भाग्यजनक है । यह अस्वाभाविक अंश हमारे अस्तित्व के लिये संकट है । हम इस प्रकार की आक्रामक, विस्तारवादी, परोपजीवी और हिंसामूलक विविधता और बहुलता को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हैं । केर-बेर की स्वाभाविक प्रकृतियों की उपेक्षा कर उनकी सामीप्यता का छद्म आदर्श केर के अस्तित्व की हत्या का षड्यंत्र है । हमारे गाँव के छद्म बुद्धिजीवियों को अपना आचरण बदलना होगा । या फिर हमें ही गाँव छोड़कर एक बार फिर कहीं और जाना होगा । हम पहले ही सप्तसैंधव, गांधार और पूर्वी बंगाल को छोड़ चुके हैं । छद्म बुद्धिजीवी इस बात पर चिंतन क्यों नहीं करते कि आख़िर किन परिस्थितियों ने हमें हमारे गाँव के पारम्परिक मोहल्लों को छोड़ने के लिये विवश किया है ? उनकी मिलावटी विविधता और बहुलता ने अभी तक इस आर्यावर्त को क्या दिया है ? हाँ ! हमने बहुत कुछ खोया अवश्य है इस विविधता और बहुलता के कारण । हमारी विविधता-बहुलता की थाली में पारम्परिक व्यञ्जनों के साथ संखिया और धतूरे को भी सम्मिलित कर दिया गया है । व्यञ्जनों के समकक्ष संखिया और धतूरे की विषाक्तता को महिमामण्डित करने का कुचक्र भारतीय जनता को समझना होगा ।


छद्मबुद्धिजीवियों द्वारा नव गढ़ित परिभाषाओं और तत्व में अतत्व की मिलावट ने भारत का बहुत कुछ अमूल्य लूट लिया है । हम यदि अब भी अपनी कुम्भकर्णी नींद से नहीं जगे तो भारत को ईरान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तिब्बत बनने से कोई नहीं रोक सकेगा । 

पुरस्कार, देश की चिंता और विरोध का सैलाब ...


        भारत के साहित्यकार, कलाकार और अब वैज्ञानिकों ने पुरस्कार वापसी अभियान से सरकार, देश और दुनिया को प्रथम दृष्ट्या यह संदेश देने का प्रयास किया है कि देश के बुद्धिजीवी वर्तमान व्यवस्था से चिंतित हैं और व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं । बुद्धिजीवियों द्वारा सरकार के विरोध के सैलाब ने कुछ प्रश्न खड़े कर दिये हैं जिन पर देशव्यापी मंथन आवश्यक है ।
पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ कि व्यक्तिगतरूप से मैं स्वयं देश और समाज की कुव्यवस्था से व्यथित हूँ, किंतु यह तो सदा से है । जब से मैंने होश संभाला है सत्ता और समाज की बढ़ती दूरियों और स्वार्थों की राजनीति ने मुझे आहत किया है । देश की व्यवस्था कभी अच्छी नहीं रही, आर्थिक भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों का हनन, हत्या, अपराध, बलात्कार, नैतिक पतन, रिश्वतखोरी, झूठे वायदे, वर्गभेद कुछ भी तो नहीं बदला बल्कि सभी में वृद्धि ही होती रही है । लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की समग्रक्रांति के अपवाद को छोड़ दिया जाय तो इससे पूर्व या इसके पश्चात् देश के बुद्धिजीवियों ने कभी ऐसे तेवर नहीं दिखाये । तेवर तो छोड़िये कभी सामान्य विरोध भी नहीं किया और करते भी क्यों वे तो स्वयं उसी व्यवस्था में रच-बस जाना ही उचित समझते रहे हैं । आज हमें बुद्धिजीवियों की इस विरोधीसेना में कोई प्रेमचंद, निराला, फणीश्वर नाथ रेणु या अब्दुल कलाम नहीं दिखता । जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति के समय हुये जनआंदोलन में जिन बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन कुव्यवस्था के विरोध में अपनी सक्रिय और दृढ़ भूमिका का निर्वहन किया वे वास्तव में देश और व्यवस्था के प्रति चिंतित थे । उनकी चिंता आत्मस्फूर्त चेतना से प्रेरित थी, उनमें सच्चीनिष्ठा थी, कहीं कोई कृत्रिमता नहीं थी । आज के बुद्धिजीवियों द्वारा किये जा रहे विरोध प्रदर्शन में उस चेतना और निष्ठा के दर्शन नहीं होते । यह एक सुविधाजनक विरोध है जिसे मैं एक नकारात्मक विरोध की संज्ञा देना चाहूँगा । भिक्षा में प्राप्त सम्मान वापस करने की क्षुद्रता से कुव्यवस्था के प्रति ईमानदार चिंता प्रकट नहीं होती । यदि वे किसी क्रांति की पृष्ठभूमि निर्मित कर रहे हैं तो इस यज्ञ में उनकी अपनी समिधा क्या है ? इनका विरोध एक काकस्वर से अधिक कुछ और नहीं प्रतीत होता । हम इस प्रकार के सुविधाजनक पाखण्डपूर्ण विरोध का समर्थन नहीं कर सकते । वास्तव में इन तथाकथित बुद्धिजीवियों का यह पाखण्डपूर्णकृत्य भर्त्सना के योग्य है । हमें निष्ठावान और अवसरवादी बुद्धिजीवियों में विभेद कर उन्हें पहचानना होगा । हम व्यवस्था में परिवर्तन नहीं चाहते, कुव्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं जिसके लिये देश को भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे निष्ठावान और समर्पित क्रांतिकारियों की आवश्यकता है ।
यह देश का दुर्भाग्य है कि इन अवसरवादी बुद्धिजीवियों ने इससे पूर्व देश की व्यवस्था को सुधारने के लिये कोई ठोस और रणनीतिपूर्वक कदम नहीं उठाया । निर्भयाकाण्ड को लेकर हुआ विरोधप्रदर्शन एक स्वस्फूर्त आंदोलन था, अपनी लड़कियों की सुरक्षा को लेकर एक तात्कालिक प्रतिक्रिया थी । यह आंदोलन निष्फल रहा, यौन अपराध होते रहे, उसी क्रूरता के साथ होते रहे, सामूहिकरूप में होते रहे और अब तो 3-4 वर्ष की बच्चियों के साथ भी ऐसी दरिंदगी की घटनायें बढ़ती जा रही हैं । आंदोलन एक उबाल के बाद बुझ गया । एक रस्म अदायगी हुयी और फिर सब कुछ पूर्ववत् होने लगा । यह बुद्धिजीवियों का आंदोलन नहीं बल्कि एक जनआंदोलन था जिसमें बुद्धिजीवी भी सम्मिलित हो गये थे । उस आंदोलन को क्रांति तक ले जाने में बुद्धिजीवियों की रुचि क्यों नहीं हुयी ? इसलिये नहीं हुयी क्योंकि तेजपाल जैसे बुद्धिजीवी अवसरवादी होते हैं । वे जनसमूह के साथ विरोध में भी खड़े हो जाते हैं और अवसर मिलते ही भेड़िया बन कर नोच खाने के लिये भी तत्पर हो जाते हैं । जिस तरह देश को बाबाओं, बाइयों, भगवानों, देवियों और नेताओं से सावधान रहने की आवश्यकता है उसी तरह अब ऐसे अवसरवादी और छद्मबुद्धिजीवियों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है । 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

प्रतिलोमगामी सम्मान


यह विक्रम संवत 2072 की कथा है यानी महाभारत युद्ध के सहस्रों वर्ष पश्चात् की कथा !
अस्तु, हे श्रृद्धालुओ ! एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में सुगंधित तरुणीपुष्प धारण करने वाली, बिम्बीफल सदृश रक्तिम अधरों पर मंदस्मित के स्थायी लेपावरण से सुशोभित, पुष्पक विमानचारिणी, पुरुषांकगामिनी सुखविंदर कौर नामक सुंदरी के मोहजाल से मात्र कुछ क्षणों के लिये मुक्त होकर इस अति लघु किंतु अतिमंथनीय कथा का श्रवण करने की कृपा कर हमें कृतार्थ करें । मूल कथा इस प्रकार है –

        आवेदन पत्र लिखकर ... यानी निवेदन करके ... यानी अनुनय-विनय करके ... यानी कृपा पात्र बनकर ... यानी भीख माँगकर प्राप्त पुरस्कार एक दीर्घकालोपरांत पुरस्कारदाता को वापस किये जाने की एक योजना जम्बूद्वीपे भरतखण्डे में क्रियान्वयित हो रही है । अनायास ही एकांगी बुद्धिजीवियों का अन्यांगी विवेक जाग्रत हो गया है ।
        एकांगी और अन्यांगी विवेक एक दार्शनिक स्थिति है जिसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है –

       जब हमारा चिंतन सार्वदेशज नहीं होता तब वह सत्य के व्यापक स्वभाव को त्याग देता है । ऐसे बुद्धिजीवी कूपवासी स्वभाव वाले होते हैं । उनका अपना ब्रह्माण्ड होता है जो व्यापक न होकर संकुचित होता है । इस स्वनिर्मित ब्रह्माण्ड की सीमायें होती हैं जिसके कारण ये कूपवासी ज्ञान अर्थात् वेद को शत्रुभाव से देखते हैं । ऐसे व्यक्ति जब साहित्यकार योनि में जन्म लेते हैं तो केवल माओ और स्टालिन देवताओं की आराधना-उपासना करते हैं ।
        अब हम अन्यांगी विवेक की व्याख्या कर रहे हैं जिसे ध्यानपूर्वक श्रवण करें । अन्यांगी विवेक वह विवेक होता है जो वर्गविशेष मात्र के लिये चिंतित रहने के प्रदर्शन मात्र के उद्देश्य से ही हलचलावस्था को प्राप्त होता है । इसे उदाहरण के द्वारा समझिये - 
        जब की हत्या होती है तो इनका एकांगी विवेक सुषुप्तावस्था यानी हाइबरनेशन की स्थिति को प्राप्त हो जाता है जिसके कारण ये प्रतिक्रियाविहीन प्राणी में रूपांतरित हो जाते हैं ।
      जब की हत्या होती है तो इनका अन्यांगी विवेक हलचल की स्थिति को प्राप्त हो जाता है जिससे इनकी आत्मा अत्यंत उद्वेलनावस्था को प्राप्त हो जाती है । ये वर्गभेद के विरुद्ध संघर्ष करने के छलपूर्ण प्रदर्शन में दक्ष होते हैं किंतु इनकी रचित  परिभाषायें मनुष्य को वर्गों में विभक्त करने की अभ्यस्त होती हैं । जब तस्लीमा नसरीन को उत्पीड़ित किया जाता है तो ये हाइबरनेशन को प्राप्त हो जाते हैं, जब कलबुर्गी की हत्या होती है तो इनका अन्यांगी विवेक क्रियाशील हो उठता है ।

कथा का उपसंहार –

हम किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या वध के विरुद्ध हैं । किसी प्रतिक्रियावादी विचारक का वध करके विचारों का वध कर पाना उतना ही असम्भव है जितना लालू नामक प्राणी से सभ्यआचरण की आशा करना । सनातनधर्म से लिंगायत धर्म और पुनः लिंगायत धर्म से हिंदूपरम्पराओं के अनुशीलन की स्थिति से उत्पन्न धर्म के विलीन होने के आसन्न संकट से भयभीत कलबुर्गी ने एक प्रतिक्रियात्मक धर्म की पुनर्स्थापना के लिये जीवन भर संघर्ष किया जो उनके स्वभाव और मूल्यों के अनुरूप था । वैचारिक मतभेद और वैचारिक खण्डन-मण्डन मनुष्य का स्वभाव है । वैचारिक खण्डन किसी भी विचार, मत, परम्परा और रूढ़ि के परिष्कार और सत् विचार के पुनर्स्थापन के लिये एक आवश्यक प्रक्रिया है । नैतिक-सामाजिक मूल्य, अनुकरणीय परम्परायें, शुभ अनुष्ठान .... ये सब दीर्घकालोपरांत विकार और क्षरण की ओर अग्रसर होते ही हैं । इनमें स्थायित्व की आशा नहीं की जा सकती । कलबुर्गी जैसे लोग भले ही लिंगायतधर्म के लिये चिंतित रहे हों किंतु उनकी चिंता सनातनधर्म के हित में प्रचलित पाखण्ड के परिष्कार और मूल्यों के परिमार्जन के लिये एक सशक्त आधार ही नहीं निर्मित करती अपितु हम सबको प्रेरणा भी देती है कि मूल्यों का निरंतर परिमार्जन आवश्यक है अन्यथा ईश्वर और सूक्ष्म शक्तिस्वरूपा देवियों की वैज्ञानिक अवधारणा को विकृत होने से कोई रोक नहीं सकता और तब भोगविलास को ही जीवन का लक्ष्य बना चुकीं सुखविंदर कौर जैसी नितांत सांसारिक स्त्रियों को दुर्गा देवी के नवस्वरूपों में रूपांतरित होने के अभिनय में समय नहीं लगता ।

सम्मान वापस करके
लेखनी तोड़ दी तुमने ।
भरोसा उठ गया
लेखनी की शक्ति से तुम्हारा ।
भूल गये  
लेखनी वल्गा है
लेखनी सूरज है  
लेखनी अस्त्र है,
लेखनी शस्त्र है,
सत्ता से नहीं चलती लेखनी
लेखनी से चलती है सत्ता ।
आओ हम लेखनी उठायें !

आओ हम सत्ता चलायें !     

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

फ़ल्लुज़ाह के बाज़ार में बिकती हैं लड़कियाँ




पता नहीं इस धरती के वाशिंदे इतने असंवेदनशील क्यों हैं, वैश्विक समाज के लोग दूसरों की त्रासदी पर विचार करते भी हैं या नहीं ? ईसवी सन् 2012 के बाद मध्य एशिया से आने वाली ख़बरों ने हमारे दिल-ओ-दिमाग़ को दहला दिया है । ये ख़बरें तब आ रही हैं जब धरती के वैज्ञानिक आये दिन अंतरिक्ष में अपने उपग्रह भेजते रहते हैं ... इस उम्मीद में कि शायद धरती जैसा कोई और ग्रह मिल जाय जहाँ मनुष्य रह सके । मनुष्य को एक और धरती की तलाश है, शायद यह धरती उसके लिये कम पड़ गयी है अपने ज़ुल्म-ओ-सितम ढाने के लिये ? ईराक़ के मानवाधिकार मंत्रालय के अनुसार अनबर सूबे के फ़ल्लुज़ाह शहर में इस्लामिक स्टेट्स के लड़ाकों द्वारा युद्ध में जीती गयी सीरिया और ईराक़ की ग़ैर मुस्लिम लड़कियों की ख़रीद-फ़रोख़्त ज़ारी है । फ़ल्लुज़ाह में ऐसे बाज़ार लगभग हर रोज़ लगते हैं । 
किसी गाँव, कस्बे या शहर पर हमले के बाद पकड़े गये लोगों में से दस साल से अधिक उम्र के क़ाफ़िर मर्दों को महिलाओं से अलग कर दिया जाता है । इनमें से अधिकांश मर्दों की क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी जाती है । कम उम्र के लड़कों को इस्लामिक स्टेट की ख़िदमत के लिये रख लिया जाता है और लड़कियों को शरीयत के अनुसार मर्दों की ज़िस्मानी हविस के लिये हथकड़ियों में जकड़ कर बाज़ार लाया जाता है जहाँ उन लड़्कियों के ज़िंदा गोश्त का मोल-भाव किया जाता है । यानी अल्लाह का एक बंदा एक बंदी को सिर्फ़ इस लिये बेच देता है क्योंकि वह एक ख़ूबसूरत औरत है । ईराक के मानवाधिकार मंत्रालय के अनुसार बाज़ार में इस ज़िंदा सामान की कीमत ज़िस्म की उम्र के हिसाब से तय की जाती है । पकड़ी हुयी स्त्रियाँ “फ़तह का माल” होती हैं जिनका पुरुष यौनेषणा की पूर्ति के लिये किसी भी रूप में स्तेमाल किया जाना शरीयत कानून के अनुसार न्यायसंगत माना जाता है । ख़ूबसूरत और कम उम्र की लड़कियाँ “ज़िहाद निकाह” के लिये बाध्य होती हैं । 
ईराक और सीरिया में क्रिश्चियन, यज़ीदी, शाबैक और कुर्दिश समुदाय के लोग इस्लामिक स्टेट के आसान शिकार हो रहे हैं । 2012 से सीरिया के पुरुष लगातार क्रूर हत्या के शिकार हो रहे हैं । सीरिया की बेग़ुनाह स्त्रियाँ, जिनमें छोटी बच्चियाँ भी सम्मिलित हैं, सामूहिक यौनौत्पीड़न की शिकार हो रही हैं ।  एक समुदाय दूसरे समुदाय को धर्म की फ़तह के लिये ख़त्म करने पर आमादा है । हम इक्कीसवीं शताब्दी में एक बार फिर सदियों पुराने आदिम युग की क्रूरता का नंगा नाच देखने के लिये विवश हैं । इस्लाम के नाम पर इस्लामिक और ग़ैरइस्लामिक स्त्रियों पर होने वाली क्रूरता को रोकने के लिये सबसे बड़ी भूमिका इस्लामिक दुनिया की आधी आबादी की ही है । जबतक यह आधी आबादी अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के लिये उठ कर खड़ी नहीं होगी तब तक इसे रोक पाना सम्भव नहीं लगता ।

        धरती का एक समुदाय क्रूरता की बुलंदियों को स्पर्श करता जा रहा है और वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय वैश्विक अवधारणा अर्थहीन होती जा रही है । सीरिया की धरती भारत से बहुत दूर है, हमें उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है किंतु समस्या जब मानवीय उत्पीड़न और क्रूरता की हो तो भौगोलिक सीमाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता ।   


बाज़ार में बेचने के लिये लायी गयीं लड़कियाँ ! हमारी सभ्यता का मापदण्ड क्या है ? 


हैवानियत की कोई सीमा नहीं रखी गयी है इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में ..... 


इनका सबसे बड़ा ग़ुनाह यह है कि ये लड़कियाँ हैं  .....और कोई कानून इनकी रक्षा करने में सक्षम नहीं हो सका है आज तक  


यहाँ मैं कोई कैप्शन दे सकने की स्थिति में नहीं हूँ ... मेरी रूह काँपने लगी है और ख़ून खौलने लगा है ।   


 .....और यह है इस्लामिक स्टेट वालों का इस्लामिक कानून 


 ..... आख़िर औरत को मनुष्य कब माना जायेगा ?  

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

कौन तय करते हैं हमारी प्राथमिकतायें ?


धरती पर कलिकाल का यह अत्याधुनिक चरण है ।
इस चरण में विज्ञान है, आध्यात्म नहीं है
समाज है, धर्म नहीं है  
संविधान है, सुनीति नहीं है
भीड़ है, नियंत्रण नहीं है ।   
भूख और कुपोषण है, रोटी नहीं है ।  
रोते हुये बच्चे हैं, दूध नहीं है ।
रोगी हैं, औषधियाँ और पथ्य नहीं हैं ।
जीवन है, उत्साह और प्रसन्नता नही है
समस्या है, समाधान नहीं है ।
 .....क्योंकि मुद्रा की व्यवस्था नहीं है ।

मौत नहीं है, मौत को आमंत्रित करते हथियार हैं ।
.....क्योंकि मुद्रा की व्यवस्था है ।

जीवन, जोकि वर्तमान में है, के लिये चिंता नहीं है ।
मृत्यु, जोकि वर्तमान में नहीं है, के लिये चिंता है । सारी चिंतायें अनागत मृत्यु की सम्भावनाओं में बंदी हो चुकी हैं ।

मृत्यु का भय, युद्ध की धमकियाँ, महाविनाश की योजनायें, महाविनाश से बचने के लिये सुरक्षा की योजनायें ..... पूरी दुनिया उलझ गयी है मौत के भय में ।
हमारी प्राथमिकता क्या है ? जीवन की योजना या मृत्यु की योजना, निर्णय कौन करेगा ?
अब ऋषियों-मुनियों ने जन्म लेना लगभग बंद कर दिया है । जो हैं, उन्हें पूछता कौन है ?
धन है, अन्न है, फिर भी भूख है, क्योंकि अन्न सड़ जाता है, वंचितों को मिल नहीं पाता ।  
धन है फिर भी पीड़ा है, क्योंकि छल है, प्रपंच है, अहंकार है, महाघातक अस्त्र और शस्त्र हैं

सुयोजना नहीं है, करुणा नहीं है, शांति कैसे होगी ?  
न्याय है किंतु मिलता नहीं ।
अधिकार है किंतु मिलता नहीं ।
विचार है किंतु संगठन नहीं है ।

यह संसार इतना विचित्र, विरोधाभासी और यातनाओं से भरा क्यों है ?